‘मुझे डर है कोई मुझे न मार डाले’

अब्दुल, अलीगढ़

अलीगढ़ में रिक्शा चलाने वाले अब्दुल (बदला हुआ नाम) को डर है कि ‘अलीगढ़’ फ़िल्म आने के बाद कहीं उनकी जान पर न बन आए.

अब्दुल ने बीबीसी से कहा, “अलीगढ़ फ़िल्म को लेकर इलाक़े के लोग मेरा मज़ाक उड़ाते हैं. कहते हैं तुम्हारी कहानी है, तुम तो हीरो बन गए. यह चर्चा भी हो रही है कि फ़िल्म आएगी तो उसका विरोध किया जाएगा. पर मुझे डर है कि कहीं मेरी जान पर न बन आए. कोई मुझे मार न दे.”

अब्दुल ही वो रिक्शा चालक हैं, जिनके अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर श्रीनिवास रामचंद्र सीरास के साथ समलैंगिक संबंध थे और दो स्थानीय लोगों ने 2010 में प्रोफ़ेसर सीरास के घर में घुसकर इस संबंध का वीडियो तैयार किया था.

पार्ट 1- प्रोफ़ेसर सीरास का पार्टनर रिक्शावाला आज कहां है?

इसके कुछ महीने बाद प्रोफ़ेसर सीरास अपने घर में मृत पाए गए. फ़िल्म निर्देशक हंसल मेहता ने इस सच्ची घटना के आधार पर ‘अलीगढ़’ फ़िल्म बनाई है जिसमें मनोज बाजपेयी ने प्रोफ़ेसर का किरदार निभाया है.

फ़िल्म में जहाँ प्रोफ़ेसर सीरास की तकलीफ़ों और संघर्षों को संवेदनशील तरीक़े से उकेरा गया है वहीं रिक्शेवाले की भूमिका आई-गई सी लगती है.

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पर असली जीवन में प्रोफ़ेसर सीरास की मौत के बाद अब्दुल की तकलीफ़ें लगातार बढ़ती गईं लेकिन उनकी तरफ़ किसी की नज़र नहीं गई.

बीबीसी ने अलीगढ़ जाकर उस रिक्शेवाले को ढूँढा और उससे बात की. पढ़िए अब्दुल से विनीत खरे की बातचीत के संपादित अंश उन्हीं की ज़बानी -

मेरा गांव अलीगढ़ से 50-60 किलोमीटर दूर खिरीरी मस्तीपुर में है. मेरे पापा सालों से दिल्ली में रहे. मेरी दिल्ली में पैदाइश थी. 1981 में मेरा जन्म हुआ. हम 1992 में बाबरी मस्जिद दंगों के बाद दिल्ली छोड़कर अलीगढ़ आ गए थे.

पार्ट 2- 'प्रोफ़ेसर साहब, कबसे कर रहे हैं होमो सेक्स'?

मैंने 1995-96 में रिक्शा संभाल लिया था. मैंने पढ़ाई लिखाई नहीं की. परिवार में छह लोग थे– माता पिता, दो बहनें, एक भाई और एक मैं. बहनों की मैंने शादी कर दी. भाई मज़दूरी करते हैं. पापा भी मज़दूर थे.

बचपन बहुत मुश्किलों में बीता. जब पापा बीमार पड़ जाते थे तो दो-दो तीन-तीन दिनों में रोटी खाया करते थे. जैसे-जैसे हम समझदार होते गए अपने पैरों पर खड़े होते गए. मैंने 14 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था.

शुरुआत से ही रिक्शा चलाना शुरू कर दिया. सोचा पैसे आएंगे तो घर का ख़र्च चलेगा. उस वक़्त 60-70 रुपए कमा लेते थे. अम्मा ने कहा कुछ काम सीख लो लेकिन मैंने कहा यही सही है. अम्मी बहुत मज़हबी थीं.

उस वक़्त का अलीगढ़ पूरी तरह से बदला हुआ था, पूरा इलाक़ा खुला सा था. विश्वविद्यालय में जहां चाहे रिक्शा लेकर चले जाते थे.

मैं आर्ट्स फ़ैकल्टी के आसपास रिक्शा चलाता था. (वहीं 2009 में अब्दुल की प्रोफ़ेसर सीरास से मुलाकात हुई). उन्होंने (अपने घर मेडिकल कॉलोनी तक) मात्र 10 रुपए (का किराया) तय किया. छोड़ दिया. उन्होंने मुझे ऊपर बुला लिया कि पैसे ले जाओ अपने. वहां पर हम बैठे रहे. (यहीं पहली बार अब्दुल और प्रोफ़ेसर सीरास ने समलैंगिक संबंध बनाए).

