जेल में रेडियो जॉकी संजय का ऐसे बीतता था दिन..

  • 25 फरवरी 2016
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अभिनेता संजय दत्त जब मुंबई की पुणे जेल से निकले तो वे अपने साथ पेपर बैग बनाने और रेडियो जॉकी होने का अनुभव लेकर निकले.

दत्त को अवैध रूप से हथियार रखने के आरोप में पांच साल की सजा हुई थी.

1993 में 12 मार्च को मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे. इनमें 257 लोगों की मौत हुई थी और 713 लोग घायल हो गए थे.

संजय दत्त को अबू सलेम और रियाज़ सिद्दीक़ी से अवैध बंदूकों की डिलीवरी लेने, उन्हें रखने और फिर नष्ट करने का दोषी माना गया था.

लेकिन संजय ने ये कहते हुए सफाई दी कि 1993 में हिंदू-मुस्लिम दंगों के कारण अपने परिवार की सुरक्षा के लिए उन्हें हथियार रखना ज़रूरी लगा था.

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साल 2013 में संजय दत्त को पांच साल की सजा हुई और उन्हें मई 2013 में यरवडा जेल भेज दिया गया.

लेकिन अच्छे व्यवहार और सकारात्मक गतिविधियों के कारण, जिसमें रेडियो कार्यक्रम का संचालन भी है, उन्हें सजा में 144 दिनों की छूट मिली.

हालांकि उनकी जल्दी रिहाई को लेकर कुछ लोगों ने आलोचना भी की है.

कहा जा रहा है कि सेलेब्रिटी होने के कारण संजय को पहले ही अनुचित पेरोल दिया गया और फ़रलो नियम के तहत जेल से बाहर आने की छूट मिली.

जेल में दत्त 8 गुणा 10 फीट के सेल में रहे और कैदियों की तरह सफेद पोशाक पहनी.

उनके सेल के सामने 100 वर्ग फीट का एक बाग़ीचा था. वहां उन्हें सुरक्षाकर्मियों की निगरानी में चहल-कदमी करने की इज़ाजत थी.

उनके एक पूर्व साथी क़ैदी के मुताबिक़ अभिनेता ने जेल में अपनी क़िस्मत से समझौता तो कर लिया था, लेकिन उन्हें विश्वास था कि अच्छे व्यवहार के कारण वे जल्दी रिहा हो सकते हैं.

संजय दत्त को हाई सिक्योरिटी सेल में रखा गया था और सुरक्षा कारणों के कारण उन्हें दूसरे कैद़ियों से बात करने की इज़ाजत नहीं थी.

वे जब भी कॉमन एरिया में आते तो उनके साथ चार पुलिसवाले साथ में होते थे.

यदि वह दूसरे क़ैदियों के साथ बात करते तो उसे भी सुना जाता था.

उनके एक पूर्व साथी क़ैदी ने बताया कि जेल का लाइब्रेरियन होने के नाते वह मुझसे बात किया करते थे.

जेल में बाबा नाम से पुकारे जाने वाले संजय दत्त लाइब्रेरी से रोज़ाना दो किताबें लिया करते थे. वहां वे खूब पढ़ते थे, ख़ासतौर पर मुंशी प्रेमचंद का हिंदी साहित्य.

साथी कैदी बताते हैं कि संजय दत्त अख़बारों में भी मग्न रहते थे.

कॉमन एरिया में 150 क़ैदियों के लिए एक टीवी सेट उपलब्ध था, लेकिन बाबा का सेल हाई सिक्योरिटी में होने के कारण उन्हें यह सुविधा नहीं मिली थी.

संजय दत्त के वकील हितेश जैन का कहना है कि जेल में संजय दत्त में धार्मिक रुझान भी बढ़ा. वे वहां काफी धार्मिक क़िताबें पढ़ा करते थे.

यरवडा जेल में उनकी दिनचर्या के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि वह सुबह छह बजे उठ जाया करते थे.

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नहाने के बाद उन्हें चाय और नाश्ता मिलता था.

उसके बाद जेल कर्मचारी उन्हें अख़बार से थैला बनाने का सामान देते थे. वह सुबह का वक्त काम करने में बिताते थे.

संजय दत्त को 100 थैले बनाने पर 45 रुपए की कमाई होती थी.

दोपहर से पहले वह रेडियो स्टेशन जाते थे जहां वह रेडियो वाइसीपी (यरवडा सेंट्रल कैद) कार्यक्रम प्रस्तुत किया करते थे.

इसके तुरंत बाद पुलिसकर्मी उन्हें कॉमन एरिया में ले जाया करते थे, जहां वह बाकी क़ैदियों के साथ बातें और व्यायाम करते थे.

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उसके बाद वह दो बजे अपने सेल में लौटते और लंच लेते थे. रेडियो स्टेशन पर दोबारा कार्यक्रम करने से पहले वह एक घंटे वहां रुकते.

डिनर के बाद वह अगली सुबह तक के लिए अपने सेल में बंद हो जाते थे.

उनका रेडियो कार्यक्रम क़ैदियों के बीच बहुत लोकप्रिय था.

एक जेल अधिकारी के मुताबिक रेडियो कार्यक्रम के लिए वह अपनी स्क्रिप्ट खुद लिखा करते थे और कार्यक्रम में वह सुधारों पर बात किया करते थे.

जेल अधिकारी का कहना है कि कार्यक्रम में वह कई बार अपनी लोकप्रिय फिल्म मुन्नाभाई के डायलॉग बोला करते और गाने सुनाते थे.

उन्होंने अपने रेडियो जॉकी के काम से कई फैन बना लिए थे.

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एक पूर्व साथी क़ैदी ने बताया,"जेल के बाहर बाबा बेशक बड़े आदमी थे, लेकिन जेल में वह हमारे जैसे थे. वह मेरी मां और पत्नी से मिले थे. मेरा परिवार उनसे मिलकर खुश था."

उन्होंने बताया कि और क़ैदियों के साथ वो बेहद सामान्य तरीके से पेश आते थे. उन्होंने ये भी कहा, "यदि आप एक सुपरस्टार भी हों, जेल आने के बाद शायद बहुत साधारण हो जाते हैं."

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