परिवार के बाहर जाएगी पंजाब की राजनीति?

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अगर आप पंजाब में रहते हैं और अकाली दल के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल से नाराज़ हैं तो आप कांग्रेस के उनके प्रतिद्वंद्वी अमरिंदर सिंह को वोट दे सकते हैं.

और अगर आप इन दोनों में से किसी से भी पंजाब में सिखों के मसले पर नाख़ुश हैं, तो आप कट्टर सिख नेता सिमरनजीत सिंह मान को वोट दे सकते हैं.

लेकिन गौर से देखें, तो आप एक ही परिवार के लोगों को वोट दे रहे हैं, जिसे दशकों से पंजाब में वोट मिलता आया है.

ये सभी एक-दूसरे के रिश्तेदार हैं. पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों और हरचरण सिंह बरार के बच्चों के भी एक-दूसरे के साथ संबंध है. यह सभी अच्छी-खासी ज़मीन वाले जट सिख हैं.

प्रकाश सिंह बादल के बेटे और उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल की शादी हरसिमरत कौर से हुई है, जो पूर्व रक्षामंत्री सुरजीत सिंह मजीठिया की पोती हैं.

अमरिंदर सिंह की बेटी की शादी मजीठिया ख़ानदान में हुई है.

बादल की बेटी परनीत कौर की शादी आदेश प्रताप कैरों से हुई है जो पूर्व कांग्रेसी नेता प्रताप सिंह कैरों के वंशज हैं.

अमरिंदर सिंह की पत्नी परनीत कौर और एक पुलिस अधिकारी से कट्टर नेता बने सिमरनजीत सिंह मान की पत्नी गीतिंदर कौर आपस में बहनें हैं.

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बादल की कैबिनेट में मनप्रीत बादल के बाहर होने से पहले बादल परिवार से प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर बादल, मनप्रीत बादल, आदेश प्रताप सिंह कैरों, विक्रमजीत सिंह मजीठिया और जनमेजा सिंह सेखवान को मिलाकर कुल छह सदस्य थे.

जब तक कि वोट कांग्रेस और अकाली दल के अलावा किसी और को नहीं जाता, तब तक अधिकतर वोट कांग्रेस और अकाली दल में मौजूद एक ही परिवार के लोगों को मिलता रहता है.

आम आदमी पार्टी के अंदर कोई ऐसा चेहरा नहीं जो किसी न किसी रूप से इस परिवार से जुड़ा हो, तो यह पार्टी इस परिवार से दूर किसी विकल्प को ढूंढ़ने वाले मतदाता के लिए एक विकल्प हो सकती है.

वर्ष 2012 के चुनाव में एक नई राजनीतिक पार्टी का उदय हुआ, जिसका नेतृत्व बादल वंश के मनप्रीत बादल कर रहे थे.

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लेकिन उन्हें सिर्फ़ छह फ़ीसदी वोट ही मिल पाए और वह कोई खास प्रभाव नहीं डाल पाए. वोट शेयर के हिसाब से भले ही ये वोट शेयर प्रभावी हो, पर वह विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत पाए.

वहीं पड़ोसी राज्य हरियाणा में स्थिति बिल्कुल अलग है. कभी हरियाणा में सत्ता की दावेदारी करने का मौक़ा एक ही बड़े परिवार के लोगों को नहीं मिला है.

बंसीलाल, देवीलाल और भजनलाल कभी भी एक-दूसरे के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर रिश्तेदार नहीं रहे हैं. हालांकि हरियाणा भी पंजाब की तरह जाट बहुल राज्य है.

दोनों ही राज्यों में क़रीब 25 फ़ीसदी जाट वोटर हैं, लेकिन पंजाब में सिख जाट, सिख धर्म के दूसरे अनुयायियों पर भी हावी हैं.

यह तब है, जब पंजाब में 33 फ़ीसदी आबादी दलितों की है, जो देश में सबसे बड़ी दलित आबादी है. बड़ी संख्या में दलित सिख भी हैं.

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यादव बहुल उत्तर प्रदेश और बिहार के विपरीत पंजाब में सत्ता का समीकरण अलग तरह का है. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव को दूसरी पार्टी की ओर से अपने ही किसी पारिवारिक सदस्य की चुनौती नहीं है और न ऐसा लालू प्रसाद यादव के साथ है.

इसकी वजह यह है कि वे अपने परिवार की पहली पीढ़ी से हैं, जो राजनीति में है और अपनी जाति पर अपने राज्यों में उनका पूरा प्रभाव है.

पंजाब में जाटों ने ख़ुद को किसी भी राजनीतिक दल का अभिन्न हिस्सा बनाया हुआ है, जिसके बिना किसी भी राजनीतिक पार्टी का काम नहीं चल सकता.

वे सदियों से यहां ज़मीन के मालिक हैं. उनका अपना साम्राज्य यहां कायम रहा है.

मार्क्सवादी दृष्टिकोण से बात करें तो यह वो वर्ग है जो सत्ता और अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण रखता है. पंजाब में सरकारें बदलने से इस वर्ग में कोई तब्दीली नहीं आई है. इस तरह से हम पंजाब में सामाजिक और राजनीतिक विकास की गति को रुका हुआ पाते हैं.

इसलिए अधिकतर राजनीति ज़मीन के इर्द-गिर्द ही बुनी जाती है.

नक्सलियों के मज़बूत होने के बाद पंजाब में वर्ग संघर्ष का भी एक दौर दिखा था लेकिन प्रकाश सिंह बादल ने 70 के दशक में इस आंदोलन को कुचल दिया था.

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यहां राजनीति में एक ही परिवार के कायम रहने की सबसे बड़ी वजह जाति है. ये सभी नेता अकाली राजनीति की उपज हैं जो ज़मीन और धार्मिक पहचान से जुड़ा है.

लेकिन पारिवारिक संबंधों का एक सकारात्मक पहलू यह है कि सामाजिक संबंधों की तो एक सीमा होती है जिसके बाहर वे नहीं जाते.

लेकिन नया उभरता हुआ वर्ग और उसकी आकांक्षाएं ख़ुद को इस परिवार से नहीं जोड़ पा रही हैं.

इसलिए वे एक नए राजनीतिक विकल्प की ओर देख रहे हैं जो आम आदमी पार्टी के रूप में उनके सामने हो सकता है.

राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर पीएस वर्मा उत्तर भारत के राजनीतिक परिवारों पर काम कर चुके हैं.

वह कहते हैं, "दक्षिण एशिया की राजनीति में परिवारों का बहुत महत्व है. इसकी वजह से ही इन देशों में महिलाओं की स्थिति बहुत बेहतर न होने के बावजूद भारत में इंदिरा गांधी, पाकिस्तान में बेनज़ीर भुट्टो, बांग्लादेश में शेख हसीना और श्रीलंका में सिरिमाओ भंडारनायके प्रधानमंत्री बन सकी थीं."

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