'भोजशाला' में होगा शिवराज का असल इम्तहान

शिवराज सिंह चौहान इमेज कॉपीरइट Vipul Gupta BBC

मार्को रूबियो ने कहा था, “नेतृत्व एक चुनाव में या इसके नतीजों से नहीं आंकी जा सकती. समय ही असल में इसकी परख कर सकता है. वो भी 20 साल के नज़रिए से न कि 20 दिन के.”

29 नवंबर 2005 को जब शिवराज सिंह चौहान ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री का पदभार संभाला था तब से अब तक उनके कामकाज़ का प्रदर्शन और ज़मीनी हक़ीक़त अच्छी तस्वीर पेश करते हैं. नए विचारों की बात करें या फिर चुनावी सफलता दोनों ही मोर्चों पर चौहान सफल रहे हैं. हालाँकि ज़मीनी आकलन बताते हैं कि आगे कई अवरोध और चुनौतियां हैं.

चौहान के कार्यकाल का सबसे बड़ा कलंक व्यापमं घोटाले से निपटने का उनका तरीका रहा. ये धारणा बनी कि क्या वाकई मुख्यमंत्री को इस घोटाले का पता नहीं था या फिर शिवराज का व्हिसल ब्लोअर का दावा सही है.

एक साधारण सा सवाल है कि सभी कार्यकारी अधिकार अपने हाथ में रखने वाले चौहान व्हिसल ब्लोअर कैसे हो सकते हैं. उनसे उम्मीद थी कि वो तत्काल कार्रवाई करते, लेकिन वो दुविधा में रहे.

इन दिनों चौहान की सबसे बड़ी चिंता व्यापमं नहीं है बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनके असहज रिश्ते हैं.

इमेज कॉपीरइट AFP

2014 के आम चुनावों से पहले चौहान ने सुषमा स्वराज के साथ लालकृष्ण आडवाणी को भोपाल से चुनाव लड़ने के लिए राजी करने की कोशिशें की थी, लेकिन भाजपा संसदीय बोर्ड ने चौहान की याचिका को खारिज़ कर दिया और आडवाणी ने गांधीनगर से चुनाव लड़ा, लेकिन ये मुद्दा अब भी भाजपा के सियासी हलकों मे छाया रहता है.

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी चौहान को अहमियत तो देते रहे हैं, लेकिन किन्हीं वजहों से दोनों के बीच औपचारिकताएं बढ़ती गई और मुख्यमंत्री के भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ रिश्ते भी आधिकारिक ही हैं.

चौहान का असल इम्तहान धार भोजशाला में इसी महीने होगा. मध्य प्रदेश में भोजशाला का विवाद ‘अयोध्या विवाद’ की तरह है. 11वीं शताब्दी के इस ढाँचे को राजा भोज ने बनवाया था. स्थानीय मुसलमानों का मानना है कि भोजशाला एक मस्जिद थी जिसका नाम मुस्लिम संत कमालुद्दीन चिश्ती के नाम पर था, जो कि सूफ़ी संत निज़ामुद्दीन के शिष्य थे.

इमेज कॉपीरइट AFP

अब सभी नज़रें चौहान की प्रशासनिक दक्षता पर हैं कि क्या वो 12 फरवरी बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा और जुमे की नमाज़ नहीं होने देने के भारतीय पुरातत्व विभाग के आदेश को लागू करने में सफल हो पाते हैं कि नहीं?

हिंदू जागरण मंच ने साफ़ तौर पर कह दिया है कि वो मुसलमानों को नमाज़ अदा नहीं करने देंगे.

राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के मामले में चौहान का ट्रैक रिकॉर्ड बहुत अच्छा रहा है. मध्य प्रदेश में बहुत कम सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं और हल्के-फुल्के दंगों को सरकार ने फुर्ती ने काबू में किया है.

उनकी सरकार को 2006 में धार में सांप्रदायिक गड़बड़ी को सफलतापूर्वक शांत करने के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार भी मिला था. बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कड़े प्रतिरोध के बावजूद शिवराज के शासन में भोजशाला में नमाज अदा होती रही है.

इमेज कॉपीरइट EPA

जनवरी 2013 में एक बार फिर उपद्रवियों ने विवादित स्थल पर नमाज अदा करने से रोकने की कोशिश की तो पुलिस उग्र भीड़ पर लाठीचार्ज करने में नहीं हिचकी थी.

शिवराज को मध्य प्रदेश को बीमारू की श्रेणी से बाहर निकालने का श्रेय भी दिया जाना चाहिए. संदेह नहीं कि उन्होंने विकास की कई योजनाओं को लागू किया, लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार की अब भी बहुत गुंजाइश है.

पिछले 10 साल में शिवराज ने असंगठित क्षेत्र के लिए कई घोषणाएं की हैं. गांवों में एक हफ्ते में चार दिन गांव में बिताए हैं. महिलाओं और लड़कियों के लिए कन्यादान, लाडली लक्ष्मी जैसी योजनाओं ने उन्हें अच्छी पहचान दिलाई है.

बतौर मुख्यमंत्री, शिवराज अक्सर अल्पसंख्यकों के प्रति उदार नज़र आते हैं. हर बार जब भी स्कूली पाठ्यक्रम में गीता को शामिल करना, सूर्य नमस्कार, भोजन मंत्र या वंदे मातरम को लेकर विरोध हुआ, उन्होंने विद्यार्थियों और सरकारी कर्मचारियों को इससे छूट दे दी.

उनके शासन में मध्य प्रदेश धर्म स्वतंत्रता (संसोधन) विधेयक 2013 पारित हुआ, जिसके तहत किसी तभी तरह के धर्मांतरण के लिए पूर्व अनुमति ज़रूरी होगी और जबरन धर्मांतरण के लिए क़ैद का प्रावधान है. लेकिन इसका विरोध करने वाले मुसलमान और ईसाई समुदायों ने इसके दुरुपयोग की शिकायतें नहीं की हैं.

इसके अलावा गौवध पर भी क़ानून बनाया गया है, जिसके तहत गौवध के दोषी को 7 साल के जेल का प्रावधान किया गया है. लेकिन, इस क़ानून के दुरुपयोग की भी कोई शिकायतें नहीं मिली हैं.

दो साल पहले शिवराज ने भोपाल में मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के लिए बहुत सस्ती दरों पर आठ एकड़ ज़मीन आबंटित की. मुख्यमंत्री के इस क़दम का कई मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं ने स्वागत किया.

इमेज कॉपीरइट VIPUL GUPTA BBC

दिलचस्प ये है, चौहान की मुस्लिमों के प्रति झुकाव ने विपक्षी पार्टी कांग्रेस को परेशान कर दिया था. कांग्रेस नेता अजय सिंह ने उर्दू यूनिवर्सिटी के शिवराज के निर्णय को ‘अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण’ बताया था. यह वही शब्द है जिसका इस्तेमाल भाजपा कांग्रेस पर निशाना साधने में करती रही है.

राजनीति में लंबे समय तक ऊंचे पद पर बने रहने पर राजनेताओं में कई बुराइयां आ जाती हैं, लेकिन शिवराज कई मायनों में इनसे दूर रहे हैं- संकोची, काम के लती, मकसद के प्रति समर्पित.

लेकिन इस लंबी यात्रा में, कई ऐसे मौके आए जब वो निहित स्वार्थों के मुद्दों को तवज्जो देते नज़र आए और इससे उनके शासन की छवि ख़राब ही हुई.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार