'जेएनयू में सफ़ाई अभियान की ज़रूरत है'

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र होने के नाते मौजूदा विवाद को लेकर मेरे अंदर काफ़ी पीड़ा है. और ये केवल मेरी पीड़ा नहीं है, बल्कि मेरे जैसे तमाम दूसरे छात्रों के अंदर भी होगी.

मैं जेएनयू में अंतरराष्ट्रीय राजनीति शास्त्र का छात्र था. मेरे अंदर अंतरराष्ट्रीय समझ इसी संस्था की बदौलत पैदा हुई.

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जेएनयू की पहचान देश के सर्वोच्च शिक्षा संस्थान के रूप में बनी. इसके पीछे कई कारण थे- यहीं पर पहली बार नई शिक्षा व्यवस्था, सेमेस्टर सिस्टम के तौर पर शुरू हुई थी.

लेकिन इन सबके साथ एक बात और हुई. जेएनयू तुष्टिकरण और अल्पसंख्यकवाद जैसी चीजों के लिए के लिए भी अनुकूल बनता गया.

यह मुझे छात्र होने के दौरान भी महसूस हुआ. इसके चलते ही मेरा जुड़ाव राष्ट्रवादी विचार के छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से हुआ. वह राजनीतिक वजहों से नहीं हुआ था, वह केवल राष्ट्रवादी कारणों के चलते हुआ था.

मुझे हमेशा लगता रहा है कि जेएनयू की पहचान शिक्षा के सर्वोच्च संस्थान के बदले राष्ट्र विरोधी संस्था के तौर पर क्यों बन रही है?

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मौजूदा विवाद ही देखिए. जेएनयू में हिंदू संगठनों का, संघ का और भारतीय जनता पार्टी का विरोध हो रहा है. मैं सुप्रीम कोर्ट में वकील भी हूं तो क़ानूनी तौर पर भी इस मसले को देखिए कि एक कैंपस में राष्ट्र विरोधी नारे लग रहे हैं.

जिस आदमी पर संसद पर हमले का आरोप सच साबित हो चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा के फ़ैसले को कायम रखा, उसे फांसी हुई.

उसकी बरसी पर भारत विरोधी नारे लगे हैं. सरकार के विरोध में नारे लगना और यह कहना कि कश्मीर भारत से अलग होना चाहिए. यह सीधे राष्ट्रद्रोह का मामला है.

मुझे लगता है कि ऐसे तत्वों पर सख़्ती चाहिए. न सिर्फ़ जेएनयू प्रशासन से बल्कि समाज से यह सख़्ती होनी चाहिए. समाज में भी कुछ लोग राष्ट्र विरोध और चरमपंथ के लिए नरम रुख़ रखते हैं.

यह केवल वोट की राजनीति के लिए हो रहा है, यह दुखद है.

यह दुनिया के किसी दूसरे देश में नहीं होता है. फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अमरीका में या कहीं भी राष्ट्र का विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाता, भले विरोध करने वाला किसी भी राजनीतिक विचारधारा का हो.

यह भारत में ही वोट की राजनीति का ज़रिया बन जाता है जो शर्मनाक है.

जेएनयू में जैसे तत्व हैं, वैसे दुनियाभर में हैं. हमारे देश की वामपंथी विचारधारा में राष्ट्रवाद के लिए कोई जगह नहीं है, उसकी जगह वे अंतरराष्ट्रीय वाद को मानते हैं. वे दूसरे देश के राष्ट्रवाद को मानते हैं लेकिन अपने देश के राष्ट्रवाद को नहीं मानते.

अफ़सोस है कि दूसरे राजनीतिक दल वामपंथ की इस धारा को आगे बढ़ाते हैं, अल्पसंख्यकवाद के चलते.

जेएनयू के छात्र होने के नाते मुझे यह भी अच्छा नहीं लगा कि शट डाउन जेएनयू हैशटैग ट्रेंड करने लगा है. लेकिन क्रिया के आधार पर प्रतिक्रिया होती है, यह सार्वभौमिक नियम है.

दरअसल जेएनयू प्रशासन और समाज को यह समझना होगा कि जेएनयू का विरोध उसकी छवि के चलते ही हो रहा है.

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मेरा मानना है कि बीते दस सालों के अंदर जेएनयू में राष्ट्रविरोधियों की संख्या बढ़ी है. इससे उसकी छवि गिरती जा रही है. यूपीए सरकार के नरम रवैये के चलते जेएनयू में राष्ट्रविरोधी ताक़तें मुखर होती गईं.

जेएनयू प्रशासन और समाज को ऐसी स्थिति से बचने की ज़रूरत है. मुझे यह भी नहीं लगता है कि जेएनयू को बंद करना चाहिए. यह सही नहीं है.

हां, हमारा ये कहना है कि जेएनयू के अंदर सफ़ाई अभियान लागू होना चाहिए क्योंकि बीते दस सालों के अंदर जेएनयू के अंदर राष्ट्रविरोधी बातें करना सबसे बेहतरीन फ़ैशन बन गया है.

(सिन्हा बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं. ये उनकी निजी राय है और ये लेख बीबीसी संवाददाता प्रदीप कुमार से उनकी बातचीत पर आधारित है.)

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