'हां, मैं खोज रहा हूँ सपनों का राजकुमार'

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बहुत समय पहले, यहां से बहुत दूर, एक छोटा बच्चा रहता था. वो बॉलीवुड फ़िल्में देखता हुआ बड़ा हुआ और ख़ुद की शादी के बारे में सपने देखता था.

वो रंग-बिरंगे पारंपरिक कपड़े पहनने और मेरी सबसे पसंदीदा अभिनेत्री श्रीदेवी के गाने 'मेरे हाथों में नौ नौ चूड़िया हैं' पर डांस करने के सपने देखता था. वो मेंहदी लगाना भी पसंद करता था.

उसने अपने पसंद के आदमी के साथ फेरे लगाने और शादी की माला पहनने और पहनाने के सपने देखे थे.

आप सही समझ रहे हैं, वो छोटा बच्चा मैं ही था.

भारत में जब कोई बड़ा होता है तो पश्चिमी देशों के अधिकांश लोगों की तरह उसके लिए अरेंज्ड मैरिज का विचार उतना डरावना नहीं लगता.

हर अरेंज्ड मैरिज ज़बर्दस्ती की गई शादी नहीं होती. यह थोड़ा वैसा ही जैसे कि आपके अभिभावक आपके लिए सही साथी से मिलने का बंदोबस्त करते हैं.

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यहां तक कि वेद भी बिना सहमति वाली शादियों को ख़ारिज करते हैं. जैसे राक्षस विवाह वह है, जिसमें एक आदमी ज़बर्दस्ती किसी औरत को पत्नी बनाता है और पिशाच विवाह वह होता है जिसमें एक आदमी एक ऐसी महिला से ज़बर्दस्ती संबंध बनाने की कोशिश करता है, जो मानसिक रूप से अशक्त हो या नशे में हो.

इन दोनों तरह की शादियों को वेद ख़ारिज करते हैं.

लेकिन भारत में ऐसे क़ानून हैं जो लोगों को एक छत के नीचे आने के ख़िलाफ़ हैं.

बाक़ी दुनिया की तरह ही भारत भी आगे बढ़ रहा है. हमारी संस्कृति धीरे-धीरे नए नए विचारों को स्वीकार रही है. जब मैं छोटा था तो पड़ोस में अगर कोई 'लव मैरिज' कर लेता था तो हमारे लिए यह एक छोटे मोटे स्कैंडल जैसा होता था. अब अभिभावक अपने बच्चों को अपना साथी ख़ुद चुनने की आज़ादी दे रहे हैं.

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यहां तक कि हमने ऑनलाइन डेटिंग का भारतीयकरण तक कर दिया है और ऐसी कई वेबसाइटें हैं जो शादी के लिए अपने प्यार की तलाश करने वालों की मदद करती हैं.

मैं हमेशा से जानता था कि मैं प्यार के लिए शादी करूंगा और मैं प्यार खोजूंगा ताकि शादी कर सकूं. मैंने तय किया कि पहले मैं साथी खोजने की कोशिश करूंगा. मैंने थोड़ा बहुत 'डेट' भी किया.

मैं जानता हूँ कि आप हैरान हो रहे होंगे कि मेरे जैसा एक समलैंगिक व्यक्ति एक ऐसे देश में खुलेआम 'डेट' करता है जहां अप्राकृतिक सेक्स को अपराध घोषित करने वाला क़ानून है.

लेकिन वास्तव में यह बहुत ही सामान्य बात है कि दो आदमी एक दूसरे के साथ वक़्त गुजारें, साथ कॉफ़ी पिएं, फ़िल्में देखें और यहां तक कि सार्वजनिक रूप से हाथ में हाथ डाले घूमें.

लोग यही सोचेंगे कि ये दोनों बहुत गहरे दोस्त होंगे. गे आदमी वैसे ही एक साथ रहते हैं जैसे एक ही फ़्लैट में दोस्त और कोई भी उनकी परवाह नहीं करता जब तक कि वो अपनी सेक्सुअलिटी को सार्वजनिक रूप से ज़ाहिर न करें.

