एक महिला ने बदल दी पूरे गांव की तस्वीर

Image caption शांता

अगर इरादे फ़ौलादी हों तो ज़िंदगी में कुछ भी हासिल किया जा सकता है. मज़बूत इरादों से बुलंदियों पर पहुंचने की ऐसी ही कहानी हम आपको सुनाते हैं.

ये कहानी है तमिलनाडु की रहने वाली शांता की. बेहद ग़रीब परिवार से ताल्लुक़ रखने वाली शांता, पूरे इलाक़े के लिए मिसाल बन गई हैं. अपनी मेहनत और मज़बूत इरादों से वो पूरे के पूरे गांव को तरक़्क़ी की राह पर चला रही हैं.

तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से यही कोई दो सौ किलोमीटर की दूरी पर है शांता का गांव, कोडापट्टिनम. आज से बीस बरस पहले, ये गांव भी इलाक़े के दूसरे गांवों जैसा था. गुरबत का मारा. लोग झोपड़ियों-कच्चे मकानों में रहते थे. दो वक़्त का खाना जुटाना मुश्किल होता था.

घर में आम तौर पर कमाने वाला एक ही इंसान होता था. घर का मर्द. मुसीबतों से जूझते गांव के आदमी भी अक्सर नशे की गिरफ़्त में आ जाते थे. गांव की औरतों की हालत तो और भी ख़राब थी. अपने पति-बच्चों का ख़याल रखो. खाना पकाओ खिलाओ. ये सब करते करते कई बार तो औरतों को दो वक़्त का खाना भी नहीं मिलता था.

ग़रीबी के मारे ऐसे ही गांव में बरसों पहले ब्याह कर आईं थीं शांता. सिर्फ़ नौ बरस की उम्र में. खेलने-कूदने की उम्र में परिवार की ज़िम्मेदारी आ गई थी. मगर, बुलंद हौसलों वाली शकुंतला ने आते ही घर-बार संभाल लिया.

घर के काम-काज से फ़ुरसत हों, तो पास-पड़ोस की महिलाओं से बात हो. सबकी मुसीबतें सुन-सुनकर, उनके दिल में ऐसे हालात बदल डालने का इऱादा मज़बूत होता गया.

इसकी कोई राह नहीं दिख रही थी.

मगर, शांता को नई उम्मीदों का दरवाज़ा खुलता दिखाई दिया, आज से क़रीब पंद्रह साल पहले. जब एक सरकारी दफ़्तर में उन्हें काम करने का ऑफ़र मिला. इस काम के उन्हें पैसे नहीं मिलने थे, कुछ भी.

दफ़्तर वालों ने कहा कि वो उन्हें सिर्फ़ आने-जाने का किराया देंगे. लेकिन, यहां काम करके वो आगे बढ़ने के बहुत से रास्ते तलाश सकती हैं.

शांता को भी लगा, पैसे भले न मिलें, वो बाहर निकलेंगी, दुनिया देखेंगी तो ख़ुद की क़िस्मत बदलने के नए रास्ते भी दिखेंगे.

जिस सरकारी दफ़्तर में शांता बिना पैसों के काम करती थीं, वो महिलाओं को स्वयं सहायता समूह, यानी सेल्फ़ हेल्प ग्रुप बनाकर काम करने में मदद करता था.

शांता को यहीं काम करते करते सूझा कि ऐसा तो वो अपने गांव में कर सकती हैं. गांव की महिलाओं को जोड़कर. सब थोड़े-थोड़े पैसे देंगे तो कोई न कोई काम शुरू हो जाएगा.

मगर, ये सोचना आसान था, करना बेहद मुश्किल. जब शांता गांव की महिलाओं से मिलीं, तो पहले किसी को ये आइडिया ही समझ नहीं आया. किसी की दिलचस्पी नहीं थी. ग़रीबी इतनी कि शांता ने जब सबको सिर्फ़ दस रुपए महीने जमा करने को कहा, तो गांव की महिलाों के पास इतने पैसे भी नहीं थे.

महीनों तक शांता, गांव की महिलाओं को समझाती रहीं. घरों के दरवाज़े खटखटाकर, नए रास्ते पर चलने के लिए रा़ज़ी करती रहीं. गांव में चावल होता था. सो उन्होंने महिलाओं से कहा कि वो रोज़ाना थोड़ा-थोड़ा चावल बचाएं. जब एक किलो जमा हो जाए, तो ले जाकर पास के बाज़ार में बेच दें. इससे दस रुपए महीने जमा होने लगे. आख़िरकार शांता की मेहनत रंग लाई.

