कांग्रेस-वाम की क़रीबी से उड़ी 'दीदी' की नींद

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पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और वाम दलों के बीच चुनावी गठबंधन की संभावना ने तृणमूल कांग्रेस की चिंता भी बढ़ा दी है.

भारतीय मार्क्सवादी पार्टी (सीपीएम) की केंद्रीय कमेटी ने हाल ही में ये कहते हुए इन संभावनाओं को स्पष्ट किया है, "ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस की फ़ासीवादी तानाशाही सरकार को हराने के लिए सभी जनवादी ताक़तों का एक व्यापक गठबंधन ज़रूरी हो गया है."

माकपा के इस प्रस्ताव से पहले कांग्रेस और वाम दलों की साथ साथ प्रत्यक्ष और परोक्ष गर्मजोशी भरी कार्रवाइयां हुई हैं.

कांग्रेस ने 294 सदस्यों वाली पश्चिम बंगाल विधानसभा में 104 सीटों की मांग की है. लेकिन ऐसा लग रहा है कि प्रमुख वामदल माकपा, कांग्रेस को उतनी सीटें देना नहीं चाहता, जितना कि वो मांग रही है.

लेकिन आरएसपी (रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी) और फॉरवर्ड ब्लॉक जैसे छोटे वाम दल चिंतित हैं.

आरएसपी के मनोज भट्टाचार्या ने कहा, "हम कम से कम 30 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं." उन्होंने ये भी कहा कि उनकी पार्टी इससे कम पर नहीं मानेगी.

जबकि फॉरवर्ड ब्लॉक इससे भी ज़्यादा सीटें चाहती है.

वरिष्ठ राजनीतिक टिप्पणीकार सुखरंजन दासगुप्ता कहते हैं, "इससे ममता बनर्जी को ऐसे छोटे वाम दलों पर बढ़त बनाने का मौका मिलेगा, जो राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि से पैदा हुए हैं, जैसे कि आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक."

दासगुप्ता वाम दलों और कांग्रेस के बीच बातचीत में शामिल रहे हैं.

वो कहते हैं, "मैंने छोटे वाम दलों को चेताया है कि अगर वो चंद सीटों के लिए ममता की ओर झुकते हैं तो बंगाल की जनता उन्हें माफ़ नहीं करेगी."

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दासगुप्ता ने कहा कि ममता फॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी को बढ़ावा देकर वाम एकता को तोड़ने के लिए सारा ज़ोर लगा देंगी.

ममता ने कहा था, "क्या हमें फॉरवर्ड ब्लॉक को ये याद दिलाना पड़ेगा कि पार्टी की नींव रखने वाले ये नेताजी ही थे, जिनके साथ कांग्रेस और वाम दलों ने बहुत बुरा बर्ताव किया था?"

तृणमूल ने पिछला विधानसभा चुनाव 2011 में कांग्रेस के साथ मिलकर लड़ा था.

दो साल बाद पार्टी के दायरे में लौटे तृणमूल रणनीतिकार मुकुल रॉय कहते हैं, "पिछली बार जिनती सीटें हमने कांग्रेस को दी थीं, उनमें से ज़्यादातर सीटें फॉरवर्ड ब्लॉक और आरएसपी को आसानी से दे सकते हैं. अल्पसंख्यकों के लिए भी कुछ सीटें छोड़ी जा सकती हैं. जल्द ही नए समीकरण सामने आ सकते हैं."

अगर इन दबावों में वाम मोर्चा नहीं टूटता है तो कांग्रेस से गठबंधन करने में वो तृणमूल को पीछे छोड़ देगा.

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कुछ कांग्रेस नेताओं और चुनावी विशेषज्ञों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों में कहा गया है कि कांग्रेस और वाम मोर्चा गठबंधन 161 से ज़्यादा सीटें जीत सकता है जबकि तृणमूल का आंकड़ा 130 से भी नीचे जा सकता है.

सर्वे में शामिल रहे प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश मिश्रा कहते हैं, "लेकिन इसके लिए गठबंधन पर दो महीने पहले ही मुहर लगानी होगी और इसे जमीनी स्तर पर भी काम करना होगा."

शीर्ष कांग्रेस नेता अब्दुल मानन कहते हैं, "हम सीटों की संख्या पर लड़ाई नहीं करेंगे...हम 105 से 110 सीटों की मांग करेंगे, लेकिन इससे कम पर भी बात बन जाएगी. हमने बिहार से सबक सीखा है. अगर हम कुछ ही कम सीटों पर चुनाव लड़ते हैं, लेकिन गठबंधन में बने रहते हैं, तो हमारा जीत का प्रतिशत अधिक रहेगा."

माकपा की बंगाल इकाई ने गठबंधन के लिए सबकुछ दांव पर लगा दिया था. उसने प्रकाश करात के नेतृत्व वाले केरल ग्रुप के उस विचार को नाकाम करने के लिए भी पूरा जोर लगा दिया, जिसमें कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाए रखने पर जोर दिया गया था.

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बंगाल से आने वाले केंद्रीय कमेटी के एक वरिष्ठ सदस्य बिना अपनी पहचान ज़ाहिर किए कहते हैं, "केंद्रीय कमेटी में बहुत तीखी बहस हुई, यहां तक कि कामरेड करात की मंशा पर भी सवाल खड़े किए गए. लेकिन जो फैसला हुआ वो बहुत अच्छा हुआ. अब हमारे पास लड़ाई में बने रहने का एक मौका है."

पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्या के नज़दीकी रहे सूर्य कांत मिश्रा और गौतम देब जैसे बंगाल के नेता कहते हैं कि यह अभी नहीं तो कभी नहीं जैसा था.

केंद्रीय कमेटी के सदस्य मोहम्मद सलीम कहते हैं, "अगर पार्टी बंगाल में सत्ता में आने में नाकाम रहती है तो पूरे देश में इसकी गतिविधियों पर उल्टा असर पड़ेगा. यह अच्छा ही हुआ कि इस बुनियादी सच्चाई को आखिरकार समझा गया."

चुनाव विश्लेषक कहते हैं कि कांग्रेस में ये क्षमता है कि वो गठबंधन की ओर मुस्लिम मतदाताओं की एक बड़ी संख्या को खींच ले.

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राजनीतिक विश्लेषक आशीष बिस्वास कहते हैं, "2014 के लोकसभा चुनावों पर नज़र दौड़ाइए, बंगाली मुस्लिमों ने कांग्रेस को वोट किया था और यह दोबारा होगा. वाम मोर्चे को उद्योग, रोज़गार और बेहतर कानून व्यवस्था का वादा कर ग्रामीण ग़रीबों और औद्योगिक मज़दूरों में अपनी पैठ बढ़ानी होगी. यह काफी कारगर हो सकता है."

लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि तृणमूल के 'आपराधिक तत्वों की ताक़त' के सामने खड़े होने की गठबंधन की क्षमता ही चुनाव जीतने की असली चाबी है.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश अशोक गांगुली कहते हैं, "अगर वाम-कांग्रेस गठबंधन तृणमूल के आपराधिक धमकियों की हवा को नहीं रोक सका, तो उनके जीतने की कम ही गुंजाइश है."

गांगुली के चुनावों में कांग्रेस-वाम मोर्चे के संयुक्त प्रत्याशी के रूप में खड़े होने की संभावना है.

ममता बनर्जी ने उन्हें राज्य मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष पद से बहुत विवादास्पद ढंग से हटा दिया था.

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