'आईएस को रोकना सिर्फ़ मुसलमानों की ज़िम्मेदारी नहीं'

  • 3 फरवरी 2016
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इस्लामिक स्टेट यानी आईएस को लेकर दुनियाभर में लोग चिंतित हैं. कई देशों में राजनीतिक और धार्मिक मुस्लिम संगठनों ने खुलकर इसका विरोध किया है.

भारत के मुसलमान इस्लामिक स्टेट की चुनौती को किस तरह देखते हैं?

बीबीसी हिंदी ने इसे लेकर कई मुसलमान धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक नेताओं से बात की. पढ़ें उनकी राय:

मौलाना मक़सूद इमरान राशदी, मौलाना, जामा मस्जिद, बैंगलुरु

पिछले साल अक्टूबर में हमने एक सर्कुलर जारी किया जिसे जुमे की नमाज़ के बाद पढ़ा जाता था.

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इसमें नमाज़ियों के लिए संदेश होता था कि यह उनकी ज़िम्मेदारी है कि वो अपने बच्चों को इस्लामिक स्टेट के असर से दूर रखें.

सर्कुलर में कहा जाता था कि आईएस का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं. जो वह प्रचारित करता है वह इस्लाम की मान्यताएं नहीं हैं. तो हमने नौजवानों और पूरी क़ौम को उससे दूर रहने की अपील की और उन मूल्यों को फैलाने को कहा जो इस्लाम हमें सिखाता है.

हमें लोगों और ख़ासकर नौजवानों में जागरूकता फैलाने की ज़रूरत है. सौभाग्य से व्हाट्सऐप के ज़रिए हमारा सर्कुलर आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, लखनऊ और दिल्ली तक पहुँचा.

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दिल्ली से एक कॉन्फ्रेंस में आए मौलाना महमूद मदनी ने भी यही बात कही.

असदुद्दीन ओवैसी, सांसद और एआईएमआईएम

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मैं समझता हूँ कि सभी मुस्लिम संगठन इस पर एकमत हैं कि आईएस एक साज़िश है और इसकी खुलेआम निंदा की जानी चाहिए. और लोगों को इसके साथ किसी भी तरह के संबंधों के ख़तरनाक नतीजों के बारे में बताया जाना चाहिए.

यह मानना ज़रूरी है कि यह केवल मुसलमानों की ज़िम्मेदारी नहीं हो सकती. इसे रोकने की ज़िम्मेदारी सरकार की है. मुसलमानों को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं.

केवल यह कहना कि भारतीय मुसलमानों को उनसे लड़ना है और केवल तभी उन्हें राष्ट्रवादी कहा जाएगा, सही नहीं है.

यह भी उतना ही अहम है कि कोई नौजवान केवल धर्म के नाम पर किसी आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर न पकड़ा जाए. क्योंकि यही वह चीज़ है जिससे वो गुमराह हो जाते हैं.

ऐसे मामले हुए हैं जब ऐसे लोगों को पकड़ा गया है और तीन-चार साल बाद जब केस बनाने के लिए कुछ नहीं मिला है. इसके बारे में कुछ करना चाहिए. जांच एजेंसियों को अपना काम और सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इससे उनकी दूसरी कोशिशों पर असर पड़ेगा.

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इस्लामिक स्टेट का सोशल मीडिया अभियान काफ़ी मज़बूत है. हमें 20 साल की उम्र के दायरे में आने वाले नौजवानों को उससे बचाने की ज़रूरत है, जिन्हें दुनिया के बारे में कोई जानकारी नहीं होती और वो उनके सोशल मीडिया अभियान का शिकार बन जाते हैं. हर किसी को आईएस से निपटने के लिए हाथ मिलाने की ज़रूरत है क्योंकि वह दुनिया के अमन के लिए ख़तरा है.

हम लोगों में जागरूकता पैदा कर रहे हैं कि आईएस का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है.

यह सच है कि कुछ लोगों को भ्रमित किया गया और वो आईएस में शामिल होने गए. मगर आईएस का सामना करने की चुनौती केवल मुस्लिम समुदाय की नहीं हो सकती. हमारा मानना है कि जो भी देश के ख़िलाफ़ काम करता है, उसका विरोध होना चाहिए.

