कैसे सीखें 30 भाषाएं?

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आप कितनी भाषाएं जानते हैं, बोलते हैं या कम से कम समझ लेते हैं?

आपका जवाब शायद, दो-तीन या फिर ज़्यादा से ज़्यादा चार होगा. लेकिन, अगर हम आपको ये कहें कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो दो, चार, पांच नहीं, बल्कि बीस-तीस ज़बानें बोलते हैं, वो भी एक जैसी रवानी से तो आप क्या कहेंगे.

बीबीसी संवाददाता, डेविड रॉबसन जब बर्लिन में एक सम्मेलन को कवर करने पहुंचे तो वहां का माहौल देखकर चौंक गए.

वहां एक इमारत की बालकनी में बैठे कुछ लोग धड़ाधड़ जर्मन, हिंदी, नेपाली, पोलिश, क्रोएशियन, चीनी और थाई भाषा के शब्द बोल रहे थे. रॉबसन को लगा कि ये लोग सिर्फ़ बोल नहीं रहे, एक दूसरे पर शब्दों की बमबारी कर रहे थे.

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पास ही एक कमरे में कुछ और लोग थे, जो अलग-अलग ज़बानों के मुश्किल लफ़्ज़ बोलने की प्रैक्टिस कर रहे थे. वहीं एक कोने में कुछ लोग, अलग-अलग भाषाओं के मुश्किल शब्दों को समझने-समझाने का मुश्किल खेल खेलने की तैयारी में थे.

रॉबसन को ये कांफ्रेंस कम और सिरदर्द का इंतज़ाम ज़्यादा लगा.

असल में रॉबसन, बर्लिन में जिस सम्मेलन में गए थे, वहां दुनिया भर से आए हुए क़रीब 350 बहुभाषी जमा हुए थे. ये वो लोग हैं जो एक साथ कई-कई ज़बानें बोल लेते हैं.

इनमें से कई भाषाएं तो ऐसी हैं जो बहुत कम बोली जाती हैं, जिसे दूर-दराज़ में रहने वाले आदिवासी बोलते हैं. मसलन, ध्रुवों पर रहने वाले आदिवासी.

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रॉबसन के ज़ेहन में सवाल उठा कि आख़िर कोई इंसान एक साथ कितनी भाषाएं सीख और बोल सकता है. वो ख़ुद अंग्रेज़ी जानते हैं, थोड़ी सी इटैलियन आती है, और बमुश्किल डैनिश समझ पाते हैं.

लेकिन बहुभाषियों, जिन्हें अंग्रेज़ी में पॉलीग्लॉट कहते हैं, के सम्मेलन में तमाम दिलचस्प लोग और उनकी उनसे भी दिलचस्प कहानियां मौजूद थीं.

वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो कोई भी नई भाषा याद करना और फिर उसे धड़ल्ले से बोलना बेहद कठिन काम है. क्योंकि कोई नई ज़बान सीखने का मतलब, हमारे दिमाग़ को कई तरह से काम करना होता है.

उस भाषा के शब्द याद करने होते हैं, कम से कम दस हज़ार. फिर उनके बोलने का तरीक़ा याद करना होता है और फिर उसकी ग्रामर पर पकड़ बनानी पड़ती है. कुल मिलाकर एक नई ज़बान सीखने का मतलब है एक नई संस्कृति से रिश्ता जोड़ना.

ये काम कई मोर्चों पर होता है. वरना आप रोबोट की तरह अटक-अटककर कुछ शब्द बोल लेंगे, किसी भाषा पर आपकी पकड़ नहीं बन सकती.

नई भाषा सीखना बहुत मुश्किल दिमाग़ी कसरत है. इसके फ़ायदे भी हैं. कई ज़बानें बोलने वालों की याददाश्त काफ़ी तेज़ हो जाती है.

उनके दिमाग़ में जानकारी का ख़ज़ाना भी जमा हो जाता है. इससे भूलने की बीमारी होने की आशंका भी कम हो जाती है. कनाडा की यॉर्क यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक एलेन बियालस्तोक ने इस बारे में एक रिसर्च की थी.

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पता चला कि दो से ज़्यादा ज़बानें बोलने वाले लोगों में बढ़ती उम्र के साथ भूलने की बीमारी छह से नौ साल देर से आती देखी गई.

वैसे, पहले न्यूरोलॉजिस्ट ये कहते थे कि नई ज़बानें सीखना इतना आसान नहीं. इसके लिए किसी इंसान के पास बहुत कम वक़्त होता है. बचपन में हम नई बातें, नई चीज़ें ज़्यादा जल्दी से सीख सकते हैं. लेकिन, बढ़ती उम्र के साथ ये क्षमता कम होती जाती है.

हालांकि नए रिसर्च कहते हैं कि ये धारणा ग़लत है कि बढ़ती उम्र के साथ हमारी सीखने की क़ाबिलियत कम होती है.

