ममता: मुसलमानों के कितने पास, कितनी दूर

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जन्म से तो ब्राह्मण हैं. लेकिन वो मुसलमानों की तरह इबादत करने या दुपट्टे की तरह सिर पर साड़ी रखने से परहेज़ नहीं करतीं हैं.

वह न धर्मपरिवर्तन करके मुसलमान बनी हैं और न उनकी दिलचस्पी इस्लामी धर्मशास्त्रों में है, जैसा कुछ गैर-मुस्लिमों में अपने एकेडमिक रुझान की वजह से होती है.

ममता बनर्जी की नज़र पश्चिम बंगाल के उन 28 फ़ीसदी मुसलमानों पर है, जिनके समर्थन से वह 2016 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत पक्की करने की जुगत लगा रही हैं.

पार्टी के वरिष्ठ नेता मुकुल रॉय कहते हैं, "2011 के चुनाव में मुसलमानों के समर्थन ने हमारी जीत में अहम भूमिका निभाई थी. इसकी बदौलत हमने 33 साल बाद कम्यूनिस्टों को सत्ता से बेदखल किया था."

मुकुल रॉय को तृणमूल कांग्रेस के नेताओं में मुस्लिम धर्मगुरुओं, विद्वानों और सोचने-समझने वाले नेताओं के सबसे अधिक क़रीब माना जाता है.

उन्होंने जब ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ बगावत की, तब वे भाजपा के नज़दीक चले गए थे.

तृणमूल सांसद सुखेंदु शेखर रॉय का कहना है, "जब ऐसा लग रहा था कि मुकुल अपनी एक क्षेत्रीय पार्टी शुरू करने वाले हैं, तब ममता दीदी चिंतित दिख रही थीं. लेकिन अब जब वे वापस आ गए हैं, तो हम आश्वस्त हैं कि मुसलमान हमें ही वोट करेंगे."

पश्चिम बंगाल की 294 सीटों वाली विधानसभा में 59 मुसलमान विधायक हैं, जो सूबे में मुसलमान वोटरों की आबादी की तुलना में काफ़ी कम हैं. इन 59 मुसलमानों में से 25 विधायक तृणमूल कांग्रेस के और 15 कांग्रेस के हैं.

उस वक़्त ये दोनों दल साथ थे, जिसकी वजह से ममता बनर्जी की 40 सीटों पर मज़बूत स्थिति थी. वाम दलों के केवल 17 मुसलमान विधायक हैं.

चुनाव विश्लेषक अभय कुमार का कहते हैं कि मुसलमानों का ममता की ओर होना उन्हें एक निर्णायक जीत की ओर ले गया.

चुनाव विश्लेषक सब्यसाची बसु रॉय चौधरी का कहना है कि पिछले चुनाव में हालांकि मुसलमान केवल 59 सीटें ही जीत पाए थे. लेकिन मुस्लिम वोटों ने तृणमूल कांग्रेस को क़रीब 74 सीटों पर जीत दिलाई थी.

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सब्यासाची बसु रॉय चौधरी अब रवींद्र भारती यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर हैं. उनका कहना है कि मुस्लिम वोटों में होने वाला संभावित बंटवारा तृणमूल कांग्रेस को कई सीटों पर नुक़सान पहुंचा सकता है, क्योंकि कांग्रेस अब उनकी सहयोगी पार्टी नहीं रही है बल्कि प्रतिद्वंदी है. अगर सीपीएम नेता तैयार हो जाते हैं, तो कांग्रेस उनके साथ हो सकती है.

राजनीति शास्त्र के शिक्षक और कांग्रेस नेता ओमप्रकाश मिश्र कहते हैं, "अगर वामदल और कांग्रेस दो महीने पहले सीटें बांटने को लेकर समझौता कर लेते हैं, तो हम चुनाव जीत जाएंगे. इसके पीछे मुख्य वजह यह होगी कि कांग्रेस मुस्लिम वोट को तृणमूल विरोधी गठबंधन के पास ले आएगी."

