'लश्कर के टुंडा' के खिलाफ़ मामले ऐसे गिरे..

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सैयद अब्दुल करीम उर्फ़ टुंडा को मीडिया में लश्कर का कथित चरमपंथी बताया गया और उन पर भारत में कई धमाके करवाने का आरोप लगा.

लेकिन एक के बाद एक दिल्ली में दर्ज सभी चार मामलों में टुंडा को अदालतें बरी कर चुकी हैं.

ताज़ा आदेश में शनिवार को दिल्ली की एक अदालत ने टुंडा के खिलाफ़ चौथे मामले को भी खारिज कर दिया.

पुलिस रिपोर्टों के अनुसार एक ऐसा व्यक्ति जिसका नाम उन लोगों की सूची में था जो भारत ने मुंबई हमलों के बाद पाकिस्तान को दी ताकि वो उसको भारत वापस भेजे...

ऐसी सूची में शामिल एक व्यक्ति के खिलाफ़ दिल्ली पुलिस के तमाम सुबूत पेश करने के बावजूद, चारों मामलों अदालत में खारिज हो जाते हैं...

टुंडा के वकील एमएस खान के मुताबिक पुलिस की सूची में टुंडा के खिलाफ़ पूरे भारत में 33 मामले हैं, दिल्ली में उनके खिलाफ़ 20-22 मामले थे.

लेकिन टुंडा को मात्र चार मामलों में गिरफ़्तार किया गया था.

आइए जानते हैं कि टुंडा के खिलाफ़ मामले क्या थे और अदालत ने किस आधार पर मामलों को खारिज किया:

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सैयद अब्दुल करीम उर्फ़ टुंडा पर आरोप थे कि 1992 बाबरी मस्जिद विध्वंस और हिंसा के बाद उन्होंने भारत में चरमपंथी घटनाओं के लिए लोगों को इकट्ठा किया और विस्फ़ोटक मुहैया करवाए.

टुंडा के वकील एमएस खान के अनुसार टुंडा पर लगे करीब 30 से ज़्यादा मामले 90 के दशक के हैं.

पुलिस का आरोप है कि उसने 16 अगस्त 2013 को गुप्त जानकारी के आधार पर टुंडा को भारत-नेपाल सीमा के पास गिरफ़्तार किया और गिरफ़्तारी के वक्त टुंडा के पास 175 अमरीकी डॉलर, 2000 पाकिस्तानी रुपए, 5000 नेपाली रुपए और 4000 भारतीय रुपए थे.

पहला मामला - 1994 गणतंत्र दिवस धमाके

पुलिस का कहना है कि 1994 में दिल्ली पुलिस को ख़बर मिली कि कुछ चरमपंथी दिल्ली और आसपास के इलाकों में 26 जनवरी को धमाके करने के लिए विस्फ़ोटक जमा कर रहे हैं.

पुलिस के अनुसार उसने आफ़ताब नाम के एक व्यक्ति को गिरफ़्तार किया. पुलिस कहती है कि उसने बताया कि उसके भाई अब्दुल करीम या टुंडा कथित तौर पर 'एक आतंकवादी संगठन के प्रमुख' हैं.

पुलिस के मुताबिक आफ़ताब ने बताया कि उसके दूसरे भाई अब्दुल हक़ की दुकान को विस्फ़ोटक जमा करने के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

पहला मामला- अभियोजन पक्ष

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पुलिस ने कहा कि गिरफ़्तार किए पांच लोगों ने इक़बाले जुर्म में अब्दुल करीम की ओर इशारा किया और कहा कि उसने विस्फ़ोटक मुहैया करवाए. पुलिस ने उस दुकान का ज़िक्र किया जहां से टुंडा ने कथित तौर पर जनवरी 1994 में रसायन पोटैशियम क्लोरेट और अमोनियम नाइट्रेट खरीदे थे. साथ ही आरोपों में उस पेट्रोल पंप का ज़िक्र था जहां से धमाके के लिए कथित तौर पर तेल खरीदा गया.

पहला मामला- अदालत ने क्या कहा?

वकील एमएस खान के अनुसार अदालत ने माना कि टाडा के अंतर्गत पांच अन्य अभियुक्तों का इकबाले जुर्म अब्दुल करीम के खिलाफ़ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता क्योंकि दोनों पर मुक़दमा अलग-अलग वक्त चला.

अदालत ने कहा कि अभियुक्तों के इक़बाले जुर्म के अलावा विस्फ़ोटकों के लिए टुंडा को ज़िम्मेदार ठहराने के कोई सुबूत नहीं थे. अदालत ने कहा रसायनों की खरीद साबित करने के लिए कोई बिल या सुबूत नहीं थे. अदालत के मुताबिक पेट्रोल पंप से ईंधन खरीदने की बात भी साबित नहीं होती. अदालत ने कहा- "अभियोजन पक्ष कोई भी प्रभावशाली, कानूनी तौर पर स्वीकार्य सुबूत पेश नहीं कर सका है."