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लेकिन उतार-चढ़ाव वाले कई सालों बाद, अक्सर भावनात्मक रूप से अपमानजनक और अनुचित सबंधों के बाद मैं सीधा सामाजिक कार्य से जुड़ गया.

अपने दिल को दुरुस्त करने का सबसे अच्छा तरीक़ा है कि आप दूसरों के टूटे हुए दिलों की मदद करें. अपनी नौकरी, सामाजिक कार्य, मेरी बिल्लियों और मुंबई में सफ़र करने में बीतने वाले लंबे वक़्त के बीच मुझे अपने सपनों के राजकुमार को ढूंढने का समय नहीं मिल पाया था.

मेरी उम्र ज़्यादा हो रही थी और मेरी मां, पद्मा, को चिंता हो रही थी. वो अक्सर ज़ोर देकर पूछती थीं, "जब मैं नहीं रहूँगी तो मेरे बेटे की देखभाल कौन करेगा?"

जब मैं 35 साल का हो गया, मैं थोड़ी असुरक्षा की भावना महसूस करने लगा. क्या मैं एक अकेले गे आदमी की तरह मर जाऊंगा?

मां ने ये मामला अपने हाथ में लेने का फैसला किया और जैसा कि रिवाज़ है, उन्होंने एक अख़बार में विवाह का विज्ञापन दिया. वो जानती थीं कि मुझे जानवरों को पसंद करने वाले एक शाकाहारी व्यक्ति की तलाश थी.

मां मेरे लिए एक ऐसा इंसान चाहती थीं जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो क्योंकि मेरे पूर्व पुरुष मित्रों ने मेरे साथ ऐसा व्यवहार किया था जैसे मैं कोई एटीएम मशीन होऊं.

विज्ञापन का मज़मून तैयार करते हुए, जिसमें अपने 'बेटे के लिए एक दूल्हा चाहिए' लिखा था, मेरी मां ने यह नहीं सोचा कि वो कोई क्रांतिकारी काम कर रही थीं. यह कोई प्रतीकात्मक काम नहीं था.

कुछ भी हो वो एक मां थीं, जो जानती थीं कि जब बच्चे ख़ुद से अपना साथी नहीं तलाश पाते हैं तो अभिभावक विज्ञापन देकर संभावित साथी ढूंढने में मदद करते हैं.

जब मेरी 80 साल की दादी को इस बारे में पता चला तो उन्होंने सलाह दी कि हमें अय्यर लड़का तलाशना चाहिए. दक्षिण भारत में अय्यर एक जाति है.

इस पर हम बहुत हँसे क्योंकि मेरे परिवार में कोई भी जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता है.

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हम तमिल हैं लेकिन मेरे परिवार में महाराष्ट्र के लोग भी हैं. मैं खुद नास्तिक हूँ, जबकि मेरे अभिभावक हिंदू हैं. यही नहीं मेरे परिवार में ईसाई और मुस्लिम भी हैं. मेरी मां ने विज्ञापन में 'जातीय बंदिश नहीं' के आगे 'अय्यर को वरीयता' और जोड़ दिया, ताकि ये खालिस वैवाहिक विज्ञापन लगे.

इसमें उनकी दिल्लगी भी छिपी थी. असल में ये जातिवाद पर एक तंज़ था.

भारत में अधिकांश वैवाहिक विज्ञापनों में साफ़ तौर पर जाति, गोत्र, भाषा आदि के बारे में जानकारी लिखी होती है.

लेकिन इस विज्ञापन को अधिकांश बड़े अख़बारों ने छापने से मना कर दिया, जिसमें 'मिड डे' भी शामिल था. इसके बाद मुंबई का एक टैबलॉयड अख़बार बिना ना-नुकुर के इसे छापने को राज़ी हो गया.

यह कहानी तभी शुरू हुई. मेरे और मेरी मां की तारीफ़ भी हुई और आलोचना भी. एक तरफ़ प्रेस ने इस तरह के एक बहादुराना विज्ञापन के लिए मेरी मां की तारीफ़ की तो कई लोगों ने इसके 'अय्यर को वरीयता' वाले हिस्से की आलोचना की.

हमारा हल्का सा मज़ाक उल्टा हमें ही महँगा पड़ा और अचानक मुझे और मेरी मां को जातिवादी ठहराया जाने लगा.

