'चाहते तो हैं पकड़कर चीर दें लेकिन...'

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पिछले शुक्रवार रिलीज हुई फ़िल्म 'नीरजा' 1986 में हाइजैक किए गए 'पैन अमरीकन वर्ल्ड एयरवेज़ फ़्लाइट 73' और इसकी एयर होस्टेस नीरजा भनोट की याद दिलाती है.

'पैन अमरीकन वर्ल्ड एयरवेज़ फ़्लाइट 73' मुंबई से कराची और फ्रैंकफ्रंट होते हुए न्यूयॉर्क जा रही थी. रास्ते में इसे कराची में अगवा कर लिया गया था.

यह कहानी आप शायद जानते भी हों. फ़िल्म 'नीरजा' के फ़िल्मकारों का इसके लिए शुक्रगुज़ार होना चाहिए कि उन्होंने इसे पश्चिमी प्रभाव से बाहर रखा है.

पश्चिमी प्रभाव के तहत जो फ़िल्मांकन अभी तक होता आया है, उसमें ज़्यादातर ब्रिटिश और अमरीकी नागरिकों को जगह दी गई है.

भारतीयों को इसमें बहुत कम जगह दी जाती थी, जबकि मारे जाने वालों में ज़्यादातर भारतीय थे. नीरजा की भूमिका को भी औपचारिक तौर पर दिखाया गया था.

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हाईजैक में शामिल चार अपहर्ताओं ने ख़ुद को और विमान को उड़ाने की योजना बनाई थी, लेकिन 16 घंटे बाद बिजली कटने के कारण वो ऐसा कर नहीं सके.

उन्हें गिरफ़्तार किया गया और पाकिस्तान की जेल में डाल दिया गया. उनकी मौत की सज़ा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया, क्योंकि वे फ़लस्तीनी मुस्लिम लड़ाके अपनी मातृभूमि के लिए लड़ रहे थे.

मुख्य हाईजैकर ज़ायद हसन अब्द अल-लतीफ़ मसूद अल-साफ़ारीनी को पाकिस्तान ने 2001 में अमरीकी जांच एजेंसी फ़ेडरल ब्यूरो ऑफ़ इंवेस्टिगेशन (एफ़बीआई) को सौंप दिया.

उन्हें 2004 में अमरीका ले जाया गया. यहां उन्हें 160 साल की सज़ा सुनाई गई.

भारत के विपरीत अमरीका में समझौता याचिका का प्रावधान है. अपराध स्वीकार करने और सुनवाई में सहयोग करने की हालत में दोषी को मौत की सज़ा नहीं दी जाती है.

1986 में जो शख़्स खुद को जलाकर मारने को तैयार था, वह 2004 में जीना चाहता था.

1986 में हाईजैक के दौरान उसने कहा था, "इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि हम जीते हैं या मरते हैं. इसके उलट हम मौत और शहादत से ज़्यादा कुछ नहीं चाहते."

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डेविड हेडली हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए भारतीय कोर्ट में उपस्थित हुए और सवालों का जवाब दिया है. उन्हें भी इस वक़्त समझौता याचिका का लाभ मिल रहा है.

अमरीकी कोर्ट में हुई साफ़ारीनी की सुनवाई पर भी अलग से एक फ़िल्म बनाई जा सकती है.

फ़्लाइट में बचे क़रीब 50 लोग और मारे गए लोगों के परिजन, जो पांच देशों से आए, वाशिंगटन में हुई इस सुनवाई में शामिल हुए थे.

दो दिनों की सुनवाई में उनमें से कई को साफ़ारीनी से अपनी बात कहने का मौक़ा मिला था. जब साफ़ारीनी ने कोर्ट को संबोधित किया, तो हर किसी को अचरज हुआ.

फ़्लाइट के एक कर्मचारी सनसाइन वेसुवेला ने कोर्ट से कहा कि एक अमरीकी नागरिक को मारने से पहले साफ़ारीनी ने उससे पूछा था, "क्या तुम मर्द हो?"

वेसुवेला आगे साफ़ारीनी के बारे में कहते हैं, "वह क्या बात है जो किसी को मर्द बनाती है? एक हथियार? वह मर्द नहीं है. जब जहाज़ का दरवाज़ा खुला था तो वह फ़्लाइट के कर्मचारियों के पीछे छिप गया था."