अब बर्लिन के सम्मेलन में जो कई भाषाएं जानने वाले विशेषज्ञ जमा हुए थे, उन्होंने बचपन में तो सारी भाषाएं सीखी नहीं थीं. ज़्यादातर ने बड़े होकर ही नई-नई ज़बानों में महारत हासिल की थी.

जैसे इस सम्मेलन में शामिल होने आए बहुभाषाविद् टिम कीली को ही लीजिए.

उनका बचपन अमरीका के फ्लोरिडा में बीता था. वहां उन्होंने बहुत से लोगों को स्पैनिश बोलते हुए सुना था. रेडियो सुन-सुनकर कीली ने स्पैनिश सीखी.

लेकिन बाक़ी की ज़बानें उन्होंने दुनिया घूमने के दौरान सीखी. जैसे कोलंबिया में फ्रेंच, जर्मन और पुर्तगाली सीखी. स्विट्ज़रलैंड, पूर्वी यूरोपी देशों में और जापान गए तो वहां की भाषाएं सीख लीं. आज कीली बीस भाषाएं, धड़ल्ले से बोल सकते हैं.

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तो सवाल ये है कि कीली जैसे लोग इतनी सारी भाषाएं कैसे सीख गए? क्या आप-हम भी ऐसे ही कई भाषाएं बोल सकते हैं?

इसके लिए पहली शर्त है कि आपका इरादा पक्का होना चाहिए. हां, अगर आप बुद्धिमान हैं, तो आपको इससे मदद मिलेगी, मगर पहली शर्त नई भाषा सीखने का पक्का इरादा ही है.

कीली कहते हैं कि कई ज़बानें सीखने की अगली बड़ी ज़रूरत है कि आपमें एक साथ कई किरदार जीने की क़ाबिलियत होनी चाहिए. कुछ-कुछ गिरगिट जैसी, जो ज़रूरत के हिसाब से रंग बदल लेता है.

असल में हर भाषा बोलने का अपना अंदाज़ होता है, उसका अपना इतिहास होता है. हर ज़बान से जुड़ी संस्कृति होती है. तो जब आप कोई ख़ास भाषा बोलते हैं तो उसके तमाम पहलू भी अपना लेते हैं. जैसे फ्रेंच बोलेंगे तो थोड़ी रूमानियत आ जाएगी.

इस तरह हर ज़बान के साथ आपका किरदार बदल जाएगा. ज़रूरी ये है कि आप ज़िंदगी में एक साथ तमाम किरदार सीखने और निभाने की क्षमता रखते हों.

कई भाषाएं एक साथ बोलने वालों के साथ एक और पहलू जुड़ा होता है, याददाश्त का. हर भाषा अलग-अलग दौर में सीखी जाती है. जो ज़िंदगी के उस दौर के साथ ख़ास तौर से अपनी पहचान जोड़ लेती है.

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इस बारे में अमरीका की टेंपल यूनिवर्सिटी की अनेटा पावलेंको ने एक रिसर्च की है. उन्होंने रूसी मूल के ब्रितानी लेखक व्लादिमीर नाबोकोव का उदाहरण दिया.

जब नाबोकोव ने अपनी जीवनी लिखी तो पहले उसे अंग्रेज़ी में लिखा. लेकिन जब उन्होंने इसे ही रूसी भाषा में लिखना शुरू किया तो ज़िंदगी के और भी बहुत से पहलू याद आए, जो अंग्रेज़ी में लिखने के दौरान, ज़ेहन में नहीं आए थे.

रूसी भाषा में आत्मकथा छपने के बाद, नाबोकोव को उसमें और अंग्रेज़ी की जीवनी में इतना फ़र्क़ दिखा कि उन्होंने बायोग्राफ़ी को रूसी से फिर से अंग्रेज़ी में अनुवाद करके नए सिरे से छपवाया.

नई ज़बान सीखने की एक और शर्त है ख़ुद को नए सिरे से तलाशने की. जो लोग, भाषा के ज़रिए किसी नई संस्कृति से टकराते हैं, तो वो नए सिरे से अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं. जो लोग ये काम आसानी से कर लेते हैं, उन्हें नई भाषा सीखने में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होती.

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फिर आपको दूसरों की अच्छे से नक़ल करना आना चाहिए. जब आप किसी की नक़ल अच्छे से कर लेते हैं, तो उसके हाव-भाव आसानी से सीख लेते हैं. ऐसा ही नई भाषा के साथ होता है, उसके बोलने का तरीक़ा सीखना, उस भाषा को बोलने वालों की नक़ल करने जैसा होता है, जिसे सीखकर, ख़ुद को उसमें ढालकर, इंसान आसानी से नई भाषा सीख सकता है.

मतलब ये कि अगर, आप एक्टिंग कर सकते हैं, नए हाव-भाव सीखकर आसानी से उन्हें अपना सकते हैं, तो आप उतनी ही आसानी से नई ज़बान सीख सकते हैं.

तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि एक्टिंग करने वाले आसानी से नई-नई भाषाएं सीख सकते हैं? इस सवाल का जवाब, हम अमरीकी एक्टर माइकल लेवी हैरिस के उदाहरण से समझ सकते हैं.