समलैंगिक (एलजीबीटी) समुदाय के अंदर के लोग शायद सबसे तीखे आलोचक थे. यहां तक कि कई ने कहा कि 'शाकाहार' की शर्त लगाना दलितों और मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जाता है क्योंकि इनमें अधिकांश गैर शाकाहारी होते हैं.

मैं बता दूं कि, खानपान का मसला जाति या धर्म से नहीं जुड़ा है. मैं ऐसे जैनियों को जानता हूँ जो अंडे खाते हैं. मैं शाकाहारी मुस्लिमों और ईसाइयों को भी जानता हूँ.

और साफ़-साफ़ कहूँ तो आप उस परिवार को नहीं चुन सकते जिसमें पैदा हुए हैं, लेकिन आप निश्चित रूप से ये तो चुन ही सकते हैं कि क्या खाया जाए, क्या नहीं.

मैं अपनी प्लेट और किचन में मरे हुए जानवरों के मांस रखा जाना नहीं पसंद करता. और मैं उसे क़तई नहीं चूम सकता जो मरे हुए जानवर खाता है. यह बहुत सामान्य बात है.

मैं इन सबसे बहुत ऊब चुका हूँ. इसलिए मैंने सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देना शुरू किया और अभिभावकों द्वारा सुझाए गए संभावित साथियों के ईमेल देखने लगा.

मैंने इनमें कुछ बहुत ही दिलचस्प लोगों को पाया. मेरी पहली मुलाक़ात एक मंदिर में हुई. मेरी सबसे क़रीबी दोस्त सूरज बड़जात्या टाइप के इस सेटअप के लिए मेरी बहुत खिंचाई की.

उसने कहा, "वाह हरीश! तुम तो 'हम आपके कौन हैं' की रेणुका शहाणे हो."

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अगर मैं ईमानदारी से कहूँ, जब मैं उसे अपने घर वालों से मिलाने ले आया तो उसे चाय और समोसे की रस्मों से गुजरना पड़ा था. लेकिन हम दोनों के बीच बात बनी नहीं.

इसी तरह की कुछ मुलाक़ातें हुईं. मैं ऐसे आदमियों से मिला जिनकी नज़र मेरे मशहूर होने को कैश कराने पर लगी थी.

एक आदमी तो ऐसा मिला जो पार्टियों में मेरा साथी बनकर जाने की उम्मीद कर रहा था ताकि उसे 'बिग बॉस' में जगह मिल सके.

एक बहुत ही सभ्य व्यक्ति मिले जो चाहते थे कि मैं उनके व्यवसाय में पैसा लगाऊं.

कुछ और लोग मिले जो केवल सामाजिक राजनीतिक हैसियत पाना चाहते थे और एक संजीदा और स्थायी संबंध में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी.

समलैंगिक लोग कोई संत नहीं होते हैं. वो वैसे ही धूर्त होते हैं जैसे आम लोग. वो उतने ही लालची, उतने ही निर्दयी होते हैं, जितना कोई हो सकता है.

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मुझे कुछ और यादगार मुलाक़ातें याद हैं. बांद्रा का एक लड़का मुझे ठीक-ठाक लगा. वह एक शाकाहारी ईसाई था, वो वाकई जानवरों से प्यार करने वाला व्यक्ति था.

लेकिन वो दिल्ली में एक बहुत अच्छी तनख़्वाह वाली नौकरी करता था और चाहता था कि मैं भी दिल्ली आ जाऊं. मैं ये नहीं कर सका और उसने इस बात को समझा. हम एक दोस्त की तरह एक दूसरे से अलग हुए.

मैं जबसे अलग अलग लोगों से 'डेट' कर रहा हूँ, तबसे कुछ ही महीने हुए हैं. लेकिन मैं और बूढ़ा हो रहा हूँ और सही कहूँ तो मेरी इसमें थोड़ी दिलचस्पी भी कम हुई है.

हालांकि मुझे अभी भी अपने सपनों के राजकुमार की तलाश है. मैं प्यार में विश्वास करता हूँ और मैंने अभी उम्मीद नहीं छोड़ी है. मैं जानता हूँ कि प्रकृति सुन रही है.

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