दूसरा मामला - 1997 करोलबाग धमाका

पुलिस के मुताबिक 16 अक्टूबर 1997 में उन्हें एक रेस्तरां रोशन दी कुल्फ़ी में धमाके के बारे में पता चला जहां एक महिला कुमारी सोनिया की मौत हो गई थी.

पुलिस ने आमिर खान और मोहम्मद शकील को गिरफ़्तार किया लेकिन बाद में शकील को छोड़ दिया गया. 23 अप्रेल 2003 को आमिर खान को दोषी पाया गया. मामला उच्च न्यायालय में गया जहां अदालत ने आमिर खान को निर्दोष पाया.

अभियोजन पक्ष के अनुसार आमिर खान और शकील अहमद ने अपने बयानों (डिसक्लोज़र स्टेटमेंट) में कहा था कि टुंडा के कहने पर उन्होंने बम लगाया.

दूसरा मामला- अभियोजन पक्ष

अभियोडन पक्ष ने आमिर खान और मोहम्मद शकील के बयानों को टुंडा के खिलाफ़ मामले का आधार बनाया. अभियोजन पक्ष के अनुसार टुंडा ने अपने डिसक्लोज़र स्टेटमेंट में भी कथित तौर पर शकील और आमिर खान के साथ संपर्क की बात मानी थी.

दूसरा मामला- अदालत ने क्या कहा?

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अदालत ने कहा कि वो शकील और आमिर के बयानों के आधार पर टुंडा के खिलाफ मामला नहीं बना सकते और ये देखना होगा कि क्या इस बारे में कोई स्वतंत्र बातें हैं.

तीसरा मामला- 1997 सदर बाज़ार धमाका

पुलिस के मुताबिक 1 अक्टूबर 1997 को पुलिस को पहाजी धीरज नाम के इलाके के पास धमाके का पता चला जिसमें कई लोग घायल हुए. आमिर खान और मोहम्मद शकील पर घटना को अंजाम देने का आरोप लगा और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया. 1999 में मोहम्मद शकील को आरोपों से बरी कर दिया गया. आमिर खान के खिलाफ़ मुकदमें के बाद उन्हें भी बरी कर दिया गया.

तीसरा मामला- अभियोजन पक्ष

अभियोजन पक्ष के अनुसार आमिर खान और शकील अहमद ने अपने डिसक्लोज़र स्टेटमेंट में टुंडा से संपर्क की बात मानी थी और कहा था कि उन्होंने कथित तौर पर बम टुंडा के कहने पर लगाया था. वर्ष 2013 में टुंडा की गिरफ़्तारी के बाद उन पर इस मामले से मुकदमा चला.

अभियोजन पक्ष ने टुंडा के डिस्क्लोज़र स्टेटमेंट का हवाला देते हुआ कहा कि उन्होंने भी आमिर और शकील से रिश्तों की बात मानी है. उनके मुताबिक इन बयानों के आधार पर टुंडा के खिलाफ़ मामला बनता है.

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उधर बचाव पक्ष ने कहा कि आमिर और शकील के बयानों को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि आमिर को उच्च न्यायालय बरी कर चुकी है जबकि शकील को निचली अदालत ने रिहा कर दिया था. बचाव पक्ष ने ये भी कहा कि टुंडा का एक पुलिस अफ़सर को दिया हुआ बयान अदालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता.

तीसरा मामला- अदालत ने क्या कहा?

अदालत ने एक पुलिस अफ़सर को दिए गए टुंडा के बयान को सुबूत मानने से इनकार कर दिया. साथ ही अदालत ने शकील और आमिर के दिए वक्तव्य (डिसक्लोज़र स्टेटमेंट) को भी नहीं स्वीकारा.

चौथा मामला- 1997 में घुसपैठ

इस मामले के अदालती दस्तावेज़ हासिल नहीं हो सके हैं, लेकिन टुंडा के वकील एमएस खान ने इस ताज़ा मामले की जानकारी दी है.

उन्होंने बताया कि 27 फ़रवरी 1998 को दिल्ली धमाकों के बाद दो लोग पकड़े गए थे. उन दोनों लोगों की पूछताछ के बाद 18 और लोगों को गिरफ़्तार किया गया. ये पाकिस्तानी और बांग्लादेशी थे. इन लोगों ने टुंडा पर धमाके के लिए सुविधाएं मुहैया कराने और बांग्लादेश के रास्ते पाकिस्तान जाने में मदद करने के आरोप लगाए.

उन्होंने कहा कि उन्हें पश्चिम बंगाल में कथित तौर पर मोहम्मद ज़कारिया, बशीरुद्दीन, अल्लाहुद्दीन की मदद मिलती थी. पुलिस ने इस मामले में भी डिसक्लोज़र स्टेटमेंट दिए जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया.

वकील एसएम खान के मुताबिक इस ताज़ा मामले में बरी होने के बावजूद टुंडा अभी जेल में ही रहेंगे क्योंकि दिल्ली के बाहर भी उनके खिलाफ़ कई मामले लंबित हैं.

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