'अभी फ़ौरन देखने जाइए अलीगढ़'

  • 26 फरवरी 2016
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फ़िल्म: अलीगढ़

निर्देशक: हंसल मेहता

कलाकार: मनोज बाजपेयी, राजकुमार राव

रेटिंग: ****

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जिन-जिन वर्गों के ख़िलाफ़ हमारे समाज में भेदभाव होता है उनमें मेरे ख़्याल से समलैंगिक समुदाय को सबसे बुरा बर्ताव झेलना पड़ता है.

समलैंगिकता को अपराध घोषित करने वाले क़ानून को चुनौती देने के लिए भी समलैंगिक समुदाय ज़ोर-शोर से सामने नहीं आया.

लेकिन यह बड़ा स्वाभाविक है क्योंकि क़ानून की बात तो बाद में आती है उसके पहले ही समाज, आस-पास के लोग, यहां तक कि दोस्त और परिवार भी समलैंगिकों के साथ बड़े ख़राब तरीक़े से पेश आते हैं. यही बात बलात्कार पीड़ितों पर भी लागू होती है.

यह कल्पना करना भी बड़ा मुश्किल है कि ज़्यादातर समलैंगिक कैसे अपनी पहचान को छुपाकर एक झूठ के साथ समाज में रहने को मजबूर होते हैं.

लेकिन इस फ़िल्म के मुख्य किरदार प्रोफ़ेसर सीराज इस मामले में अपवाद हैं.

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उन्होंने अपनी समलैंगिकता को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया और बहादुरी से समाज का सामना किया.

वे अपनी ही यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ते हैं और फिर जीतते भी हैं.

फ़िल्म बेहद स्वाभाविक है और कहीं पर भी अतिवाद का शिकार नहीं हुई है.

मनोज ने 60 साल से ऊपर के एक दुबले-पतले, कमज़ोर, झुके कंधों, सफ़ेद दाढ़ी वाले प्रोफ़ेसर का किरदार बड़ी ख़ूबसूरती और सरलता से निभाया है.

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घर से बाहर प्रोफ़ेसर सीरास अपनी लड़ाई लड़ते हैं तो अकेले में व्हिस्की के साथ लता मंगेशकर के गानों का लुत्फ़ उठाते हैं. प्रोफ़ेसर साहब एक कवि भी हैं.

वे अंतर्मुखी हैं, अकेले हैं. आप शुरूआत में ही इस शख़्स की ओर खिंचे चले जाते हैं और धीरे-धीरे फ़िल्म की ओर भी.

फ़िल्म जिस मुद्दे को लेकर बनाई गई है वह बेहद ज़रूरी है (सेक्शन 377, निजता का अधिकार वगैरह). लेकिन यह भी सच है कि भारत में इस मुद्दे पर आर्ट के तौर पर पेश किया जाने वाले ऐक्टविज़्म बड़ा सौंदर्यविहीन होता है और इसलिए असरदार नहीं बन पाता.

लेकिन यह फ़िल्म इस मायने में अलग है. क्योंकि फ़िल्म की कहानी बहुत प्रभावशाली, दिल से महसूस करके लिखी गई है. अपूर्वा असरानी ने इसे लिखा है.

फ़िल्म में एक तरह का वैराग्य है, शांति है, सन्नाटा है. यह कुछ साबित करने की कोशिश नहीं करती.

इसका अपवाद कोर्टरूम सीन है. यह याचिकाकर्ता और जज के बीच की बातचीत है, लेकिन वह सीधे दर्शकों को संबोधित करती हुई लगती है.

निर्देशक हंसल मेहता भी अतिशयोक्तिपूर्ण चित्रण से साफ़ बच निकले हैं.

मनोज बाजपेयी ने संवेदनशील प्रोफ़ेसर सीरास की भूमिका को इतने सहज तरीके से निभाया है कि उन्हें सैल्यूट करने को जी चाहता है.

एक ऐसा प्रोफ़ेसर जो अपने आस-पास के शोर-शराबे और उठा-पटक से प्रभावित हुए बिना अपने आप में ही मस्त रहता है. ऐसा किरदार टॉम हैंक्स ने साल 1993 में 'फिलाडेल्फिया' में निभाया था.

मनोज वाजपेयी को पता है कि एक नाज़ुक क्षण को कैसे रोक कर रखना है. कई बार सिर्फ़ भाव व्यक्त कर देना ही काफ़ी नहीं होता और मनोज ये बख़ूबी जानते हैं.

एक बार फिर साबित हो गया कि वो कितने अंडर-रेटेड एक्टर हैं. साल 1998 में आई फ़िल्म 'सत्या' में उन्होंने जो भीखू म्हात्रे का ज़बरदस्त किरदार निभाया था. उसके बाद भी उन्हें उनकी क़ाबिलियत के हिसाब से रोल नहीं मिले.

इस फ़िल्म में मनोज, मराठी पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर बने हैं. उनके चार साथी प्रोफ़ेसर ज़बरदस्ती उनके घर में घुस जाते हैं. वे लंपट तरीके से उनकी एक वीडियो क्लिप देखते हैं और फिर उसे ब्राडकास्ट कर देते हैं.

ये क्लिप सस्ते टीवी पत्रकारों की एक टोली फ़िल्माती है. वे चुपके से प्रोफ़ेसर साहब और एक शख़्स को लवमेकिंग करते हुए फ़िल्माते हैं.

प्रोफ़ेसर सीरास को यूनिवर्सिटी से निलंबित कर दिया जाता है.

इसके बाद एक रिपोर्टर (राजकुमार राव) उनसे संपर्क साधने की कोशिश करता है.

ये एक सच्ची घटना है जो साल 2010 में घटित हुई थी.

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ये घटना और फ़िल्म अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) पर आधारित है और फ़िल्म में इसे ज्यों का त्यों दिखाया गया है.

कई मशहूर शख़्सियतों और बुद्धिजीवियों के विरोध के बावजूद भारत में अब भी समलैंगिकता अपराध है.

मेरे ख़्याल से ऐसा कोई भी क़ानून जो किसी ख़ास किस्म के संबंधों को ग़ैर कानूनी मानता है, वो कानून नफ़रत ही फैलाएगा, प्यार नहीं.

मैं सभी लोगों से अपील करूंगा कि वो ये फ़िल्म ज़रूर देखें. एक सहज, सरल, लेकिन ज़बरदस्त फ़िल्म.

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