दर्शक को पहले रुलाओ, फिर ग्राहक बनाओ

  • 4 फरवरी 2016
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भारतीय भी अजीब होते हैं. विज्ञापनों को देखकर परेशान होने के बजाय हम उनका मज़ा लेते हैं. दरअसल वह मनोरंजन का मज़ा दोगुना कर देते हैं.

चाहे यह भारत-ऑस्ट्रेलिया टी20 मैच में कांटे की टक्कर के बीच आएं या किसी फ़िल्म के दौरान, लोगों को विज्ञापनों से तब तक कोई दिक्कत नहीं होती, जब तक वह बहुत ज़्यादा दखल देने वाले न हों और वो मनोरंजक हों.

और तो और फ़िल्म स्टार भी अपनी फ़िल्मों की रिलीज़ के नज़दीक ब्रांडों को एंडोर्स करने से ऐतराज़ नहीं करते क्योंकि विज्ञापनों के एयर होने की दर इतनी ज़्यादा होती है कि इससे इन स्टार्स की लोकप्रियता बढ़ती है.

अब क्योंकि सभी विज्ञापनों का मक़सद जानकारी देना और किसी उत्पाद या सेवा को बढ़ावा देना होता है इसलिए ज़्यादातर विज्ञापन बनाने वाले जिस फ़ॉर्मूले का इस्तेमाल करते हैं वह या तो दर्शक के चेहरे पर मुस्कान लाना होता है या उन्हें भावुक करना.

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जैसे कि मंगलवार को जारी हुए ब्रिटिश एयरवेज़ के विज्ञापन की श्रृंखला में से कई दिल छू लेनेवाले हैं. ये विमान सेवा 1924 से भारत के लिए उड़ान संचालित कर रही है.

एक सच्ची घटना से प्रेरित एक विज्ञापन में 23 साल की केबिन क्रू हेलेना फ़्लिन अपनी पहली यात्रा पर भारत जाती हैं. उड़ान के दौरान वह एक वृद्ध महिला से मिलती हैं जिनके साथ जुड़ाव कुछ ऐसा बनता है कि वह बुज़ुर्ग महिला के घर हैदराबाद भी जाती हैं.

ये विज्ञापन फ़िल्म, जिसकी कैचलाइन है - फ़्यूल्ड बाय लव (जो प्यार से चलता है) को सैपीएन्टनाइट्रो ने तैयार किया है. इसे बनाया है, फ़िल्म 'मसान' के निर्देशक नीरज घेवण ने.

हालांकि पिछले कुछ समय में ऐसे बहुत से विज्ञापन बने हैं, जो दिल को छू जाते हैं. जैसे कि गूगल का रीयूनिन टीवी विज्ञापन, जिसे देखकर ऑगिल्वी के एक्ज़ीक्यूटिव चेयरमैन और क्रिएटिव डायरेक्टर पीयूष पांडे को आंसू पोंछने की ज़रूरत पड़ जाती है.

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बचपन के दो लंगोटिया यारों बलदेव और यूसुफ़ की यह कहानी है, जो बहुत समय से एक दूसरे से मिलना चाहते हैं, आज तक आपको छू जाती है. जब इसने मेरे दिल को उस वक़्त भी छूआ जब मैं ये लेख लिख रहा था.

एक और विज्ञापन है जिसे देखना मुझे अच्छा लगता है - वह है नेस्ले का जिसमें दो बच्चे हैं, जिनमें से एक को हाल ही में गोद लिया गया है और उसका भाई उसे कुछ झिझक के साथ स्वीकार करता है, लेकिन एक बार कर लेता है तो वह ज़िंदगी भर के साथी बन जाते हैं.

या तनिष्क का पिछले साल मदर्स डे के आसपास जारी हुआ यह विज्ञापन जिसमें दीपिका पादुकोण अपनी मां से बात कर रही हैं और जैसे वह रोज़ पड़ने वाली डांट का लुत्फ़ लेती हैं तो लगता है कि वह एक सुपरस्टार होने के बावजूद अपनी मां की एक छोटी बच्ची हैं.

और फिर हैवल का यह विज्ञापन भी है जिसमें एक छोटी बच्ची अपने पिता के, जो काम कर रहे हैं, खाने को गरम करने का अनूठा तरीका ढूंढती है.

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साफ़ है कि भावनाओं को छेड़ने का एक तरीक़ा है जिसकी वजह से ज़्यादा से ज़्यादा मार्केटिंग करने वाले उपभोक्ताओं की मांग बढ़ाने के लिए भावनात्मक तरीक़ा अख़्तियार करना चाहते हैं. लेकिन इससे उन्हें फ़ायदा होता है? बेशक होता है.

लेकिन ऐसी फ़िल्म बनाने के लिए जो आपको जज़्बाती कर दे, ऊंचे स्तर के निर्देशकों की ज़रूरत होती है, जिससे उसकी लागत बढ़ जाती है.

सबसे अंत में जो बात मुद्दे की है वह है निवेश पर रिटर्न और अगर विज्ञापन से गल्ले में पैसा बरस रहा है तो, फिर शिकायत किसको है?

(लेखक मीडिया पर टिप्पणीकार और एडिटर हैं जो विभिन्न मीडिया में काम करते हैं. वह एमएक्सएम इंडिया और हैप पोस्ट के संस्थापक-एडिटर भी हैं.)

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