सलीम इंजीनियर, राष्ट्रीय महासचिव, जमाते इस्लामी हिंद

आईएस का न इस्लाम से कोई सरोकार है न मुसलमानों से. दरअसल यह इस्लाम और मुसलमानों की छवि खराब करने के षडयंत्र का हिस्सा है.

भारत में इक्का-दुक्का मामले को छोड़कर इसका आमतौर पर कोई असर नहीं है. ख़ुद भारत सरकार के गृहमंत्री भी यह बात कह चुके हैं.

अफ़सोस है इस्लाम को नुक़सान पहुंचाने का मंसूबा रखने वाली कुछ ताक़तें इसका फ़ायदा उठाकर एजेंसियों की मदद से बेगुनाह लोगों को परेशान करने का प्रयास कर रही हैं.

आईएस के उभार के पीछे असल में बड़ी अंतरराष्ट्रीय साज़िश दिखाई देती है.

आईएस का इस्तेमाल मुसलमानों को शिया-सुन्नी में बांटने के लिए किया जा रहा है. आईएस के ज़रिए ख़ौफ़ की फ़िज़ा बनाकर हथियारों का व्यापार बढ़ाने का षड्यंत्र है.

एए खान, पूर्व कुलपति, रांची विश्वविद्यालय

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दुनिया भर के राजनीति विशेषज्ञों को आईएस के उभार के कारणों पर शोध करनी चाहिए.

दुनिया में आईएस के नाम पर जो भी हो रहा है, वह ग़लत है. इस पर तुरंत सोचना पड़ेगा.

डॉ. शाहिद अख्तर, अध्यक्ष, झारखंड राज्य अल्पसंख्यक आयोग

इस्लाम का जो पैग़ाम है, वह अमन का है. लेकिन आईएस ख़ौफ़ पैदा करके जो करना चाह रहा है, वह बहुत ग़लत है. यह इस्लाम के विपरीत काम कर रहे हैं.

ऐसे संगठन को हिंदुस्तान के मुसलमान किसी क़ीमत पर स्वीकार नहीं करेंगे.

हमने उलेमाओं और नौजवानों से बात की है कि उन्हें मिलकर इसका विरोध करना चाहिए.

शेरमान अली अहमद, विधायक और अल्पसंख्यक नेता, असम

इस्लामिक स्टेट जिस क़दर बच्चों, महिलाओं और बेकसूरों की हत्या कर रहा है, यह कहीं से भी इस्लाम या फिर एक सच्चे मुसलमान का काम नहीं हो सकता.

यह संगठन दुनिया में दहशत फैलाने के लिए शांति और भाईचारे की हत्या कर रहा है. ऐसे घिनौने कामों के लिए इस्लाम और दुनिया के सारे मुसलमान बदनाम हो रहे हैं.

भारत में कुछ युवा जो इस्लामिक स्टेट के प्रति आकर्षित हो रहे हैं, दरअसल ये लोग गुमराह किए जा रहे हैं.

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क़ुरान में कहीं भी हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है.

अगर आप का पड़ोसी तकलीफ में, भूखा है तो सच्चा मुसलमान उसकी मदद का लिए सबसे पहले खड़ा होगा. फिर चाहे वह पड़ोसी हिंदू हो या फिर किसी अन्य जाति-समुदाय का.

हाफ़िज़ बशीर अहमद क़ासमी, एआईयूडीएफ़ विधायक और जमीयत नेता, असम

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इस्लामिक स्टेट इस्लाम के ख़िलाफ़ काम कर रहा है और हम इसके विरोध में हैं. युवाओं को समझना होगा कि यह सब कुछ इस्लाम के अनुसार नहीं है. इस्लामिक स्टेट बहुत हैवानियत का काम कर रहा है और उन्हें रोकना बेहद ज़रूरी है.

भारत में कुछ युवाओं के इस्लामिक संगठन के प्रति आकर्षित होने का कारण भेदभाव का शिकार होना भी है.

इस कारण ऐसे युवक राहत की तलाश में ऐसे चरमपंथी संगठनों में शामिल होने की सोच बैठते हैं. लेकिन इस ग़लतफ़हमी को दूर करने के प्रयास होने चाहिए.

ख़िलाफ़त का यह पूरा तरीक़ा ही ग़लत और इस्लाम के ख़िलाफ़ है. यह इस्लाम का रास्ता नहीं है.

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