पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ​किसके साथ?

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पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमिटी के नेता आगामी विधानसभा चुनावों में वाम मोर्चे से गठबंधन के पक्ष में तो हैं मगर पार्टी के बड़े नेता इसपर कोई राय नहीं बना पाए रहे.

कांग्रेस आलाकमान इसकी संभावना पर निर्णायक तौर पर कछ भी कहने से कतरा रहा है.

कुछ हफ़्तों पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने कांग्रेस से आह्वान किया था कि पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए कांग्रेस को आगे आना चाहिए.

पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कोलकाता में आयोजित एक जनसभा में कांग्रेस को एक तरह की चुनौती देते हुए कहा कि 'कांग्रेस को बताना चाहिए कि वो किसकी तरफ है.'

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बुद्धदेव भट्टाचार्य का कहना था की राज्य में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के लिए वो आने वाले विधानसभा के चुनावों में किसी से भी हाथ मिला सकते हैं.

सोमवार को पश्चिम बंगाल के कांग्रेस के नेताओं का एक दल पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी से मिलने पहुंचा.

इस दल का नेतृत्व कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी कर रहे थे. चौधरी ने बाद में पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि उन्होंने राहुल गांधी को बता दिया कि प्रदेश की जनता और पार्टी क्या सोच रही है.

उनका कहना था, "अब किसके साथ गठबंधन करना चाहिए किसके साथ नहीं, यह तो केंद्रीय कमिटी को तय करना है. हमने अपनी बात रख दी है."

पश्चिम बंगाल के साथ-साथ आने वाले कुछ महीनों के अंदर तमिलनाडु, केरल, असम और पुदुचेरी में विधान सभा चुनाव होने हैं.

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केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का मुक़ाबला वाम दलों के गठबंधन के साथ है.

जानकारों का कहना है कि ऐसे में बंगाल में अगर कांग्रेस और वाम दल आपस में समझौता करते हैं तो दोनों को ही नुकसान होगा.

मगर यह भी सच है कि 1998 में अपनी स्थापना के बाद से ही तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन समय-समय पर कांग्रेस के साथ ही रहा है.

चाहे 2001 का गठबंधन रहा हो या फिर 2009 के लोक सभा के चुनाव और 2011 में हुए विधानसभा के चुनाव. हलांकि तृणमूल कांग्रेस ने अभी कुछ तय नहीं किया है.

पार्टी के प्रवक्ता सुखेन्दु शेखर राय ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि तृणमूल कांग्रेस ने अपने विकल्प खुले रखे हैं और समय पर ही वो अपनी रणनीति तय करेंगे.

उन्होंने कहा, "जब दो डूबते हुए लोग एक दुसरे को पकड़ते हैं तो दोनों का डूबना तय है. हम वाम मोर्चे और भाजपा के अलावा किसी से भी गठबंधन कर सकते हैं."

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वहीं पश्चिम बंगाल चैम्बर ऑफ कामर्स के मुख्य अर्थशास्त्री निर्मल्या मुख़र्जी कहते हैं कि वाम दल और कांग्रेस के बीच गठजोड़ की संभावना फिलहाल तो बहुत कम ही नज़र आती है.

वो कहते हैं कि अगर ऐसा होता भी है तो इसका तृणमूल पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

पिछले लोक सभा के चुनाव में ममता बनर्जी के नेतृव्व वाली तृणमूल कांग्रेस को लगभग 40 प्रतिशत वोट मिले थे जबकि वाम दलों को 30 प्रतिशत, कांग्रेस को 10 और भारतीय जनता पार्टी को 17 प्रतिशत.

स्थानीय निकायों के चुनाव में भाजपा के वोट प्रतिशत में 10 प्रतिशत की गिरावट देखी गई है.

इस बार तृणमूल कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन का दवा कर रही है और इसलिए जानकारों को लगता है कि वो सिर्फ आखरी क्षणों में ही अपने पत्ते खोलना चाहती है.

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