'जेएनयू को बदनाम ना किया जाए'

  • 15 फरवरी 2016
बीबीसी दफ़्तर में जेएनयू के छात्र

दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में जारी विवाद पर यूनिवर्सिटी के कुछ छात्र बीबीसी दफ़्तर आए और उन्होंने अपनी बात रखी.

इनमें एबीवीपी से सुमित कुमार, वामपंथी समूह की ओर से जयंत कुमार शामिल हुए जबकि मीनाक्षी सरकार, प्रेम मिश्रा और रजनीश पांडे ने बाक़ी छात्रों का पक्ष रखा.

मीडिया में जेएनयू को लेकर आ रही रिपोर्टों पर सुमित कुमार ने कहा, "पूरे जेएनयू को न बदनाम न किया जाए. मीडिया में जो ख़बर आ रही हैं उससे बदनामी तो हो रही है."

वहीं जयंत का कहना था, "पूरी ख़बर आनी चाहिए. हमें मीडिया की ख़बरों से परहेज़ नहीं है. लेकिन दिखाया ये जा रहा है कि वामपंथी समूह इससे जुड़े हैं जबकि सच्चाई ये है कि नारेबाज़ी एक फ़्रिंज ग्रुप ने की जिसमें बीच-बचाव करने कन्हैया भी गए."

इस मुद्दे पर छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को पुलिस ने देशद्रोह के आरोपों में गिरफ्तार किया है.

प्रेम मिश्र का कहना था, "जो भी शामिल थे उन्हें सज़ा मिलनी चाहिए. मीडिया में राष्ट्रवाद को भुनाया जा रहा है. ये मसला विचारधारा का है ना कि जेएनयू में अलग विचारों का."

मीनाक्षी कहती हैं, "हमें मीडिया से परहेज़ नहीं है लेकिन जिस तरह की ख़बरें आ रही हैं वो सही नहीं है."

जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ़्तारी के सवाल पर जयंत कहते हैं, "नारे लगाने वाला मामला भी अदालत में है. बिना पूरी जांच के कार्रवाई उचित नहीं है. जेएनयू के प्रेसिडेंट कन्हैया उस आयोजन से जुड़े नहीं थे. इसलिए उनकी गिरफ़्तारी अवैध है. सरकार को ऐसा क़दम नहीं उठाना चाहिए था."

इस पर एबीवीपी के सुमित कहते हैं, "जयंत की इस बात से असहमत हूं. जांच चल रही है उसी को मानना चाहिए. नाम है तो जांच हो रही है. बाकी कुछ लोग फरार है."

प्रेम मिश्र कहते हैं, "मैं कन्हैया की गिरफ़्तारी की निंदा करता हूं लेकिन उसके ख़िलाफ़ अगर कुछ है भी तो पहले जेएनयू को जांच करनी चाहिए. और उसके बाद पुलिस के पास मामला जाना चाहिए."

इस मुद्दे पर मीनाक्षी कहती हैं, "कन्हैया को ले जाना गलत है लेकिन उन्होंने गलती की है तो सज़ा मिलनी चाहिए. पुलिस को विश्वविद्यालय में आने देना उचित नहीं है."

रजनीश का मानना है, "कन्हैया की गिरफ़्तारी सब ज्यूडिस है. कोर्ट तय करेगा. हम कैसे निंदा करेंगे."

जेएनयू के लिए आगे क्या रास्ता है? इस पर सुमित की राय है, "जांच हो. जांच में जो दोषी पाया जाए. सारे छात्रों को साथ में आना चाहिए. फैकल्टी भी आगे आए और ऐसी चीज़ों को रोके, ताकि आगे ऐसा न हो."

जयंत कहते हैं, "जो लोग उस कार्यक्रम में नहीं थे उनका भी नाम शामिल कर दिया गया. प्रशासन ये सुनिश्चित करे कि पुलिस कैंपस में न आएं. प्रशासन ने छात्रों का नाम दिया ये ठीक नहीं है. पब्लिक डिबेट जैसे होता था वैसे हो. तभी मामला सुधरेगा."

रजनीश कहते हैं, "जांच तो होनी ही चाहिए. दोषी को सज़ा हो. आपको बता दूं कि प्रशासन ने अनुमति रोक दी थी. पुलिस आई और देखती रही. पुलिस तभी हस्तक्षेप कर देती तो मामला इतना नहीं बढ़ता. मीडिया ट्रायल बंद हो जाए."

प्रेम मिश्र कहते हैं, "संस्थान की स्वायत्ता पर ख़तरा न हो. सरकार क्या कर रही है उसमें संस्थान को भी शामिल करे. इस तरह की घटना भविष्य में न हो इसके लिए यूनिवर्सिटी को भी प्रयास करना चाहिए."

मिश्र कहते हैं, "देशद्रोह की धारा ब्रितानी क़ानून से लाई गई है... इसको बदला जाए. व्यापक बहस होनी चाहिए."

मीनाक्षी कहती हैं, "मीडिया ट्रायलबंद हो. पुलिस बाहर जाए कैंपस से. बहस हो. दोषियों को सजा़ हो. देशद्रोह के नारे लगाने वाले बाहर जाएं. लेकिन उनके ख़िलाफ़ भी एक्शन हो जो जेएनयू वालों को देशद्रोही कहते हैं या लड़कियों को वेश्या."

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सरकार के रुख पर प्रेम मिश्र कहते हैं, "सरकार जिस तरह की कार्रवाई कर रही है वो सरकार का बौखलाहट दिखाता है. विश्वविद्यालय में बहस नहीं होगी तो कहां होगी ये गलत उदाहरण बनाया जा रहा है हैं. ऐसा उचित नहीं है."

जेएनयू को ख़ास विचारधारा से जोड़ने पर मीनाक्षी कहती हैं, "जेएनय़ू हर तरह की विचारधारा को जगह देती है. सिर्फ़ कुछ लोगों के कारण जेएनयू को देशद्रोही क़रार देना ठीक नहीं है. मैं न तो लेफ्ट की हूं और न राइट की. ऐसे में मुझे बहुत दुख होता है. प्लीज़ जेएनयू को देशद्रोही के रुप में पेश न करें. इसमें बहुत सारे लोग आते हैं, जो देशद्रोही नहीं हैं. हम पढ़ने आते हैं यहां."

एबीवीपी के सुमित भी मानते हैं कि जिन्होंने नारे लगाए थे उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई चाहिए लेकिन जो बाहर खड़े थे उनके ख़िलाफ़ न हो और जेएनयू के समुदाय को बदनाम न किया जाए.

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