भाषाओं से बनती बिगड़ती सियासत और सरहदें

  • 21 फरवरी 2016
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संयुक्त राष्ट्र 21 फ़रवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाता है. 21 फ़रवरी 1952 को पुलिस ने ढाका में उन छात्रों पर फ़ायरिंग की थी, जो उर्दू को राष्ट्रीय भाषा के रूप में थोपने के ख़िलाफ़ थे.

अब्दुस सलाम, रफ़ीक़उद्दीन अहमद, अब्दुल बरकत और अब्दुल जब्बार मारे गए. इसने उस प्रांत की बांग्ला भाषाई पहचान के आधार पर आज़ादी के बीज बोए, जिसने सिर्फ़ छह साल पहले धार्मिक पहचान के आधार पर पाकिस्तान के हक़ में वोट दिया था. आख़िर 1971 में इसी संघर्ष से बांग्लादेश अस्तित्व में आया.

19वीं सदी के हिंदी-उर्दू विवाद में मौजूदा भारतीय राज्य की नींव पड़नी शुरू हुई थी. हिंदुस्तानी इलाक़े के शहरी हिंदू (मोटे तौर पर ऊपरी और मध्य गंगा के मैदानों वाले) उर्दू हटाने के पक्षधर थे, यानी नस्तालिक़ स्क्रिप्ट में लिखी जाने वाली फ़ारसी आधारित हिंदुस्तानी को सरकारी भाषा रखने के बजाय वो संस्कृत आधारित देवनागरी स्क्रिप्ट वाली हिंदी लाना चाहते थे.

उर्दू और हिंदी, मुस्लिम और हिंदू लामबंदी की नुमाइंदगी करने लगीं. इस दौरान हिंदी की बढ़ोत्तरी बेहद अहम हो गई. संभ्रांत हिंदुओं ने हिंदुस्तानी भाषी इलाक़े की कई भाषाओं (जैसे अवधी, भोजपुरी, राजस्थानी और ब्रज आदि) को राजनीतिक तरकीब के तहत नाममात्र के लिए हिंदी से जोड़ दिया, जिन्हें हिंदी में गिना तो गया, पर वो हिंदी भाषाएं नहीं थीं और जिसके दूरगामी नतीजे होने थे.

जहां तक ब्रितानियों के सामने सिफ़ारिश की बात थी तो उनकी ये तरकीब कामयाब रही.

हिंदी को सरकारी भाषा का दर्जा मिला जो पहले से उर्दू के पास था. हिंदी आंदोलन की लामबंदी के दो अहम मुद्दे थे. पहला, उर्दू को सरकारी दर्जा देने से हिंदी वाले नौकरियों में पिछड़ गए थे.

दूसरे, सरकारी काग़ज़ों जैसे उर्दू में लिखे अदालती दस्तावेज़, ग़ैर उर्दूभाषियों की समझ से परे थे.

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विडंबना यह है कि बँटवारे के बाद ग़ैर हिंदीभाषियों को विरासत में वो तमाम समस्याएं मिली हैं, जो 19वीं सदी में हिंदी के साथ थीं.

भारत सरकार ग़ैर हिंदी मातृभाषा में ज़्यादातर अकादमिक और प्रोफ़ेशनल परीक्षाएं (जैसे आईआईटी और एम्स प्रवेश परीक्षा) देने की इजाज़त नहीं देती.

इलाहाबाद हाईकोर्ट को अपना कामकाज हिंदी में करने की इजाज़त है पर मद्रास हाईकोर्ट को तमिल में कामकाज की इजाज़त नहीं. सरकारी तौर पर भारतीय संविधान सिर्फ़ हिंदी और अंग्रेज़ी में ही है.

1947 के बाद 26 जनवरी 1965 तक हिंदी को अकेली सरकारी भाषा बनाने की हिंदुस्तानी राजनीतिक योजनाओं का ग़ैर हिंदीभाषी इलाक़ों में विरोध होने लगा था.