क़रीब 15 दिनों के बाद मुझे वह फिर मिले. मैं इंजीनियरिंग कॉलेज से ऑर्ट फ़ैकल्टी की तरफ़ जा रहा था. ये (प्रोफ़ेसर सीरास) ऑर्ट फ़ैकल्टी की ओर जा रहे थे. वह रिक्शे पर थे. उन्होंने उस रिक्शे वाले को पैसे देकर मुझे रोक लिया. मैं उनको (मेडिकल कॉलोनी स्थित घर) लेकर चला गया. उन्होंने मुझसे मेरे घर के हालात पूछे कि कैसे ख़र्चा चलता है.

मैंने अपनी बहन की शादी की बात बताई. एक बहन और एक भाई की शादी करनी है. उन्होंने मुझे बताया कि उनका कुछ दिनों में रिटायरमेंट है और कहा कि था मैं मराठी हूँ और तुम्हारा दिलोजान से ख्याल रखूंगा. यह भी कि कुछ दिनों बाद मैं रिटायरमेंट के बाद अमरीका चला जाऊंगा तो तुम घबराना मत.

कभी मैंने ख़ुद के समलैंगिक होने के बारे में सोचा नहीं था. पर डॉक्टर साहब के साथ मुलाक़ात के बाद मुझे पता चला कि मैं भी समलैंगिक हो सकता हूँ.

पर वह किसी के सामने नहीं दिखाते थे कि हमारे ताल्लुकात हैं. आज तक मैंने उनसे कभी भी पैसा नहीं मांगा. उन्होंने कभी भी एक पैसा नहीं दिया मुझे. वो मुझसे कहते थे कि मैं तुमसे इसी कारण मोहब्बत करता हूं क्योंकि (तुमने) पैसे कभी नहीं मांगे.

उनकी मौत से मुझे बहुत झटका लगा था. अगर वह होते तो मैं शायद आज रिक्शा न चला रहा होता. वह मेरी बहुत मदद करते. मुझे उन पर बहुत भरोसा था. उनकी बहुत सी बातें याद आती हैं.

उस दिन (आठ फ़रवरी 2010 को) मैं डॉक्टर साहब को दो बजे घर छोड़कर गया था. उन्होंने मुझसे तीन-चार बजे आने को कहा. जैसे ही हम कमरे में गए, मीडिया वाले आ गए. उस समय पता नहीं दरवाज़ा कैसे खुला रह गया था. पता नहीं क्या हुआ, तीन लड़के सीधे घुसे चले आए. उन्होंने तुरंत कैमरा ताना, बटन दबा दिया.

उन्हें सब पता था कि स्विच इधर है, लाइट इधर है. कुछ समझ नहीं आया आज तक. डॉक्टर साहब (प्रोफ़ेसर सीरास) ने कहा कि तुम लोग सोचते हो कि मैं कुछ ऑफ़र तुमको दूंगा लेकिन तुम ग़लत सोचते हो. मैं कोई ऑफ़र नहीं दूंगा.

उस वक़्त बाहर थोड़ी बारिश पड़ रही थी. रिक्शा लेकर मैं अपने घर गया. घरवालों ने पूछा क्या बात है. मैं घबराया हुआ था. छह-सात दिन घर पर रहा.

जान-पहचान वाले ने बताया कि मीडिया में तुम्हारी ख़बर छपी है. उसके बाद से मेरी उनसे कभी मुलाकात नहीं हुई. अख़बार से मुझे उनकी मौत का पता चला. उसके बाद मैं और डर गया कि कहीं पुलिस मुझ पर और शक़ न करे.

पुलिस ने मुझे बुलाकर सवाल जवाब किए. कुछ दिनों तक कई बार मुझे ले जाकर छोड़ा गया. मैं उस दौरान काफ़ी परेशान रहने लगा दिमाग़ी तौर पर कि मैं कहीं फंस न जाऊं.

मैंने तो कुछ किया नहीं है. थाने बुलाकर पूछताछ करते थे. ये दो महीने चला. मैं कहीं भागता नहीं था. मुझे अपनी बेगुनाही साबित करनी थी.

मुझे लगा उन्होंने आत्महत्या कर ली. वह बहुत सुलझे हुए आदमी थे. कोई नहीं चाहेगा कि इस हाल में पकड़ा जाऊं कि उनके विद्यार्थी उन्हें किस नज़र से देखेंगे.

मैंने तब तक अपनी पत्नी को डॉक्टर साहब की बात नहीं बताई थी. मैं सोचता था कि कहीं बता दिया तो कहीं ग़ुस्सा हो जाए, छोड़कर चली जाए. ये सही नहीं लगा कि शादी के बाहर ऐसा कर रहा हूँ.

मैं ख़ुद को समझाता था कि डॉक्टर साहब मेरा साथ देंगे और मैं डॉक्टर साहब का साथ दूंगा. उन्होंने बताया था कि दो लड़के और दो लड़कियां साथ संबंध बनाकर रह सकते हैं.

