'बेघर' पंछियों के लिए नकली पेड़

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शहरों की भागदौड़ में अक्सर लोग चिड़ियों के चहचहाने और फ़ुदकने से बेखबर रहते हैं.

अब प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करने और मूल प्रजातियां बचाए रखने के लिए केरल के पक्षी प्रेमियों और पक्षी विज्ञानियों ने घनी आबादी वाले इलाक़ों में नकली पेड़ और बर्ड पार्क बनाने शुरू किए हैं.

इसी के तहत कालीकट में नेशनल हाईवे (47) बाइपास परियोजना के किनारे कृत्रिम पेड़ के आकार वाला दो मंज़िला ढांचा बनाया गया है, ताकि हज़ारों स्थानीय और प्रवासी पक्षियों को आराम करने की जगह और खाने की सुविधा मिल सके.

कालीकट के पास यह अनूठी पहल उरालुंगल लेबर कांट्रैक्ट कोऑपरेटिव सोसाइटी (यूएलसीसीएस) ने की है. यूएलसीसीएस एक इन्फ्रास्ट्रक्चर बिल्डर है जिसने बाइपास प्रोजेक्ट डिज़ाइन किया है.

कंपनी ने खुद माना कि तेज़ी से हो रहा शहरीकरण और शहर का विस्तार प्रवासी पक्षियों की संख्या पर बुरा असर डाल रहा है.

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कंपनी के एक अधिकारी सुनील कुमार कहते हैं, "इस इलाक़े के निवासी इन पक्षियों के लिए पानी और भोजन मुहैया कराएंगे."

उनके अनुसार, "हम इससे वाकिफ़ हैं कि निर्माण परियोजनाएं इन पक्षियों की ज़िंदगी में बाधा डालती हैं. इसीलिए हम अपनी तरह का पहला ऐसा इको फ़्रेंडली नेशनल हाईवे प्रोजेक्ट शुरू कर रहे हैं, जो इस इलाक़े में पक्षियों के रहने की आदर्श जगह बनाने में मदद कर सके."

इस ढांचे के शीर्ष पर नकली शाखाएं और बगीचा बनाया गया है जबकि नीचे पक्षियों के लिए पानी-खाना इकट्ठा करने की जगह बनाई गई है.

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तिरुअनंतपुरम की एक एनजीओ 'द राइटर्स एंड नेचर लवर्स फ़ोरम' ने वन विभाग के साथ मिलकर एक गौरेया पार्क बनाने की परियोजना शुरू की है.

परियोजना से जुड़े वर्गीज़ टी के मुताबिक़, "गौरेया इंसानी रिहाइश और बाज़ारों के आसपास ही मिलती हैं. लेकिन ये प्रजाति धीरे-धीरे ग़ायब होनी शुरू हो गई है. हालांकि पलयाम बाज़ार में गौरेया की काफ़ी प्रजातियां हैं."

पूरे बाज़ार में कम से कम 150 लकड़ी के घोंसले लगाए गए हैं. पक्षियों को यहां भोजन भी मिलता है और वो यहां अपने अंडे भी दे सकती हैं.

राइटर्स एंड नेचर लवर्स फ़ोरम के अध्यक्ष सी रहीम कहते हैं, "गौरेया पासर डोमेस्टिकस नामक प्रजाति की हैं. अप्रैल महीने में हुए सर्वे में 246 गौरेया पाई गई थीं. बाज़ार के व्यापारी और मज़दूर इन्हें दाना चुगाना और उनकी रक्षा करना पसंद करते हैं."

एशियन वॉटरफ़ॉउल सेंसस 2015 से पता चला है कि पानी में रहने वाले पक्षियों की संख्या में तेज़ी से गिरावट आई है. तिरुअनंतपुरम में हुई गणना के मुताबिक़ 49 प्रजातियों के क़रीब 1,874 पक्षी मिले थे.

एडब्ल्यूसी संयोजक और पक्षीविज्ञानी एके शिवकुमार के मुताबिक़, इन पक्षियों की संख्या में कमी की मुख्य वजह लैंड यूज़ में भारी बदलाव और प्रदूषण है.

वह कहते हैं, "इसके अलावा केरल में प्रवासी पक्षियों का आना भी कम हुआ है. यह ख़तरे की घंटी है कि हमें अपना पर्यावरण बचाए रखना होगा और अपने आसपास के पक्षियों और जानवरों को जगह देने के लिए ख़ुद को तैयार करना होगा."

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