जश्ने-बहार में भी असहिष्णुता की गूंज

  • 6 फरवरी 2016
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राजधानी दिल्ली में बहार यानी बसंत के आने से पहले मुशायरा जश्ने-बहार की धूम रही जिसमें पाकिस्तान और भारत के अलावा अमरीका, कनाडा और संयुक्त अरब अमीरात के शायरों ने भी भाग लिया.

पाकिस्तान से आने वाले शायरों में पीरज़ादा क़ासिम, अमजदुल इस्लाम अमजद, रेहाना रूही और अब्बास ताबिश शामिल थे, जबकि भारत का प्रतिनिधित्व प्रोफ़ेसर वसीम बरेलवी, फ़रहत एहसास, आलोक श्रीवास्तव, नसीम निकहत, पापुलर मेरठी, नुसरत मेहदी, दीप्ति मिश्रा और जॉनी फ़ॉस्टर कर रहे थे.

मुशायरा की आयोजक कामना प्रसाद ने कहा, "अगर कोई यह कहता है कि उर्दू किसी एक संप्रदाय की भाषा है तो वह संप्रदाय भारत है."

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भारत में पिछले कई महीनों से असहिष्णुता पर चर्चा जारी है और उसकी गूंज साहित्य अकादमी पुरस्कार की वापसी से लेकर बॉलीवुड, जयपुर साहित्य महोत्सव के बाद जश्ने-बहार में भी सुनाई दी.

पाकिस्तान के शायरों ने कहा कि दोनों देशों को समझने और क़रीब लाने में उर्दू महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है और मुशायरे इसका प्रमुख मंच हैं.

भारत के मशहूर शायर वसीम बरेलवी ने कहा पाकिस्तान में भारत के शायरों को पढ़ा और जाना जाता है जबकि उर्दू देवनागरी और रोमन लिपि में भी लोकप्रिय हो रही है और दोनों देशों के बीच की खाई को पाटने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है.

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कामना प्रसाद ने कहा, "आज दुनिया और ख़ासतौर से भारतीय उपमहाद्वीप विभाजनकारी शक्तियों और असहिष्णुता से प्रभावित हैं. ऐसे में उदारता, अध्यात्म और साहित्य ही युद्ध से त्रस्त दुनिया और असहिष्णुता का जवाब है.

केंद्रीय मंत्री नजमा हेपतुल्लाह ने इस मौक़े पर कहा, "आज जबकि उर्दू को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, मुशायरा जश्ने-बहार इस ख़ूबसूरत ज़बान की ख़िदमत में एक तोहफ़ा है जो हमारे साझी गंगा-जमुनी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करती है."

कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने कहा कि मुशायरे हमारी साझा संस्कृति को समझने और प्यार तथा शांति के संदेश को दुनिया में पहुंचाने का अहम माध्यम हैं.

वैसे उर्दू का एक प्रसिद्ध शेर इस संदर्भ में याद आ गया हैः

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उनका जो फ़र्ज़ (काम) है वह अहले-सियासत जानें मेरा पैग़ाम मोहब्बत है जहां तक पहुंचे

पाकिस्तान के मशहूर शायर पीरज़ादा क़ासिम जिन्हें पहली बार मुझे वर्ष 1990 में सुनने का मौक़ा मिला था, उनका शेर था:

शहर तलब करे अगर तुम से इलाजे-तीरगी साहिबे-इख़्तियार हो आग लगा दिया करो

उनसे लोगों ने फिर से एक पुरानी ग़ज़ल की फरमाइश की. मुशायरे में पढ़े जाने वाले कुछ शेर आप भी देखें चलें:

ख़ून से जब जला दिया, एक दिया बुझा हुआ फिर मुझे दे दिया गया, एक दिया बुझा हुआ (पीरज़ादा क़ासिम, पाकिस्तान)

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तू समझता है कि रिश्ते की दुहाई देंगे हम तो वो हैं, तेरे चेहरे में दिखाई देंगे (प्रो. वसीम बरेलवी, भारत)

कहते थे एक पल न जिएंगे तेरे बग़ैर हम दोनों रह गए हैं, वो वादा नहीं रहा (अमजद इस्लाम अमजद, पाकिस्तान)

मुझे समझो ये दीवानगी है मैं क्यों ख़ुद से भला इतना ख़फ़ा हूँ (फ़रहत शहज़ाद, अमेरिका)

हालात कैसे दोस्तों इस घर के हो गए शीशा मिजाज़ लोग भी पत्थर के हो गए (पारित उस्मानी, भारत)

इलाज अपना कराते फिर रहे हैं जाने किस-किस से मोहब्बत करके देखो ना, मोहबब्त क्यों नहीं करते (फरहत भावना, भारत)

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