आख़िरी आदमी का रचयिता चला गया

मशहूर लेखक इंतज़ार हुसैन से हिंदुस्तान और पाकिस्तान में फ़िक्शन के चाहने वाले ज़रूर परिचित होंगे.

उनसे मिलने से पहले मैंने भी उनकी कई कहानियां पढ़ रखी थीं. इनमें वही आकर्षण था जो नानी-दादी की परियों की कहानियों में होता है.

सुना कि कल दोपहर उनका निधन हो गया. एक दोस्त ने मुझे यह ख़बर सुनाई और इसकी पुष्टि भी चाही. कारण केवल यही था कि मेरा संबंध पत्रकारिता और साहित्य दोनों से है. वही संबंध इंतजार हुसैन का भी था.

उनसे मुलाक़ात कई बार हुई या यूं कहें कि बार बार हुई. पहली मुलाक़ात एक छात्र के रूप में दिल्ली में मौजूद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुई और हम उनकी बातों से रोमांचित और मंत्र मुग्ध होते रहे.

और अंतिम मुलाकात उनसे फ़ैज़ साहब के शताब्दी समारोह के मौक़े पर साहित्य अकादमी दिल्ली में हुई.

उन सभी बैठकों और बातों में यह बात दिखी कि इंतज़ार साहब भारत और पाकिस्तान या फिर गंगा जमुनी साझा सभ्यता के आदमी थे.

वे इस साझा सभ्यता और संस्कृति के दुनिया भर में राजदूत थे क्योंकि उनकी कृतियाँ अंग्रेज़ी और फ़्रांसीसी सहित कई दूसरी प्रमुख भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं.

उनकी गिनती समकालीन भारत पाकिस्तान ही नहीं बल्कि उर्दू कथा, विशेष रूप से उपन्यास या कहानी के महत्वपूर्ण लेखकों में की जाती है.

इंतज़ार हुसैन वर्ष 1923 में भारत के मेरठ ज़िले में पैदा हुए और विभाजन के समय पाकिस्तान चले गए. उन्होंने लाहौर में पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू में एमए किया और पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ गए.

उनके मिथकों का पहला संग्रह 'गली कूचे' 1953 में प्रकाशित हुआ था. इस प्रकार उनका साहित्यिक सफ़र आधी शताब्दी पर आधारित है.

इंतज़ार हुसैन के अफ़्सानों के आठ संकलन, चार उपन्यास, दो वॉल्यूम में संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने बहुत से अनुवाद भी किए हैं और सफ़रनामे भी लिखे. उनके उर्दू कॉलम पर आधारित पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है. वह अंग्रेजी में भी कॉलम लिखते रहे.

वह पहले उर्दू के अदीब हैं जो वर्ष 2013 में अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार के लिए नामांकित हुए थे.

अपने नामकरण के बारे में उन्होंने बताया था कि चार बेटियों के बाद पैदा होने वाले बच्चे का नाम इंतज़ार हुसैन रख दिया गया क्योंकि परिवार में बेटे का शिद्दत के साथ इंतजार था.

उन्होंने ऐसे माहौल में आँख खोली जिनके पड़ोस में हिंदू मुस्लिम दोनों थे. मस्जिद की अज़ान और मंदिर की घंटियों की आवाज़ें सुनते हुए बड़े हुए. मेरठ के जिस स्कूल में उन्हें भर्ती कराया गया वहाँ एक शिक्षक के अलावा सब हिन्दू थे जबकि उनकी कक्षा में दो बच्चों के अलावा बाकी सब हिंदू बच्चे थे.

उन्होंने कहा कि वह हमेशा नॉस्टेल्जिया में जीते रहे जबकि पाकिस्तान के उनके समालोचकों का कहना है कि उन्होंने कभी पाकिस्तान को क़बूल ही नहीं किया और हमेशा भारत में भ्रमण करते रहे.

उन्होंने कहानियों में अपनी रुचि के बारे में बताया कि प्राचीन भारतीय कहानी बेताल पच्चीस क्या हाथ लगी कि उन पर अजीब देवमालाई जुनून छा गया.

इसके बाद उन्होंने कथा सागर के सारे के सारे खण्ड पढ़ डालें, बौद्ध धर्म की जातक कथा की सैर की, महाभारत और अलिफ़-लैला दो परस्पर अलग दुनिया के स्रातों से लाभ हासिल किया और फिर उन्हें सूफियों की आम जनता के साथ बातचीत का अनोखा नुस्ख़ा हाथ लग गया.

इंतज़ार साहब के अनुसार उर्दू कथा के निर्माण में तीन तत्व या धाराएं हैं जिनमें प्राचीन भारतीय कथाएं, अरब और फ़ारस की कहानी कहने और आधुनिक पश्चिमी दुनिया की बुद्धिवाद की परंपरा शामिल है.

उनके उपन्यास आधारशिला का आधार यही तीन रहे. इससे वे लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने में ऐसे ही सफल हुए जैसे किसी जमाने में सूफ़ी-संत हुआ करते थे.

वह लिखते कैसे हैं इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा था:

"कभी कोई स्थिति या एक तस्वीर-सी मन में आ जाती है और वह पकती रहती है. ऐसे जैसे धीमी आंच पर आप एक हंडिया रख दें तो वह पकती रहती है धीमे धीमे. अब तो ऐसा नहीं होता. मैं तो पुराने ज़माने का आदमी हूँ. मेरे मन में तो यही उदाहरण आता है कि आपके दिल और दिमाग़ में आकर कोई बात अटक गई है या बस गई है और एक चरख़ी है जो घूमती जाती है. हम दूसरे काम भी करते रहते हैं लेकिन वह चरख़ी अपना काम करती रहती है और इस का एक रूप दिल और दिमाग़ में बनता रहता है, जब उसका आकार पूरी तरह से बन जाता है तो मैं लिखना शुरू करता हूँ."

अपनी एक कहानी मोरनामा (मोरकथा) के बारे में उन्होंने बताया कि 1998 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था. ख़बर पढ़ी कि उनके प्रभाव से उस क्षेत्र के मोर मरने लगे. मोरों को मैं बचपन से जानता हूँ. इसलिए तकलीफ़ हुई और फिर मैं मोरों के साथ महाभारत के युग में चला गया. मुझे लगा जैसे यह दो देशों की नहीं, कौरवों-पाण्डवों की लड़ाई है.

उन्होंने अपनी बंदर की कहानी के बारे में बताया कि एक बंदर पहली बार इंसानों की बस्ती का विकास देख कर हैरान हो जाता है और इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि हमारे विकास के रास्ते में बड़ी बाधा हमारी दुम है. मनुष्य ने अपनी दुम से छुटकारा हासिल करके कैसी प्रगति कर ली है. इस बंदर की बात सुनकर पूरा झुंड अपनी पूंछ काटने का फ़ैसला करता है. मगर एक बूढ़ा बंदर कहता है कि जिस उस्तरे से तुम अपनी पूंछें काटोगे कल इसी से एक दूसरे का गला भी.

उन्होंने ऐसे लोगों के लिए, जो यह कहते हैं कि इंतज़ार हुसैन का दिल भारत में और शरीर पाकिस्तान में है, कहा कि उन्हें 'आगे समन्दर है' ज़रूर पढ़ना चाहिए.

और इस प्रकार इंतज़ार हुसैन का सफ़र ख़त्म होता है लेकिन उनके साथ चलने वालों को जाने कितनी अनकही चीज़ें मिलेंगी, कौन बता सकता है कि नॉस्टेल्जिया कहाँ ले जाता है.

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