'मोहे अपने ही रंग में रंग दे निज़ाम'

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हाल ही में नई दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह शरीफ़ पर उनका 712वां उर्स मनाया गया.

यह उर्स इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक़ रबी-उल-आख़िर महीने की सत्रहवीं तारीख़ को हर साल मनाया जाता है.

उर्स के माहौल में गुलाब, इत्र और अगरबत्ती की ख़ुशबू और क़व्वाली की पुरकशिश धुनों के बीच यहाँ आने वाले इस माहौल में रम जाते हैं. वो कुछ देर दुनिया के झमेलों को भूल ख़्वाजा की मोहब्बत में गिरफ़्तार हो जाते हैं.

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बताया जाता है कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म उत्तर प्रदेश के बदायूं में हुआ था. वे चिश्ती घराने के चौथे सूफ़ी संत थे.

92 साल की उम्र में सन् 1325 में उनका निधन हो गया. उनकी याद में निज़ामुद्दीन दरगाह का निर्माण कराया गया.

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निज़ामुद्दीन औलिया की अपनी कोई संतान नहीं थी, उनकी बहनों के बच्चे और उनकी पीढ़ियां अब तक इस दरगाह का काम संभालती आ रही हैं.

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इस दरगाह पर आने वाले का मज़हब नहीं देखा जाता. यहाँ आने वाला हर शख़्स पीर निज़ामुद्दीन औलिया की मोहब्बत और इबादत में डूबा देखा जा सकता है. इस उम्मीद से कि इस दरगाह पर उसकी फ़रियाद ज़रूर सुनी जाएगी, दूर-दूर से लोग यहाँ आते हैं.

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निज़ामुद्दीन बस्ती का असली नाम गियाज़पुर है. 13वीं सदी में ख़्वाजा निज़ामुद्दीन औलिया यहाँ आकर बस गए. तब से यह बस्ती निज़ामुद्दीन के नाम से मशहूर हो गई.

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उर्स के दौरान बस्ती निज़ामुद्दीन की गलियाँ सूफ़ी कव्वालियों से सराबोर रहती हैं. हिंदुस्तान ही नहीं, पाकिस्तान और अन्य देशों के कव्वालों को भी यहाँ सुना जा सकता है.

यहां दिन-रात निज़ामुद्दीन औलिया की याद में क़व्वाली पेश की जाती है.

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यहाँ दुनियाभर से लोग मुरादें मांगने आते हैं. यहां सारे धर्म एक हो जाते हैं. अमीरी और ग़रीबी का भेद मिट जाता है. आम और ख़ास में कोई फर्क नहीं रह जाता है.

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अमीर ख़ुसरो निज़ामुद्दीन औलिया के सबसे प्रिय शागिर्द थे. क़व्वाली उन्हीं की देन है.आज भी उनके लिखे क़लाम कव्वालियों के रूप में गाए जाते हैं.

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निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के अहाते में कई और दरगाहें भी हैं. इनमें से एक दरगाह शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा की है.

जहाँआरा बेगम की ख़्वाहिश थी की उन्हें निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के सामने ही दफ़नाया जाए. आज भी कई परेशान औरतें अपनी दुआ ख़्वाजा तक पहुँचाने के लिए जहाँआरा की मजार पर मत्था टेकती हैं.

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आज भी दरगाह के अंदर औरतों के जाने पर मनाही है. वो बाहर से ही दुआ पढ़ती हैं.

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