हैरिस को दस भाषाएं बोलने में महारत हासिल है. इन दस भाषाओं के अलावा कोई बारह और ज़बानों को वो समझ भी लेते हैं.

न्यूयॉर्क के रहने वाले हैरिस, जब लंदन में होते हैं और अंग्रेज़ी बोलते हैं तो उनका अंदाज़ एकदम अलग होता है. वो किसी ब्रितानी सामंत की तरह बर्ताव करते हैं. लेकिन दूसरी भाषाएं बोलते वक़्त उनका अंदाज़ एकदम बदल जाता है.

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हैरिस कहते हैं कि किसी भाषा के साथ उसकी संस्कृति अपनाना भी ज़रूरी है. ये काम आसानी से हो सकता है, अगर उस ज़बान को बोलने वाले की नक़ल की जाए, वो भी बिना किसी हिचक के.

हैरिस मशविरा देते हैं कि किसी भी नई भाषा को सीखने के लिए, उसके शब्द सुनिए और ज़ोर-ज़ोर से बिना शर्माए-हिचकिचाए, उन शब्दों को बोलिए.

आपका अंदाज़, उस इंसान से अलग होगा, जिसकी वो मातृ भाषा (मादरी ज़बान या मदर टंग) होगी, मगर धीरे-धीरे आप उस ज़बान का लहजा, उसकी नज़ाकत समझ जाएंगे, उसे बोलने के अंदाज़ को सीखकर फिर आप वैसे ही बोलना शुरू कर देंगे.

अक्सर हम अपनी भाषा बोलने सुनने के इतने आदी होते हैं कि, दूसरी ज़बान के शब्द सुनने पर, उसके लहजे पर हंसी आती है, बोलना ख़राब लगता है. एक्टर माइकल हैरिस कहते हैं कि इस शर्मिंदगी, इस ख़राब फीलिंग से पार पाना, नई भाषा सीखने की पहली शर्त है.

जब आपके अंदर से ये हिचक निकल जाएगी, तो आप उस भाषा के तमाम शब्दों पर अपना हक़ जताएंगे, नए आत्मविश्वास से बोलेंगे. नई ज़बान सीखने की आपकी राह यहीं से आसान हो जाएगी.

हालांकि, शुरू से ही आपको एक साथ कई भाषाएं सीखने का एजेंडा नहीं रखना चाहिए. एक दो से शुरुआत कीजिए. सबसे ज़रूरी है कि नई ज़बान को उसके भाव के साथ अच्छे तरीक़े से व्यक्त कर पाना.

हाव-भाव अपनाने के साथ-साथ जो बात ज़रूरी है वो है, नए शब्दों का लगातार अभ्यास. करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान...तो जितना आप नई भाषा के साथ मशक्कत करेंगे, प्रैक्टिस करेंगे, उतनी ही आपकी राह हमवार होती जाएगी.

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अगर आपके पास वक़्त नहीं है ज़्यादा, तो उस भाषा के गाने ही सुन लीजिए चलते फिरते, इससे भी मदद मिलेगी.

वैसे, ज़्यादातर लोग नई भाषा सीखने के लिए उत्साहित नहीं होते. लेकिन, जिन्हें दस बीस या तीस भाषाएं आती हैं, उन्हें इसके फ़ायदे पता हैं.

नई संस्कृति से मेल, नए लोगों से जान-पहचान, दुनिया देखने समझने का एकदम नया नज़रिया, हर नई भाषा के सीखते ही ये सब बदल जाता है.

बहुभाषी एक्टर हैरिस, कहते हैं कि वो काफ़ी दिनों तक दुबई में रहे. एक यहूदी होने के नाते ये बहुत चुनौती भरा था. मगर उन्होंने अरबी भाषा सीखी तो लेबनान का एक अरब नागरिक उनका दोस्त बन गया.

जब वो दुबई से अपने देश वापस आ रहे थे, तो सबसे ज़्यादा दुखी उनका अरब दोस्त ही था. ये था ज़बान का रिश्ता, जो एक यहूदी ने एक अरब से जोड़ लिया था.

बर्लिन के सम्मेलन में ख़ुद बीबीसी संवाददाता, डेविड रॉबसन ने देखा कि किस तरह रूसी, यूक्रेनियन, जर्मन और फ्रेंच बोलने वाले आपस में मिल-जुलकर रह रहे थे.

इस कांफ्रेंस से लौटकर, रॉबसन ने तो तय किया है नई भाषाएं सीखेंगे. और आप? अभी सोच ही रहे हैं. अरे भाई..सोचना ही क्या...नहीं दस बीस तीस, तो दो-तीन-चार नई ज़बानें ही सीख डालिए. याददाश्त भी अच्छी होगी और दुनिया देखने का नज़रिया भी नया होगा.

(अंग्रेज़ी में इसके मूल लेख को पढ़ेन के लिए यहां क्लिक करें जो बीबीसी फ़्यूचर में मौजूद है.)

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