प्रभात कृष्णास्वामी के पिता इस हाईजैक में मारे गए थे. उन्होंने कहा, "हम पीड़ित चाहते तो हैं कि इस इंसान को पकड़कर चीर दें लेकिन हम क़ानून व्यवस्था में यक़ीन रखते हैं."

सीएनएन के पास कोर्टरूम में दो दिन तक चले इस ड्रामे का पूरा लेखा-जोखा है.

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हादसे में बचे लोगों ने साफ़ारीनी को एक के बाद एक कई नामों से संबोधित किया. किसी ने उन्हें जानवर कहा तो किसी ने उन्हें बुराइयों का देवता कहा. उन्होंने किसी की आंख में आंख मिलाकर नहीं देखा.

लेकिन जब सबने अपनी बात कह ली तो साफ़ारीनी ने 18 साल में पहली बार अपनी ज़ुबान खोली. वह गवाह की कुर्सी पर बैठे ताकि सभी से आमने-सामने होकर बात कर सकें.

उन्होंने कहा, "जो हुआ उसके लिए मैं बहुत दुखी हूँ. मैं आपकी सभी तकलीफ़ों की ज़िम्मेवारी लेता हूँ. मैं दिल से दुखी हूँ. अगर आप मानते हैं कि मेरे पास दिल नहीं, तो मैं मान लेता हूँ. मैं मानता हूँ कि मैं प्लेन में ही मर गया था. मैं तकलीफ़ों से गुज़र रहा हूँ. मैं अपनी जेल की कोठरी में बैठा रहता हूँ. अब कोई उम्मीद नहीं. कोई अहसास नहीं. मैं जानता हूँ कि मैं ख़ुद ही मर जाऊंगा. मैं अपने परिवार को कभी दोबारा नहीं देख पाऊंगा."

उन्होंने आगे कहा, "मैं अमरीका से नफ़रत नहीं करता. वास्तव में मैं इस देश की परंपरा, रीति-रिवाज़, आज़ादी की तारीफ़ करता हूँ. जब मैं इस वारदात को अंजाम दे रहा था तो मुझे यक़ीन था कि मैं फ़लस्तीनियों के अपने देश के सपने को पूरा करने में मदद कर रहा हूँ. अब मेरा पूरा यक़ीन है कि इस संगठन (अबू निदाल) का यह मक़सद नहीं था. मुझे पता है कि मेरा इस्तेमाल किया गया और ऐसे ही दूसरों का भी इस्तेमाल किया गया है. मैं ग़लत था और जो लोग मारे गए, वो निर्दोष थे. मेरा ब्रेनवॉश किया गया था."

जज ने तब वहां मौजूद लोगों से प्रतिक्रिया देने को कहा. वहां मौजूद अधिकतर लोगों ने कुछ नहीं कहा और जज भी चुप रहे.

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गार्गी दवे हाइजैक किए गए उस प्लेन पर सवार थीं. वे उस वक़्त बच्ची थीं, अब क़ानून की छात्रा हैं.

वह महसूस करती हैं, "उनके सीने में भी दिल है. वह हमारी और आपकी तरह ही एक इंसान हैं. मैं उन्हें एक जल्लाद नहीं मानती."

साफ़ारीनी को एकांतवास में रखा गया था. उम्मीद है कि पैरोल की कोई गुंजाइश नहीं है.

वह एक ज़िंदा लाश की तरह हैं, लेकिन उन्हें मौत की सज़ा न देकर अमरीकी न्याय व्यवस्था ने पीड़ितों को साफ़ारीनी के बंदी होने का अहसास दिलाया है.

इस हमले में ब्रिटेन के बचे एक यात्री माइकल थेक्सटन का कहना है, "मुझे नहीं पता कि मैं उस पर यक़ीन करूँ या नहीं. लेकिन अगर उससे दूसरे चरमपंथियों को संदेश जाता है, तो यह अच्छाई की ताक़त होगी.

साफ़ारीनी का पछतावा अच्छाई का संदेश था. यह उन उदाहरणों में है जो इस पर बल देता है कि अमरीका के साथ-साथ भारत में भी मौत की सज़ा ख़त्म करने की ज़रूरत है.

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