मौजूदा तमिलनाडु में नौजवानों के नेतृत्व में जनांदोलन उठा. सरकार ने तमिलनाडु में सेना और केंद्रीय पुलिस बल भेजकर विरोध को हिंसात्मक ढंग से दबाने की कोशिश की. सैन्यबलों की कार्रवाई में 63 प्रदर्शनकारी मारे गए- ग़ैरसरकारी तौर पर सैकड़ों. विरोध के चलते हिंदी के साथ अंग्रेज़ी अनिश्चितकाल के लिए सरकारी भाषा हो गई.

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1956 से ही अकेडमी ऑफ़ तेलुगु के हिंदी विरोधी सम्मेलन जारी थे. इसी तरह, हिंदुस्तानी इलाक़ों में पहले संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी और फिर जनसंघ अंग्रेज़ी के ख़िलाफ़ छिटपुट प्रदर्शन कर रहे थे. 1965 में एकमात्र सरकारी भाषा की योजना पूरी तरह ढह गई.

इसी तरह श्रीलंका में सिंहला को प्रमुखता देना बाद में तमिल ईलम की मुक्ति के कारणों में एक बना. पाकिस्तान में सिंध और बलोचिस्तान पर पहले ही उर्दू थोपी जा चुकी थी. सिंधी और बलोच राष्ट्रवादियों को इससे काफ़ी बल मिला.

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उपमहाद्वीप में भाषाई आंदोलनों को सिर्फ़ हिंदी-उर्दू और हिंदी-तमिल संघर्ष के आइने में नहीं देख सकते. बँटवारे के बाद जब असम के बंगालीबहुल कचार ज़िले में असमिया को क़ानूनी तौर पर अकेली सरकारी भाषा बनाया गया, तो विरोध शुरू हो गया.

विरोध के केंद्र सिलचर में असम राइफ़ल्स, मद्रास रेजीमेंट और दूसरे सुरक्षाबलों ने फ़्लैग मार्च किया. 19 मई 1961 को विरोध में रखी गई हड़ताल के दिन सुरक्षाबलों ने 11 बांग्ला प्रदर्शनकारियों को मार दिया.

इनमें सिलचर रेलवे स्टेशन के पास मारी गई 16 साल की लड़की कमला भट्टाचार्य भी थीं. इसके बाद कचार में बांग्ला को सरकारी भाषा मान लिया गया.

झारखंड आंदोलन शुरू में सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और भाषाई अधिकारों के लिए वाम-राष्ट्रवादी लामबंदी थी. झारखंड राज्य को जानबूझकर आदिवासी अल्पसंख्यकों के आधार पर बनाया गया, ताकि वहां मौजूद बाहरी लोगों और आर्थिक रूप से मज़बूत लोगों के हित बचाए जा सकें.

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बाक़ी ज़्यादातर सरकारी उद्देश्यों के लिए यह हिंदी राज्य ही है. गोंडी भाषा और संचार में माओवादियों का निवेश अहम है और दकन में सत्ता के उनके आधार के लिए बहुत ज़रूरी भी है, जो गोंडी भाषा-भाषी इलाक़े से होकर गुज़रता है. छत्तीसगढ़ में सरकार प्राथमिक शिक्षा के बहाने गोंडी बोलने वाले बच्चों पर हिंदी थोपती है और इस तरह गोंडों को उनकी अपनी संस्कृति और समाज से दूर करती है.

प्राथमिक शिक्षा के औज़ार का रणनीतिक ढंग से इस्तेमाल नई क्रूर ‘सुरक्षा’ ईजाद है.

जिसे ग़लती से हिंदी बेल्ट कहते हैं, वहां कई भाषाई आंदोलन उमड़ रहे हैं. इनमें हरेक अपनी पहचान चाहता है और हिंदी बोलने वालों में गिनती नहीं कराना चाहता. भोजपुरी और राजस्थानी भाषा आंदोलन इनमें सबसे आगे हैं.

उम्मीद है कि 21 फ़रवरी इन मातृभाषा संघर्षों को ऐसी दुनिया के संकेत के रूप में रेखांकित करे, जहां ‘राष्ट्रीय’ एकता के बहाने कोई एक भाषा न थोपी जाए बल्कि जहां सभी मातृभाषाओं और उनके बोलने वालों को समान अधिकार हासिल हों.

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