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प्रोफ़ेसर सीरास की मौत के जब पत्नी ने पूछा तो मैंने कहा कि मैंने कुछ ग़लत नहीं किया. जब मैं जल गया था तो मेरी पत्नी ने मेरी बहुत सेवा की थी. उनके अब्बा ने कहा था कि तुम छोड़कर आ जाओ लेकिन वह गई नहीं. वह बहुत अच्छी हैं.

रोज़ी रोटी के लिए डर-डर कर निकलता था, कहीं कोई मार न दे. उनकी संपत्ति के पीछे रिश्तेदार पड़े हैं. कहीं संपत्ति के झगड़े में मैं न फंस जाऊं. कहीं लोग मुझे मरवा न दें इसलिए मेरा निकलना मुश्किल हो गया था. हर दम डॉक्टर साहब का ख़्याल दिल में आता था.

आग इसलिए लगाई क्योंकि पुलिस हमेशा उठाकर ले जाती थी. यही पूछते थे कि किसने किया, क्या हुआ. मिट्टी का तेल रखा था घर में. मैंने ख़ुद पर डाल लिया. माचिस दिखा दी. जब बीवी ने आग देखी तो उन्होंने कंबल फेंक दिया मुझ पर. उस दौरान खाना भी पकना मुश्किल हो गया था.

जब मैंने आग लगा ली थी इलाज तक के लिए पैसे नहीं थे. उस वक़्त मैं बच गया. लेकिन अब बार-बार चर्चा हो रही है कि फ़िल्म चलेगी, विरोध होगा, कहीं ऐसा न हो कि मेरी जान पर बन आए.

जब मैंने सुना कि 377 क़ानून पास होने वाला है तो मुझे लगा कि जब डॉक्टर साहब इतनी मोहब्बत करते थे तो क़ानून मुझे इंसाफ़ दिलाएगा. वह कहते थे कि क़ानून पास हो गया तो तुम्हें सुकून मिलेगा.

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ज़ाहिर सी बात है वो मुझसे शादी करते. क्या पता वह इसी क़ानून के चक्कर में रुके हुए हों कि क़ानून पास हो कैसे भी तो हम लोग शादी कर लें. ज़ाहिर सी बात है कि मुझे भरोसा था. मैंने इतना भरोसा कर रखा था, थोड़ा सा भरोसा करने में मुझे क्या डर था.

मैंने (उनसे) कभी नहीं पूछा कि क्या आप मुझसे शादी करेंगे.

जब इस वाक़ये पर फ़िल्म बनी तो मुझसे फ़िल्म वालों ने कोई बात नहीं की. एक महिला ने फ़ोन किया. उन्होंने एक घंटे बात की. कहा फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले हम आपसे मिलेंगे लेकिन मुझसे कोई नहीं मिला. सब ऐसे मुझसे वायदा करके चले जाते लेकिन कोई कुछ नहीं करता.

मुझे पैसा मिलना चाहिए. आपने इतना पैसा फ़िल्म पर खर्च किया, कुछ मुझ पर खर्च करें. डॉक्टर साहब ऐसे थोड़े बैठते थे जैसे मनोज बाजपेयी को दिखाया गया है. पोस्टर देखा है. अगर आपको कहानी चाहिए मुझसे आकर आप मिलते.

मैं बहुत क़रीब रहा हूं डॉक्टर साहब के. उनका पार्टनर रहा हूं. मुझसे मालूम करते कि वो कैसे खाते थे, कैसे उठते थे, कैसे बैठते थे, कैसे जीने पर आते-आते थक जाते थे. कैसे हम इंजाय करते थे, कैसे हँसते थे.

जो वायदे डॉक्टर साहब ने मुझसे किए वो कोई पूरा कराए तो मैं समझूंगा कि कुछ इंसाफ़ हुआ. उनकी पेंशन मुझे मिले तो यह अच्छी बात है. जैसे मियां-बीवी के संबंध होते हैं.

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उनकी फ़ोटो अख़बार में से काटकर रखी हुई है. मैं अख़बार की सारी कटिंग रखता हूँ. कोई कुछ भी पाल लेता है, पंछी, चिड़िया, तोता कुछ भी सही, अगर एक दो साल आदमी के पास रहे, वो एकदम उड़ जाए तो अहसास होता है उस बात का.

मैं मर गया तो मेरी पांच बेटियां हैं, कौन पालेगा उन्हें. आपको पता है कि महिला को इस समाज में किस नज़र से देखा जाता है. मेरी बेटियां छोटी-छोटी हैं. कल को बड़ी होंगी. अगर डॉक्टर साहब होते, तो मेरे बच्चे अच्छे स्कूलों में होते, मेरे पास पैसा होता. मेरे पास सब कुछ होता, मेरा कोई अपना कारोबार होता. लेकिन ऐसा कुछ भी हो न सका.

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