'कन्हैया को कन्हैया रहने दें, गांधी-नेहरू न बनाएँ'

  • 7 मार्च 2016
राजमोहन गांधी

महात्मा गांधी के पोते राजमोहन गांधी ने कहा है कि मौजूदा हालात में धर्मनिरपेक्ष पार्टियों को एक साथ मिलकर काम करना चाहिए.

उन्होंने कहा कि जो लोग भी 'संकीर्ण राष्ट्रवाद' के ख़िलाफ़ हैं, अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार पर पाबंदी के ख़िलाफ़ हैं और जो लोग इस बात से चिंतित हैं कि धर्म और झंडे के नाम पर लोगों को बांटा जा रहा है, इन सबको एक साथ मिलकर राजनीतिक कार्रवाई करनी चाहिए.

शनिवार को 'जामिया कलेक्टिव' के कार्यक्रम 'गुफ़्तुगू' में राजमोहन गांधी ने कहा कि अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव में ये बहुत ज़रूरी हो गया है कि मायावती, मुलायम सिंह और कांग्रेस को एक साथ मिलकर काम करना होगा और ये हो भी सकता है.

उन्होंने कहा कि बिहार ने तो दिखा ही दिया है कि एक साथ आने से क्या हो सकता है.

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राजमोहन गांधी के मुताबिक़, यूपी के मुस्लिम मतदाता मायावती और मुलायम पर दबाव डाल सकते हैं.

राजमोहन गांधी ने कहा कि अगर जेएनयू में कुछ छात्रों ने आपत्तिजनक नारे लगाए भी हैं तो उससे किसी को राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जा सकता. अगर नारे लगाना ही राष्ट्रद्रोह है तो ठीक उन्हीं दिनों हरियाणा में जो हिंसा हुई, कई लोग मारे गए, करोड़ों रुपयों का नुक़सान हुआ, क्या उसे राष्ट्रविरोधी नहीं कहा जाना चाहिए?

उन्होंने कहा कि कौन 'नेशनल' और कौन 'एंटी-नेशनल' है, यह संविधान से तय होता है, किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार के कहने से नहीं.

उन्होंने कहा कि आज कल कहा जा रहा है कि जो तिरंगा के नीचे खड़े होकर भारत माता की जय नहीं कहेगा वो देशद्रोही है.

उनका कहना था, ''अगर झंडे (तिरंगा) से अपने आप को लपेटें और लाठी या बंदूक़ लेकर लोगों को मारने लगें और कहें कि झंडा हमें हक़ देता है आपको मारने का. मैं झंडे से प्यार करता हूं आप नहीं करते हैं, मैं आपको मारूंगा. इन सब चीज़ों से देश की इज़्ज़त नहीं बढ़ती.''

राजमोहन गांधी ने कहा कि पीएम मोदी जब बच्चियों और स्वच्छ भारत पर ज़ोर देने की बात करते हैं, तो ये बहुत अच्छी बात है लेकिन प्रधानमंत्री केवल 'एडिटोरियल राइटर' तो नहीं होता.

राजमोहन गांधी ने कहा कि जब धर्म या बीफ़ खाने या फ़र्ज़ी मुठभेड़ के नाम पर लोग मारे जाते हैं, जब सार्वजनिक कार्यक्रम में ऐसा कहा जाता है कि हम मुसलमानों की खोपड़ियों को लेकर अपनी देवी की पूजा करेंगे, तब लीडरशिप का इम्तेहान होता है.

उनका कहना था, ''उस समय अगर हमार लीडर ख़ामोश रहता है, उसका ज़िक्र नहीं करता है, बातें लंबी करता है लेकिन जब इंसाफ़ का सवाल आता है, ज़िंदगी का सवाल आता है, अमन का सवाल आता है तो अगर आवाज़ नहीं आती है तो यही माना जाएगा कि लीडरशिप फ़ेल हुई है.''

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उनके मुताबिक़ जब भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेता हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं तो मोदी न तो उनकी हिमायत करते हैं और न ही उसकी कड़ी निंदा करते हैं, वो ख़ामोश रहते हैं.

राजमोहन गांधी के अनुसार देश की अधिकांश जनता हिंदू राष्ट्र के ख़िलाफ़ है इसलिए वो ऐसा कभी नहीं होने देगी.

राजमोहन गांधी ने मौजूदा माहौल का ज़िक्र करते हुए कहा, ''कई लोग कहते हैं न कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाएंगे, उसी तरह 1947-48 के दौरान मुसलमान मुक्त दिल्ली के नारे लगते थे, लेकिन दिल्ली मुसलमान मुक्त नहीं बनी.''

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राजमोहन गांधी ने कहा, "जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया ने एक ऐतिहासिक भाषण दिया है. लेकिन उसे कन्हैया ही रहने दें उसे गांधी, नेहरू या सुभाष न बनाएं. उसके कांधों पर अपनी आकांक्षाओं का बोझ न डालें."

उनके अनुसार जेएनयू विवाद के कारण देश में राष्ट्रवाद को लेकर एक बहस छिड़ी है जो बहुत अच्छी बात है.

उन्होंने ये भी कहा कि रोहित वेमुला और जेएनयू मामले के बाद कई लोग लिख रहे हैं कि प्रधानमंत्री का देश के युवाओं से संवाद टूट गया है.

दलितों और गांधी के रिश्तों का ज़िक्र करते हुए राजमोहन गांधी ने कहा कि दलितों की गांधी से नाराज़गी जायज़ है. उन्होंने कहा कि गांधी ख़ुद कहते थे, "दलितों को मुझ पर थूकने, मुझ पर हमला करने, मेरी हत्या करने का अधिकार है. अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो ये उनका बड़प्पन है, क्योंकि उच्च जाति, जिसमें मैं भी शामिल हूं, के लोगों ने सैकड़ों वर्षों तक दलितों पर अत्याचार किया है."

लेकिन राजमोहन गांधी ने ये भी कहा कि धीरे-धीरे दलितों को अहसास हो जाएगा कि इस पूरे संघर्ष में गांधी उनकी तरफ़ थे.

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