यौन हिंसा: बस 8 फ़ीसदी मामलों में मदद मांगी

  • 9 मार्च 2016
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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर मुझे लगा कि आबादी के उस हिस्से के बारे में लिखना चाहिए जिसके साथ सबसे ज़्यादा भेदभाव होता है, और जो सबसे ज़्यादा 'वलनेरबल' है.

राजद्रोह के आरोप में जेल से रिहा होने के बादे छात्र नेता कन्हैया कुमार ने जवाहर लाल यूनिवर्सिटी में जो भाषण दिया वह दुनिया भर में ट्रेंडिंग टॉपिक बना. इसमें उन्होंने दो ऐसी बातें भी कहीं, जो मैं पहले नहीं जानता था.

पहली बात तो यही थी कि जेएनयू अकेली ऐसी यूनिवर्सिटी है जहां आरक्षण पूरी तरह लागू करने के लिए छात्र संघ दबाव डालती है. दूसरी बात ये है कि जेएनयू के छात्रों में 60 फ़ीसदी लड़कियां-युवतियां हैं.

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मैंने ये भी गौर किया कि जब कन्हैया अपना भाषण दे रहे थे, उन्होंने उस समूह का भी जिक्र किया जिसके लिए जेएनयू छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं- उनमें दलित, आदिवासी, महिलाएं और अल्पसंख्यक शामिल थे.

इन छात्रों के आज़ादी के नारों में भी हमेशा पितृसत्ता से आज़ादी दिलाने की बात कही गई, जो असमान्य बात थी और हम सब इसके पक्ष में ही हैं.

भारत भले दुनिया के गरीब देशों में हो, लेकिन यहां मिडिल क्लास पुरुष होना से ही आप ख़ास हो जाएंगे. वहीं दूसरी ओर, किसी भी वर्ग में हों, किसी भी जाति की हों, महिला होने भर से ये तय है कि आपको भेदभाव का सामना करना पड़ेगा. यह पितृसत्तात्मक संस्कृति की वजह से होता है.

भारत में महिलाओं के साथ यौन हिंसा कोई अचरज की बात नहीं है, वास्तविकता ये भी है कि पीड़ित की मुश्किलें बाद में भी काफी बढ़ जाती हैं. ये माना जाता है कि यौन हिंसा की शिकार महिला की इज़्जत चली गई.

किसी भी दिन पीड़ित महिलाओं को यातना देने की भयावह कहानी देखने को मिल जाएंगी. जिस सुबह मैं ये लिख रहा हूं, मेरे सामने 13 साल की एक लड़की की ख़बर है. जिसे जाति पंचायत में सार्वजनिक तौर पर काफी भला बुरा कहा गया वह भी तब जब उसका पिता ही उसके साथ दुर्व्यवहार कर रहा था.

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क्या यह अचरज की बात नहीं है कि यौन हिंसा के मामले में महिलाएं सरकार और समाज पर अविश्वास करती हैं? इसको लेकर तमाम आंकड़े मौजूद हैं.

सरकार नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे कराती है. यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय को मातृत्व और बाल स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराती है ताकि उससे संबंधी नीतियां तैयार हों. इस सर्वे में हिंसा के बारे में पूछा जाता है.

यह थोड़ा जटिल इसलिए भी होता है क्योंकि भारत में पति द्वारा की गई हिंसा चाहे वह जबरन बलात्कार ही क्यों ना हो, उसे अपराध नहीं माना जाता. ऐसे मामले गिने भी नहीं जाते.

