मोदी और राहुल से बड़ी लकीर खींची कन्हैया ने

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काँग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी और उनके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार को लोकसभा में बहस के दौरान जो लकीरें खीचीं, कुछ ही घंटों बाद जवाहरलाल नेहरू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने उनके नीचे एक बड़ी लकीर खींचकर पूरे देश को अपनी बात सुनने पर मजबूर कर दिया.

आख़िर कन्हैया कुमार के भाषण में ऐसा क्या था कि देश भर के मीडिया का ध्यान उसने खींचा और भारतीय जनता पार्टी के समर्थक भी उन्हें एक संभावित राजनीतिक चुनौती के तौर पर देख रहे हैं?

उनके भाषण में ग़ुस्सा नहीं चुटीलापन था. उन्होंने सत्तर और अस्सी के दशक के छात्र नेताओं की तरह आग नहीं उगली, न ही विरोधियों की ईंट से ईंट बजा देने का हुंकारा भरा और न ही ख़ुद को शहीद के तौर पर पेश किया.

पूरे भाषण के दौरान वो लगातार मुस्कुराते और हँसते-हँसाते रहे, लेकिन एक पल के लिए भी इस हँसी-ठिठोली में गंभीर राजनीतिक मुद्दों को उड़ने नहीं दिया.

उनका भाषण पूरी तरह राजनीतिक था जिसमें उन्होंने किसी बात को गोल-मोल तरीक़े से नहीं कहा.

उनके निशाने पर सत्तापक्ष था, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ था और संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) थी.

बीजेपी और आरएसएस ही क्यों, कन्हैया कुमार के भाषण के बाद ख़ुद उनकी पार्टी यानी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के कई “स्थापित नेता” भी आइना देखने पर मजबूर हुए होंगे जो साल दर साल, सुबह से शाम तक प्रेतग्रस्त-से दिखने वाले पार्टी मुख्यालय अजय भवन के अकेले, ठण्डे और अँधेरे गलियारों में सायों की तरह मँडराते समय गुज़ारते रहे हैं.

नरेंद्र मोदी को नॉक आउट पंच देने की कोशिश में राहुल गाँधी चाहे जितना उछल उछल कर हवा में मुक्केबाज़ी करें, वो कभी निशाने के आसपास भी नहीं पहुँच पाते.

पर कन्हैया कुमार ने मुस्कुराते हुए मोदी की आँख में आँख डालकर जैसे सवाल किए, उससे मोदी का कुछ बिगड़े न बिगड़े, राहुल गाँधी के युवा नेतृत्व के लिए एक और चुनौती पैदा हो गई है. ये चुनौती पार्टी के आधार की नहीं बल्कि परसेप्शन की चुनौती है.

विश्वविद्यालय का बेचैन नौजवान उस राहुल गाँधी से प्रेरणा लेगा जो नरेगा, नारेगा या मनरेगा का सही उच्चारण तलाशने की कोशिश में उलझे रहते हैं या ऐसे कन्हैया की तरफ़ देखेगा जिसे एक एक सेकेण्ड के हिसाब से एअरटाइम बेचने वाले टीवी चैनल एक घंटे का निर्विघ्न प्रसारण समय देते हैं?

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पूरे भाषण में कन्हैया ने एक पल के लिए भी इसकी पर्दादारी नहीं की कि उनके निशाने पर संघ परिवार है, पर साथ ही यह भी कहा कि उनके दिल में किसी के ख़िलाफ़ नफ़रत नहीं है — विद्यार्थी परिषद के ख़िलाफ़ तो क़तई नहीं क्योंकि “जेएनयू का एबीवीपी बाहर के एबीवीपी से ज़्यादा तार्किक है” और “हम उन्हें दुश्मन नहीं प्रतिपक्ष की तरह देखते हैं.”

ये बिहार के एक ग़रीब परिवार से आया वो नौजवान है जिस पर राजद्रोह का आरोप लगाया जाता है, देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह एक फ़र्ज़ी ट्विटर एकाउंट के आधार पर पूरे जेएनयू मामले को पाकिस्तानी चरमपंथी हाफ़िज़ सईद से जोड़ते हैं.

दिल्ली के पुलिस आयुक्त भीमसेन बस्सी पहले ठोस सबूत होने का दावा करते हैं और फिर आत्मविश्वास भरी भविष्यवाणी करते हैं कि आगे आगे देखिए होता है क्या.

और जब उसे पुलिस अदालत में पेशी के लिए ले जाती है तो भारी सुरक्षा के बावजूद “राष्ट्रवादी” वकीलों का एक हुजूम अदालत के भीतर उसपर हमला कर उसे पीटता है.