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क़रीब दो साल की कोशिशों के बावजूद, उन्होंने अपने गांव की बीस महिलाओं को दस रुपए महीने के योगदान से एक सेल्फ़ हेल्प ग्रुप बनाने के लिए राज़ी कर लिया था.

सरकारी बैंक, ऐसे समूहों के पैसे के बराबर रकम कर्ज़ देते थे, ताकि महिलाएं मिलकर छोटा-मोटा काम कर सकें.

मगर, शांता के सामने नई चुनौती खड़ी थी. बैंक वाले उनकी बातें सुनने को तैयार ही नहीं थे. क़रीब छह महीने की कोशिश के बावजूद जब नाकामी ही हाथ लगी. फिर, उन्होंने जब सरकारी दफ़्तर के पुराने साथियों से मदद मांगी, तो उन्होंने शांता को टका सा जवाब दे दिया कि अपनी लड़ाई उन्हें ख़ुद लड़नी होगी.

हां, एक नुस्खा ज़रूर सुझाया कि वो अकेले बैंक न जाएं, बल्कि, अपनी दोस्तों के साथ जाएं, तब बैंक के अफ़सर उन्हें सीरियसली लेंगे.

शांता ने ऐसा ही किया. आख़िरकार उनकी ये कोशिश भी कामयाब हुई. शांता और उनकी बाक़ी दोस्तों का पहला बिजनेस प्लान बैंक ने मान लिया और कर्ज़ देने को भी राज़ी हो गया.

शांता और उनकी महिला दोस्तों ने मिलकर कुछ गायें ख़रीदी और दूध का धंधा शुरू किया.

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शांता की मज़बूत सोच और कोशिशों की वजह से वो और गांव की दूसरी महिलाएं, नई उम्मीद की राह पर चल पड़ी थीं. सबसे बड़ी बात ये कि सब एक दूसरे की दिक़्कतें समझती थीं. इससे कोई भी अपने हिस्से का पैसा जमा करने में देर नहीं करती थीं. बैंक ने भी इन महिलाओं के हौसले को देखा.

जल्द ही शांता ने और महिलाओं को जोड़ा और नया काम शुरू किया. वो बाज़ार में, गांव में यूं ही घूमते-टहलते महिलाओं से बात करती थीं. उनमें हौसला जगाती थीं. जल्द ही बीस और महिलाओं का ग्रुप तैयार था, नए मिशन के लिए.

शांता ने इनके साथ सिलाई मशीनें ख़रीदकर कपड़े सीने का काम शुरू किया. एक औऱ आइडिया आया, म्यूज़िक सिस्टम ख़रीदकर, गांव में किसी त्यौहार या शादी के वक़्त उसे किराए पर देने का.

जब पहले पहल शांता ने सेल्फ़-हेल्प ग्रुप में महिलाओं को जोड़ने का इरादा जताया था. तो, गांव के मर्दों ने, यहां तक के उनके पति ने उनका मजाक़ बनाया था. कई महिलाओं को तो घर मे विरोध और मार-पीट तक झेलनी पड़ी. मगर उनके इरादे पक्के थे.

और, जब एक के बाद एक, शांता के कारोबारी प्लान कामयाब होने लगे, तो उन पर लोगों का भरोसा बढ़ता गया. क़रीब सवा सौ परिवारों वाले गांव में शुरू मे जहां बीस महिलाएं जुटाना मुश्किल हो रहा था. वहीं अब हर घर की महिलाएं, शांता के साथ जुड़ना चाहती थीं.

कारोबार चला, तो पैसे आने लगे. पैसे आए. तो गांव की झोपड़ियां, पक्के मकानों में तब्दील होने लगे. घर में सुख-सुविधा की दूसरी चीज़ें आने लगीं. जैसे टीवी, गैस चूल्हा या मोटरसाइकिल.

महिलाएं अब हर बात के लिए अपने पतियों के भरोसे नहीं थीं. वो मर्दों के कंधे से कंधा मिलाकर घर की कमाई में योगदान दे रही थीं. पैसे आने लगे तो ग़रीबी का अंधेरा छंटा. ख़ुद तो नहीं पढ़ी लिखी थीं.

