'सरहद पर मौत तो बना दिया हीरो, पर...'

एक नज़रिए से भारत ख़ास देश है. यह इकलौता ऐसा प्रमुख देश है जिसमें अभिजात्य तबका अपनी भाषा में बात नहीं करता है, वह उस भाषा में बात करता है जो आम लोगों की भाषा भी नहीं है.

यह दिल्ली, मुंबई, बैंगलुरू, चेन्नई, हैदराबाद या फिर किसी भी अन्य शहर की वास्तविकता है. यहां अभिजात्य से मेरा तात्पर्य शहरी मध्य वर्ग से है, अल्पसंख्यक होते हुए भी देश के आर्थिक एजेंडे और राष्ट्रीय सुर्खियों के एजेंडे में इनका दबदबा दिखता है.

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सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केवल पांच करोड़ यानी करीब चार फ़ीसदी भारतीयों के पास पासपोर्ट है. मेरा अनुमान है कि यह संख्या उन लोगों की संख्या से बहुत ज़्यादा होगी जिनकी पहली भाषा अंग्रेजी होगी. ये लोग अपनी मातृभाषा बोलना जानते होंगे जो हिंदी, गुजराती, मराठी, तेलुगू, ओडिया या फिर कन्नड़ कुछ भी संभव है. लेकिन ये लोग इसका इस्तेमाल नहीं करते.

ये लोग अपनी मातृभाषा के वर्णों को पहचान ज़रूर लेते हैं, लेकिन वे अपनी मातृभाषा का ना तो साहित्य पढ़ते हैं और ना ही समाचार देखते हैं. संगीत को छोड़कर उनकी सांस्कृतिक प्राथमिकताएं जिनमें टीवी धारावाहिक और सिनेमा शामिल हैं, सब अंग्रेजी की सामग्री होती हैं.

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ये कहा जा सकता है कि भारतीय लंबे समय से अंग्रेजी बोलते और लिखते रहे हैं और इस लिहाज से अंग्रेजी को भारतीय भाषा समझा जाना चाहिए. मैं इसे सशर्त स्वीकार कर लूंगा, लेकिन तब यह बताऊंगा कि जो अंग्रेजी हमारे टीवी चैनलों पर बोली जा रही है और जो हमारी मीडिया में लिखा जा रहा है वह वास्तविक अंग्रेजी का कच्चा संस्करण है.

बहरहाल ऐसी अंग्रेजी किस तरह से हम पर प्रभाव डाल रही है?

इसका पहला पहलू तो यही है कि शहरी मध्य वर्ग की चिंताएं राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में सबसे ज़्यादा नजर आती हैं. हमारा मीडिया कुपोषण से होनेवाली मौतों की तुलना में कुछ छात्रों के नारे लगाने की घटना को कहीं ज़्यादा तरजीह देता है. यह स्पष्ट नहीं है कि राष्ट्रविरोधी नारों से सीधे तौर पर कितने भारतीय प्रभावित हुए हैं.

हम उन छात्रों के नारों से आहत हो सकते हैं, लेकिन नारे तो केवल शब्द भर थे. हर साल कुपोषण से पांच लाख भारतीय बच्चों की मौत होती है. लेकिन यह कभी किसी टीवी बहस का मुद्दा नहीं बनता, क्योंकि यह अंग्रेजी बोलने वाले मध्य वर्ग को प्रभावित नहीं करता.

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दूसरा पहलू ये है कि हमारी आर्थिक प्राथमिकताएं भी प्रभावित होती हैं. मीडिया का ध्यान राष्ट्रवादी मध्य वर्ग पर ज़्यादा होता है लिहाजा हम लोग एक लाख करोड़ रुपए की बुलेट ट्रेन पर उस देश में गंभीरता से बात करते हैं जहां 30 करोड़ लोग गरीबी और अभाव में जीवन यापन करते हैं.

इसकी बड़ी सामान्य वजह है- भारत में ग़रीबों की कोई आवाज़ नहीं होती. हमारे देश की राजनीति पर भी इस मध्य वर्ग का बहुत ज़्यादा प्रभाव है.