फिर भी जेल से लौटने पर कन्हैया ऐलान करता है - जेल में जब तक चना रहेगा, आना-जाना बना रहेगा. उन्होंने यह कहकर जताने की कोशिश की है कि राजद्रोह का आरोप लगाए जाएँ, पीटा जाए या जेल भेजा जाए पर वो अपनी बात कहने से चूकेंगे नहीं.

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कल तक जो कन्हैया एक अनगढ़, कच्चा, अनुभवहीन, आदर्शवादी छात्र था आज उसमें नेतृत्व की संभावनाएँ देखी जा रही हैं.

संसदीय वामपंथी पार्टियों के सीताराम येचुरी, प्रकाश करात और अतुल अनजान या डी राजा इसलिए ख़ुश हैं कि कन्हैया ने उनकी मुरदा राजनीति में जान फूँक दी है.

जो बात उन्हें कहनी चाहिए थी वो कन्हैया कह रहा है. फ़र्क़ ये है कि अगर यही बात येचुरी, करात, अनजान या राजा कहते तो टीवी चैनल शायद तीस सेकेण्ड से ज़्यादा का समय नहीं देते और देते भी तो लोग उबासियाँ लेने लगते.

पर कन्हैया इन सब पर भारी पड़ा है. हालाँकि वो सीपीआई के छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फ़ेडरेशन (एआइएसएफ़) का नेता है पर वो पार्टी की वजह से नहीं बल्कि पार्टी के बावजूद अपनी अपील बनाए रख पाया है.

क्योंकि नरेंद्र मोदी की तरह कन्हैया भी जानता है कि गूढ़ राजनीतिक मुद्दों पर जनता से सीधे संवाद कैसे किया जाता है.

आप ऐसे कितने छात्र नेताओं को जानते हैं जो खुली सभा में कहने की हिम्मत करें कि हम जो कुछ कहते हैं जनता उसे समझती नहीं है? और फिर अपनी बात लोगों तक पहुँचाने में ऐसे कामयाब होता है कि टीवी कैमरे उससे चिपक कर रह जाते हैं.

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लेकिन ये सिर्फ़ भाषण कला में प्रवीण होने का ही सवाल ही नहीं है. कन्हैया को मालूम था कि वो सिर्फ़ जेएनयू के छात्रों को ही संबोधित नहीं कर रहा — उसके सामने दलित नौजवान थे जो देश भर के विश्विद्यालयों में उसकी बात सुनने का इंतज़ार कर रहे थे.

जिस बात से भारतीय जनता पार्टी, संघ परिवार, काँग्रेस और बहुजन समाज पार्टी को सतर्क हो जाना चाहिए वो है प्रतीकों के बेहतरीन राजनीतिक इस्तेमाल की कला.

कन्हैया और गाँधी में कोई तुलना नहीं हो सकती मगर जिस तरह नमक को गाँधी ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया था उसी अंदाज़ में कन्हैया गुरुवार की रात रंगों से खेला था.

उसने लाल और नीले रंग को राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया और कहा, “जेल में मुझे लाल और नीले रंग को कटोरे दिए गए थे. भाग्य पर मुझे भरोसा नहीं है और भगवान को मैं नहीं जानता. लेकिन उस लाल और नीले रंग को देखकर मुझे लगा कि देश में कुछ अच्छा होने वाला है. नीला रंग अंबेडकर का और लाल रंग इंक़लाब का.”

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लेकिन जेएनयू आंदोलन के दौरान सामने आए कुछ और राजनीतिक प्रतीक हैं जिनसे ज़ाहिर होता है कि पिछले एक दशक में देश का राजनीतिक परिदृश्य जिस तरह से बदला है उसका असर यहाँ के कम्युनिस्ट आंदोलन को भी अपनी ज़द में ले चुका है.

वरना कहाँ कम्युनिस्ट आंदोलन से जुड़े छात्रों के मुँह से जय भीम का नारा निकलता था और उनके जुलूसों में तिरंगा फ़हराया जाता था?

गुरुवार की रात जेएनयू में जो कुछ हुआ उससे क्या भारत का राजनीतिक विमर्श रातोंरात बदल जाएगा? क्या एक रात में एक घंटे का भाषण देकर टीवी पर छा जाने वाले कन्हैया को देखकर बड़े राजनीतिक नतीजे निकाले जाने चाहिए?

शायद नहीं. क्योंकि जिस भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से कन्हैया फ़िलहाल जुड़े हैं उसमें इतना ख़मीर ही नहीं है कि कन्हैया की गिरफ़्तारी से उठे तूफ़ान को समेटकर किसी नतीजे तक पहुँचा सके.

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और उसका बिग ब्रदर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) अपनी पार्टी लाइनों की उलझनों में इस क़दर उलझे हैं कि कन्हैया जैसों को अपना अलग रास्ता तलाशना होगा.

वरना उनकी कहानी भी आनी-जानी हो जाएगी.

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