उन्होंने एक चुनाव पूर्व सर्वेक्षण का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस-वामदल गठबंधन तृणमूल को हरा देगा और इस गठबंधन को 161 सीटें मिलेंगी और तृणमूल 126 पर सिमट जाएगा.

उन्होंने कहा, "वापस पाने वाली सीटों में ज़्यादातर सीटें मुस्लिमबहुल इलाक़ों की होंगी, क्योंकि कांग्रेस का मुसलमानों के बीच खासकर बंगाली मुसलमानों के बीच मजबूत जनाधार है."

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ओमप्रकाश मिश्र 2014 के संसदीय चुनाव में मालदा और मुर्शीदाबाद ज़िले के चार मुस्लिम बहुल इलाकों में जीत दर्ज करने की बात का उल्लेख करते हैं.

इसके बावजूद तृणमूल ने सूबे के 42 में से 34 सीटों पर जीत दर्ज की थी.

ममता कोलकाता में ही सिर्फ उर्दू बोलने वाले मुस्लिम धर्मगुरुओं के बीच ही नहीं पैठ बना रही है बल्कि कोलकाता के आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में भी अपना प्रभाव जमा रही हैं.

वो सीपीएम के पूर्व नेता अब्दुर रज़्ज़ाक़ मुल्लाह और जमीयत उलेमा-ए-हिंद के नेता सिद्दीकुल्लाह चौधरी के प्रति गर्मजोशी दिखा रही हैं.

और चुपके-चुपके असम के एआईयूडीएफ के नेता मौलाना बदरुद्दीन अजमल और हैदराबाद के तेजतर्रार मुस्लिम नेता असदउद्दीन ओवैसी के साथ गठजोड़ कर रही है.

चुनाव विश्लेषक समीर दास कहते हैं, "उन्हें इन सभी नेताओं का समर्थन प्राप्त होगा. इन नेताओं का समर्थन महत्वपूर्ण है. यह गणित का बिल्कुल सीधा हिसाब है. कोई भी यह देख सकता है कि हिंदू वोट बंटे हुए हैं इसलिए अगर मुसलमान ममता के साथ हो जाते हैं तो ममता जीतेंगी."

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ममता ने नवंबर 2015 में एक के बाद एक दो मुस्लिम रैलियां कर मुसलमानों को अपनी तरफ करने की शुरुआत कर दी थी.

उन्होंने कोलकाता में शहीद मीनार मैदान में हुई जमीयत की रैली में एक लाख की भीड़ को संबोधित किया तो वहीं फुरफुरा शरीफ में ताहा सिद्दीकी के द्वारा निकाली गई रैली में शरीक हुई.

इन दोनों रैलियों में उन्होंने सूबे के मुसलमानों तक विकास, रोजगार और शिक्षा के अवसर पहुंचाने के वायदे किए हैं.

जमीयत हालांकि ममता को वादों की जगह राजनीतिक प्रतिनिधित्व की शर्त पर समर्थन देगा.

सूत्रों के मुताबिक जमीयत नेता सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस से 20 सीटों की मांग की है. हालांकि ममता 10-12 सीट देने पर विचार कर रही हैं.

पूर्व सीपीएम नेता रज़्ज़ाक़ मुल्लाह और कुछ दूसरे भी अपनी सीट की तलाश में हैं. लेकिन तृणमूल के अपने परंपरागत प्रतिद्वंदी अराबुल इस्लाम से उन्हें कड़ी टक्कर मिल सकती है.

जैसे बांग्लादेश में हिंदू वोट शेख हसीना को शुरुआती बढ़त देता है, वैसे ही पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वोट की अहमियत हो गई है.

बांग्लादेश की 300 सीटों में से 55-60 सीटों पर हिंदू वोटर सीधे तौर पर प्रभाव डालने की हैसियत रखते हैं.

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