मगर शकुंतला ने अपने बेटे को अच्छी से अच्छी पढ़ाई कराने का फ़ैसला किया. गांव की दूसरी महिलाओं ने भी शांता की देखा-देखी अपने बच्चों की पढ़ाई और दूसरी ज़रूरतों पर ध्यान देना शुरू कर दिया.

आमदनी बढ़ी तो चार पैसे बचाने की भी सूझी. किसी ने सोने-चांदी में निवेश किया तो किसी ने बैंक में पैसे जमा कराए. वो बैंक जो कभी इन महिलाओं की बात सुनने को तैयार नहीं थे, आज इन महिलाओं को सम्मान की नज़र से देखते थे. दूसरों को उनकी मिसालें दिया करते थे.

साल 2009 में एक और बड़ा मौक़ा, शांता के हाथ लगा. जिस सरकारी दफ़्तर में वो काम करती थीं, पहले, वहां के उनके साथियों ने बताया कि चेन्नई की एक कंपनी बैग बनाने का अपना काम करने के लिए लोग तलाश रही थी. ये बड़ा मौक़ा था. शांता हर हाल में इसे हासिल करना चाहती थीं.

उन्होंने अपने पुराने साथियों की मदद से चेन्नई की कंपनी से बात शुरू की. उनका अच्छा ट्रैक रिकॉर्ड देखकर कंपनी ने बैग बनाने का ठेका उन्हें दे दिया. ये बहुत बड़ी कामयाबी थी. शांता के सेल्फ हेल्प ग्रुप की शोहरत राजधानी चेन्नई तक जा पहुंची थी. नई उम्मी के दरवाज़े खुल रहे थे.

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अब सिर्फ़ गांव में ही नहीं, पूरे इलाक़े में शांता की धाक है. आज उनकी बैग बनाने वाली यूनिट में 26 महिलाएं काम करती हैं. महिलाओं को एक दूसरे से जोड़कर नया ग्रुप बनाना और उनकी ज़िंदगियां बदलना आज शांता का मिशन बन गया है.

15 साल पहले जो नई राह शांता ने पकड़ी थी, आज उनका गांव उसी तरक़्क़ी की राह पर चल पड़ा है. गांव का चेहरा बदल गया है. पास पड़ोस के गांवों की महिलाएं आज उनसे मशविरे लेने आती हैं.

शांता के मज़बूत इरादों ने गांव की महिलाओं को सम्मान से जीने का मौक़ा दिया है. उनके गांव की कई महिलाएं, जो कभी अपने पतियों के अंगूठे तले रहती थीं, वो आज सिर उठाकर जीती हैं. कइयों को अपने शराबी पतियों से छुटकारा मिला है.

ऐसी ही एक महिला हैं, कृष्णावेनी. पड़ोस के गांव की रहने वाली कृष्णा के शराबी पति ने एक बार उन्हें सोते वक़्त मिट्टी का तेल छिड़ककर जलाने की कोशिश की थी. बमुश्किल उनकी जान बची. इलाज़ के लिए भी पैसे नहीं थे. वो शांता के गांव में रहने वाली अपनी बहन के पास रहने आईं.

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जब शांता को कृष्णा के बारे में पता चला तो उन्होंने कृष्णा को अपने साथ जोड़ लिया. आज कृष्णा अपने पैरों पर खड़ी है. उसे शराबी पति से भी छुटकारा मिल गया है.

शांता के परिवार में भी बड़ी तब्दीली आई है. उनका बेचा मानिकनंदन इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके एक बड़ी कंपनी में काम करता है. वो कहता है कि ऐसा उसकी मां की वजह से ही हुआ. वरना, दूसरे लोगों की तरह ग़रीबी के चलते पढ़ाई छोड़कर परिवार की मदद के लिए काम करना पड़ता.

शांता की कामयाबी की मदद से अब पास के गांवों की महिलाएं भी सीख रही हैं. जो बैंक कभी उनका खाता खोलने तक को तैयार नहीं था, वो अब उन्हें इन महिलाओं को सलाह देने के लिए बुलाता है. ताकि उनकी ज़िंदगियों में भी नई रौशनी आए.

पंद्रह साल पहले, तरक़्क़ी की जिस डगर पर शांता अकेले चल पड़ी थीं, आज पूरा कारवां उनके साथ चल पड़ा है.

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