15 से 49 साल की 83,703 महिलाओं के बीच किए गए भारत सरकार के सर्वे के कुछ नतीजे देखिए-

  • यौन हिंसा झेलने वाले प्रति एक सौ महिलाओं में केवल एक महिला पुलिस में मामला दर्ज कराती है.
  • 5.7 फ़ीसदी पुरुष अपने पत्नी के इनकार करने के बावजूद जबरन यौन संबंध स्थापित करते हैं. 19.8 फ़ीसदी पुरुष गुस्सा हो जाते हैं और पत्नी को धमकाते हैं. 6 फ़ीसदी पुरुष अपनी पत्नी को पैसा देना बंद कर देते हैं और 4.2 फ़ीसदी पुरुष किसी दूसरी महिला के साथ यौन संबंध बनाते हैं.
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  • अशिक्षित महिलाओं में करीब 44 फ़ीसदी महिला 15 साल की उम्र तक कभी ना कभी हिंसा का सामना करती है. 26 फ़ीसदी महिलाओं ने बीते 12 महीने के अंदर हिंसा को झेला है. हालांकि शिक्षा के होने से यह संख्या कम हो जाती है. 12 साल तक पढ़ाई करने वाली महिलाओं में 14 फ़ीसदी को हिंसा का सामना करना पड़ता है जबकि 12 साल से ज़्यादा उम्र तक पढ़ाई करने वाली महिलाओं में छह फ़ीसदी महिलाओं को हिंसा का सामना करना पड़ा है.
  • कभी ना कभी हिंसा झेलने वाली हर तीन में से दो महिलाएं कभी मदद नहीं मांगती है और ना ही कभी किसी से इस हिंसा का जिक्र तक करती हैं.
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  • यौन हिंसा की शिकार महिलाओं में अधिकांश, करीब 85 फ़ीसदी महिलाएं इसके बारे में किसी को कुछ नहीं बतातीं और केवल आठ फ़ीसदी महिलाएं मदद मांगती हैं.
  • जो महिलाएं यौन हिंसा के साथ साथ शारीरिक हिंसा की भी शिकार हैं उनमें से 37 फ़ीसदी मदद मांगती हैं जबकि केवल शारीरिक हिंसा की शिकार 22 फ़ीसदी महिलाएं मदद मांगती हैं. मदद मांगना भी अपराध करने वाले पर निर्भर होता है. पूर्व पति की हिंसा के मामलों में महिलाओं के मदद मांगने की संभावना ज़्यादा होती है. यह उम्मीद के मुताबिक ही है क्योंकि दांपत्य जीवन में हिंसा के ख़िलाफ़ मदद मांगना ही दुर्व्यवहार करने वाले पति को छोड़ने और शादी तोड़ने की दिशा में पहला क़दम होता है.
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  • कुल मिलाकर देखें तो आंकड़ों से ये मालूम होता है कि शिक्षा और संपत्ति का हिंसा की पीड़ित महिला के मदद मांगने से कोई नाता नहीं होता. हालांकि इसके संकेत जरूर मिले हैं कि ज्यादा पढ़ी लिखी महिला और काफी धन संपत्ति वाली महिला के हिंसा के ख़िलाफ़ मदद मांगने की संभावना कम पढ़ी लिखी और कम संपत्ति वाली महिला की तुलना में कम होती है.
  • दुर्व्यवहार झेल रही महिलाएं ज्यादातर अपने परिवार में ही मदद मांगती हैं.
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  • शारीरिक हिंसा झेलने वाली 72 फ़ीसदी महिलाएं और केवल यौन हिंसा का सामना करने वाली 58 फ़ीसदी महिलाओं के मुताबिक उन्हें ये हिंसा परिवार में ही झेलनी पड़ी है.
  • शहरी क्षेत्र में रहने वाली यौन हिंसा की शिकार महिलाएं ग्रामीण इलाकों में यौन हिंसा की शिकार महिलाओं की तुलना में अपने साथ हुई हिंसा के बारे में ज्यादा रिपोर्ट दर्ज कराती हैं. शारीरिक हिंसा के मामलों में ग्रामीण इलाकों की महिलाएं ज्यादा रिपोर्ट दर्ज कराती हैं.
  • नाममात्र की महिलाएं संस्थागत स्रोतों मसलन, पुलिस, चिकित्सीय अधिकारी और सामाजिक संगठनों से मदद मांगती हैं.
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