"कैंसर हम लोगन के लील जाई"

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सुबह 08:20 - भारत के प्रतिष्ठित एम्स अस्पताल के ऑन्कोलॉजी (कैंसर से सम्बंधित) विभाग के बाहर क़रीब डेढ़ सौ लोग जमा हो चुके हैं.

सुबह 8:40 - कैंसर पीड़ितों और उनके रिश्तेदारों की संख्या अब ढाई सौ के आसपास होगी. इनमें से कई लोग पिछले कई दिनों से अपने नंबर का इंतज़ार कर रहे हैं.

सुबह 8:55 - कैंसर के इलाज से जुड़ी रेडियोथेरपी और कीमोथेरेपी शुरू होने को है. जिनके नंबर आने वाले हैं वे अपने मर्ज़ को भूल कर दवा मिलने के लिए ऊपर वाले का शुक्रिया अदा कर रहे हैं.

पेशे से किसान, 54 वर्षीय कुलदीप प्रकाश उत्तर प्रदश के इलाहाबाद ज़िले के रहने वाले हैं और पिछले सात महीनों में से पांच उन्हें दिल्ली में बिताने पड़े हैं.

उतनी पत्नी को स्तन-कैंसर है, जिसका इलाज एम्स में चल रहा है.

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कुलदीप इनके इलाज में क़रीब तीन लाख रुपए की जमा-पूँजी ख़र्च कर चुके हैं. लेकिन अब इस बात की राहत है कि भले हफ़्तों बाद नंबर आए, लेकिन सरकारी अस्पताल में सस्ता इलाज मुमकिन तो है.

अगर कुलदीप इसके बजाय किसी बड़े निजी अस्पताल में यही इलाज करवा रहे होते तो अब तक 15-20 लाख रुपए ख़र्च हो चुके होते.

लेकिन कुछ दिनों में भारत के लगभग सभी अस्पतालों में कैंसर के अलावा एचआईवी, हीमोफीलिया और डायबिटीज़ जैसे रोगों के इलाज महंगे होने वाल हैं. इनमें निजी ही नहीं, सरकारी अस्पताल भी शामिल हैं.

केंद्र सरकार ने हाल ही में फ़ैसला किया है कि 76 जीवन रक्षक दवाओं की आयात पर सीमा-शुल्क (कस्टम्स ड्यूटी) में मिलने वाली छूट ख़त्म कर दी जाएगी.

इसका प्रभाव उन दवाओं पर भी पड़ेगा, जो अलग-अलग तरह के कैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं. मौजूदा व्यवस्था में भारत में उनकी क़ीमत कम है.

हालांकि भारत में कैंसर की दवाओं के सस्ते होने की एक वजह यह भी है कि कई भारतीय कंपनियां अब देश में ही ये दवाएं बना रहीं हैं.

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लेकिन इसके बावजूद राजेश चोपड़ा जैसे कई वरिष्ठ ऑन्कोलॉजिस्ट मानते हैं कि ब्लड कैंसर जैसे इलाज के लिए ज़्यादा क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.

उन्होंने कहा, "एड्स और कैंसर जैसी कुछ बड़ी बीमारियों पर क़ाबू पाने के लिए भारत समेत विदेशों में बड़े शोध जारी हैं. कुछ दवाएं आयात होती रहीं हैं. अभी अंदाज़ा लगाना जल्दबाज़ी होगी की दामों में फ़र्क़ कितना पड़ेगा. हो सकता है कि क़ीमतें थोड़ी ही बढ़ें."

इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च के अनुसार भारत में होने वाली हर 1,00 मौतों में से छह की वजह कैंसर होती है.

कैंसर से पीड़ित होने वालों की संख्या में हर साल पांच लाख तक का इज़ाफ़ा हो रहा है.

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एक तरफ़ जहाँ कैंसर के मामले बढ़ते जा रहे है, दूसरी तरफ़ इलाज की ज़रूरते भीं दोगुनी हो रही हैं.

कुछ का मानना है कि इन दवाओं की आयात पर लगने वाले सीमा-शुल्क पर छूट बंद कर देना भारतीय दवा निर्माताओं को प्रोत्साहित करेगा.

भारत में ये दवाएं ज़्यादा बनेंगी और आगे चल कर वे सस्ती भी होती जाएंगी.

इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष एसवी वीरमणि ने कुछ पत्रकारों से कहा, "घबराने की कोई ज़रुरत नहीं है, कुछ दवाओं की क़ीमत में मात्र 2-3% की ही बढ़ोतरी होगी".

हालाँकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने अभी इस मामले पर टिप्पणी नहीं की है, लेकिन मुमकिन है कि इस क़दम के ज़रिए 'मेक इन इंडिया' जैसी स्कीम को बढ़ावा देने की योजना हो.

बहराल, जब मैंने यह बात कुलदीप प्रकाश को बताई तो उनके माथे पर चिंता की कुछ लकीरें बढ़ तो गईं. वे बोल उठे, "कैंसर हम लोगन के लील जाई".

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