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हर साल कश्मीर में अलगाववाद या फिर इस्लामी चरमपंथी हमले में होने वाली मौतों से कहीं ज़्यादा लोग पूर्वोत्तर और मध्य भारत में चरमपंथी हमलों में मरते हैं. इसको लेकर स्पष्ट आंकड़े भी उपलब्ध हैं. लेकिन इस्लामी ख़तरों पर नियमित तौर पर बहस देखने को मिलती है क्योंकि यह शहरी मध्य वर्ग की व्यग्रताओं को बढ़ाता है. निश्चित तौर पर माओवादियों और पूर्वोत्तर के अलगाववादियों का उनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता.

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यही वजह है कि पाकिस्तान से सटी सीमा पर किसी सैनिक की मौत, चाहे वह दुर्घटनावश ही क्यों नहीं हुई हो, होने पर उन्हें हीरो बनाकर पेश किया जाता है. इस देश के मध्यवर्ग को सौरभ कालिया से लेकर हनुमनथप्पा तक का नाम मालूम होगा, लेकिन पूर्वोत्तर या छत्तीसगढ़ में मरे किसी सैनिक का नाम याद करना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा.

हमारे समाचार पत्रों में नियमित तौर पर नाव डूबने और मंदिर में भगदड़ मचने से हुई सैकड़ों मौत की ख़बर होती है. सरकारी स्कूलों में विषाक्त भोजन से होने वाली बच्चों की मौत, नेत्र शिविर में लोगों के अंधे होने की ख़बर और अवैध नकली शराब पीने से हुई मौतों की भी ख़बर होती हैं. लेकिन यह टीवी पर बहस कराने के नजरिए से उतने महत्वपूर्ण नहीं होते, जितने नारे लगाने की घटना.

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मैं यहां ये भी जोड़ना चाहता हूं कि इन ख़बरों की कवरेज की तुलना किसी इलीट वर्ग से संबंधित मर्डर स्टोरी (उदाहरण के लिए शीना बोरा हत्याकांड) से करके देखिए.

अंग्रेजीभाषी मध्य वर्ग के हमलोग भारत की बहुसंख्यक आबादी के बारे में उदासीन हैं. हम केवल ये चाहतें हैं कि हमारी समस्याओं और चिंताओं पर बहस हो. बाकी सभी भारतीय अप्रासंगिक हैं. अगर यह एंटी-नेशनलिज़्म नहीं है तो क्या है?

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अंग्रेजी के प्रभुत्व से जुड़ा दूसरा पहलू भी देखना चाहिए. भारतीय मध्य वर्ग की यूरोप की शास्त्रीय संस्कृति में सीमित घुसपैठ है. हम लोग केवल लोकप्रिय चीज़ों में दिलचस्पी रखते हैं. उदाहरण के लिए, शास्त्रीय संगीत और सद्भाव को समझे बिना यूरोपीय संस्कृति को समझना संभव नहीं है.

भारत में सद्भाव की कोई परंपरा नहीं है, इसका मतलब ये है कि हम दो अलग-अलग धुनें एक ही वक्त बजा रहे हैं. जो शास्त्रीय सिम्फनी संगीत कार्यक्रम देखते हैं, उन्होंने ध्यान दिया होगा कि कोई हीरो नहीं होता है. कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आदमी कंडक्टर, कोई इस्ट्रूमेंट नहीं बजाता. वह केवल समय का ध्यान रखता है. वहां सभी संगीतकार बराबरी के होते हैं, हिंदुस्तानी और कर्नाटका संगीत में तो पदक्रम होते हैं.

इस सांस्कृतिक समानता और सद्भाव का यूरोपीय समाज के लिए क्या मतलब है? क्या यही वजह है कि यूरोपीय देश वास्तविक टीम स्पोर्ट्स फ़ुटबॉल बेहतर ढंग से खेलते हैं? भारतीय ये नहीं जानते हैं. उनकी दिलचस्पी केवल पश्चिमी देशों में लोकप्रिय चीज़ों और ट्विटर तक ही सीमित है. यह ना तो गंभीर है और ना ही सार्थक. ये सतही और व्यर्थ चीज़ें हैं.

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हां, ये सही है कि भारतीयों के लिए अंग्रेजी जानने के कई फ़ायदे हैं. सबसे अहम फ़ायदा आर्थिक है और यहां भी फ़ायदा केवल मध्य वर्ग को है. लेकिन अंग्रेजी बोलने वाला मध्य वर्ग हमारे राष्ट्रीय संवाद, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे एजेंडे का जितना नुकसान कर रहा है, उसकी भरपाई नहीं हो सकती.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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