जाट हिंसा का असर पंजाब चुनावों पर?

इमेज कॉपीरइट AP

हरियाणा में आरक्षण के लिए किए गए हिंसक आंदोलन की वजह से जाट अब अलग-थलग पड़ रहे हैं.

हरियाणा में आरक्षण समर्थक जाटों ने जो हिंसक उपद्रव मचाया, उससे पड़ोसी राज्य पंजाब में भी उनकी छवि को नुक़सान पहुँच सकता है.

पंजाब में जाट काफी प्रभावशाली हैं. लगता है कि हरियाणा में गैर जाट अपने राजनीतिक समीकरणों से जाटों को अब बाहर कर रहे हैं.

हालांकि पंजाब में जाटों को लेकर ऐसी कटुता का कोई इतिहास नहीं रहा है.

इसके बावजूद, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह अखिल भारतीय जाट महासभा के बैनर तले राष्ट्रीय स्तर पर जाटों की अगुआई करने में ख़ुद को अजीब हालत में पाते हैं.

अखिल भारतीय जाट महासभा किसी भी धर्म के आर्थिक रूप से कमज़ोर जाटों के लिए आरक्षण की मांग करती है.

साल 2014 में अमरिंदर सिंह ने मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल पर केंद्र की नौकरियों में जाटों को आरक्षण देने की मांग न करने का आरोप लगाया था.

इमेज कॉपीरइट Reuters

नौ राज्यों के जाटों को नौकरी में आरक्षण दिया गया, लेकिन पंजाब इसमें शामिल नहीं था. बाद में राज्य सरकार ने जाटों को पंजाब में पिछड़ी जाति के अंदर शामिल किया.

अमरिंदर सिंह को अब लग रहा है कि हरियाणा में हिंसा से उनकी छवि को नुक़सान हो सकता है.

उनसे जब आरक्षण के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे सामान्य वर्ग के ग़रीब लोगों के लिए भी आरक्षण की मांग करेंगे.

हरियाणा और पंजाब में यह समानता है कि दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री जाट रहे हैं. अमरिंदर सिंह के प्रतिद्वंदी प्रकाश सिंह बादल अब तक पंजाब के पांच बार मुख्यमंत्री बन चुके हैं.

जाट मुख्यमंत्रियों की सूची काफ़ी लंबी है. लेकिन पंजाब के विद्वान और राजनेताओं का कहना है कि पंजाब हरियाणा जैसा राज्य नहीं है. हरियाणा में धुव्रीकरण के लिए जैसी उत्तेजना फैलाई जाती है, वैसा पंजाब में नहीं होता.

हरियाणा में जिस तरह बीजेपी नेता राजकुमार सैनी गैर-जाटों की राजनीति करते हैं, वैसा पंजाब में कोई नहीं करता.

हाल ही में, कुरुक्षेत्र के सांसद राजकुमार सैनी के कथित बयान से बवाल मच गया था.

इमेज कॉपीरइट SALMAN RAVI

जब बीजेपी ने हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के रूप में एक पंजाबी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया, तो हरियाणा के जाट समुदाय को लगा कि सत्ता पर उनकी पकड़ कमज़ोर हो गई है.

हरियाणा में जाट जिस तरह से आरक्षण की मांग कर रहे हैं वैसा पंजाब में नहीं कर रहे हैं. हाल ही में किसानों के कुछ संगठनों ने आरक्षण मांगा तो था, पर यह मांग बहुत दबे स्वर में उठाई गई थी.

किसानों में बेरोज़गारी का स्तर और आर्थिक सुरक्षा के मुद्दे देखते हुए आरक्षण की मांग को बल मिलता है.

कैप्टन अमरिंदर सिंह पहले ही कह चुके हैं कि तीन एकड़ से कम ज़मीन वाले जाटों की आरक्षण की मांग सही है. अमीर जाटों को इसकी ज़रूरत नहीं है.

लगता है, जाट आरक्षण को लेकर हरियाणा में हो रहे हिंसक आंदोलन के दौरान अमरिंदर सिंह काफी सचेत थे. इसलिए उन्होंने सामान्य वर्ग के ग़रीबों के लिए भी आरक्षण की बात की.

अमरिंदर सिंह के पार्टी सहयोगी केवल ढिल्लन ने बताया, "कैप्टन साहब ने कभी हिंसक आंदोलन का समर्थन नहीं किया है. इसलिए जाति विभाजन का पंजाब में सवाल ही कहां उठता है?"

इमेज कॉपीरइट Getty

समाजशास्त्री डॉक्टर एसएल शर्मा का कहना है कि पंजाब में दलित, जाट वोट बैंक को बैलेंस कर सकते हैं.

पंजाब में दलित ख़ुद को जाट के मुक़ाबले में समझते हैं. दलितों ने जाटों के उत्पीड़न से बचने के लिए अपने मंदिर और गुरुद्वारे बना लिए हैं.

दलित कांग्रेस नेता शमशेर सिंह डुल्डो ने कहा कि दलितों के साथ जो सिख गुरु भेदभाव करते हैं, उन्हें बाहर निकाला जाएगा.

पंजाब में हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, मध्यप्रदेश और देश के दूसरे हिस्सों की तरह भेदभाव नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषक डॉक्टर प्रताप सिंह वर्मा ने कहा, "पंजाब में वैचारिक प्रतिबद्धता बहुत साफ़ है जबकि हरियाणा में 'आया राम-गया राम' का माहौल है. यहां राजनीति में विचारधारा और धर्म के सवाल के कारण जाति महत्वपूर्ण नहीं हो पाती है."

डॉक्टर वर्मा कहते हैं कि दुनिया भर में फैले पंजाबी एनआरआई की वजह से भी यहां जाति का बंधन टूटता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार