भारतीय मीडिया कितना निष्पक्ष है?

  • 16 फरवरी 2016
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दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में पत्रकारों की पिटाई से मुझे मुंबई का एक किस्सा याद आया. कई साल पहले उस समय के मुंबई पुलिस कमिशनर आरएस शर्मा ने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई जिसमें उन्होंने दावा किया कि एक युवक पुलिस मुठभेड़ में मारा गया है.

पुलिस की स्टोरी में कई खामियां थीं, उसके बावजूद वहां के स्थानीय पत्रकार खामोश रहे.

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मैंने जब सवाल करना शुरू किया तो कमिशनर शर्मा और उनके साथी सत्यपाल सिंह (इन दिनों वो बीजेपी के सांसद हैं) मुझ पर भड़क गए और अपने दफ़्तर से मुझे निकल जाने का आदेश दिया. मैंने कहा 'मुझे यहाँ बुलाया गया है और मेरे सवालों का जवाब आपको देना चाहिए.'

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बाद में कई पत्रकारों ने मुझ से पूछा कि क्या मेरी शर्मा जी से कोई लड़ाई है? मैंने कहा मैं उनसे पहली बार मिल रहा हूँ. मैंने आगे कहा कि 'जो सवाल आप जैसे स्थानीय पत्रकारों को करना चाहिए था वो मैंने किया. आप से चुनौती नहीं मिलती है, वो चुभते सवालों के आदि नहीं हैं, इसलिए वो मुझ पर भड़के.'

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प्रेस कांफ्रेंस के बाद सत्यपाल सिंह ने कहा, "जुबैर जी नाराज़ मत हो, आओ समोसा खाओ, गर्म है."

पत्रकार बंधु समोसा खाने में लग गए. मैं वहां से तुरंत अपने दफ़्तर लौट गया. मुझे आज भी याद है कि मुझे स्थानीय पत्रकारों की ख़ामोशी पर कितनी मायूसी हुई थी.

बाद में सत्यपाल सिंह कमिश्नर बने. लेकिन मुझे उन्होंने हमेशा सम्मान दिया और मेरे सवालों के जवाब दिए.

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दुर्भाग्य से मीडिया पक्षपात का शिकार होता नज़र आता है. पत्रकारिता का पहला पाठ है निष्पक्षता, खास तौर से रिपोर्टिंग और विश्लेषण में. लेकिन पिछले कुछ सालों में मैंने कई शहरों, बस्तियों और मुहल्लों में लोगों को पत्रकारों के बारे में अपमानजनक बातें कहते सुना है.

मीडिया में मूल्यों की गिरावट आई है जिसके कारण समाज में पत्रकारों को जो मुक़ाम हासिल था अब वो कम होता जा रहा है.

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पटियाला हाउस कोर्ट में पत्रकारों की पिटाई के पीछे जिसका भी हाथ था, उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए.

लेकिन दिल्ली पुलिस का खामोश तमाशाई बने रहना क्या साबित करता है? दिल्ली पुलिस के प्रमुख भीम सेन बस्सी का बाद में ये कहना कि ये एक मामूली घटना थी किस बात का संकेत है?

बस्सी का बयान जितना पुलिस की कमज़ोर होती साख को दर्शाता है उतना ही पत्रकारों की साख को भी. कई फ़ील्ड पत्रकारों ने अधिकारियों के आगे अपने मानो आत्मसमर्पण कर दिया है.

मैं 1990 के दशक में कुछ सालों के लिए दिल्ली के एक अंग्रेजी अख़बार में क्राइम रिपोर्टर था. मैंने राजा विजय करन से लेकर मुकुंद बिहारी कौशल जैसे दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को काम करते क़रीब से देखा. मैंने उन्हें गृह मंत्रालय के दबाव को झेलते हुए भी देखा है. साथ ही मैंने उन्हें पत्रकारों की इज़्ज़त करते भी देखा है.

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जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय में उठा विवाद और पटियाला हाउस कोर्ट में पत्रकारों की पिटाई और पिछले कुछ महीनो में इसी तरह की घटनाएं देश में वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारों के बीच चली आ रही टक्कर का हिस्सा हैं. पिछले एक-दो सालों से विचार धारा की लड़ाई तेज़ होती जा रही है.

आपके घर का ड्राइंग-रूम हो या दफ़्तर का बोर्ड रूम, मीडिया वालों का न्यूज़रूम हो या राजनितिक पार्टियों का हेडक्वार्टर, या फिर आपका विश्वविद्यालय हो या समाज, इन दोनो विचारधाराओं में टकराव रोज़ सुनने और देखने को मिल रहा है.

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विवादास्पद मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस का माहौल बने इसका स्वागत होना चाहिए. लेकिन ये बहस और टकराव गैर हिंसक और सभ्य माहौल में हो.

ऐसे में मीडिया की भूमिका अहम हो सकती है. लेकिन हमारे सामने आज मीडिया की जो तस्वीर है वो पक्षपाती है.

एक छोर पर टाइम्स नाउ के संपादक अर्नब गोस्वामी हैं तो दूसरी ओर इंडिया टुडे टीवी के संपादक राजदीप सरदेसाई. सोमवार को राजदीप ने एक ट्वीट में चुटकी लेते हुए कहा कि 'आज के ज़माने में बैलेंस कौन चाहता है? आज हमसे उम्मीद की जाती है कि हम पक्षपाती हों!'

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राजदीप ने भले ही ट्वीट में अपना ये विचार हलके मूड में रखा हो लेकिन मीडिया ने पक्ष लेना शुरू कर दिया है. आज का भारतीय मीडिया अमरीका के मीडिया की राह पर चल पड़ा है जहाँ मीडिया का एक हिस्सा रिपब्लिकन विचारधारा को बढ़ावा देता है और दूसरा हिस्सा डेमोक्रेटिक विचारधारा को.

संतुलित या बीच की आवाज़ जैसे अमरीका में दब कर रह गयी है, वैसे ही भारत में भी दबती नज़र आ रही है.

मेरे एक वरिष्ठ पत्रकार दोस्त ने आज सोशल मीडिया पर लिखा कि वो जेएनयू मुद्दे पर अपनी राय प्रकट नहीं करेंगे. उनका कहना था कि उनकी राय वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों विचारधाराओं को नहीं भाती!

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