राजनीति की भाषा से ग़ायब होता संयम

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आजकल राजनीतिक विरोधियों और दूसरी विचारधारा के लोगों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा और उनसे अलग मत ज़ाहिर करने के लिए 'भाषाई अनुदारवाद' का बेरोक–टोक इस्तेमाल हो रहा है.

लेकिन कोई भी दल या समाज इस पर चिंता ज़ाहिर नहीं करना चाहता है. यह काफ़ी चौंकाने और परेशान करने वाली बात है.

ताज़ा मामला दिल्ली का है.

सत्तारूढ़ दल आम आदमी पार्टी के विधायक अमानतुल्लाह ख़ान ने देश की लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनी हुई सरकार के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसे सभ्य समाज की अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार करने पर बहस छिड़ गई है.

मामला 16 फ़रवरी का बताया गया है. आरोप है कि एक सभा में विधायक ने नरेंद्र मोदी सरकार के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया.

उन्होंने गृहमंत्री के घर भीड़ इकट्ठी करने की धमकी भी दे दी.

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अमानतुल्लाह ख़ान के पास अपने बचाव में दलीलें भी हैं. उनका कहना है कि उनके कहे शब्द प्रधानमंत्री पर व्यक्तिगत हमला नहीं हैं.

आम आदमी पार्टी ने अपने विधायक के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की है. ऐसा होने की कोई संभावना भी नहीं है.

दिल्ली की इस घटना को एक अपवाद मानते हुए नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता.

मौजूदा राजनीति में असहमति ज़ाहिर करने के मामले में 'भाषाई हिंसा' का न सिर्फ़ व्यापक और बेख़ौफ़ इस्तेमाल हो रहा है, बल्कि उसका लगातार विस्तार भी हो रहा है.

सुदूर केरल में मलयालम भाषा के टीवी चैनल एशिया नेट की महिला एंकर सिंधु सूर्यकुमार को अपने एक ‘टॉक शो’ के बाद अपमानजनक और भावनात्मक रूप से आहत करने वाली भाषा का सामना करना पड़ा.

यह ‘असहमति की ज़ुबान’ को लेकर बढ़ते हुए उन ख़तरों की ओर इशारा करती है, जिनके प्रति हम या तो पूरी तरह से अनजान हैं या सच्चाई से नज़रें चुरा रहे हैं.

टीवी एंकर ने आरोप लगाया है कि ‘टॉक शो’ के बाद उन्हें कोई दो हज़ार से ज़्यादा धमकी भरे फ़ोन कॉल मिले.

सिंधु सूर्यकुमार ने जेएनयू में बांटे गए एक पर्चे पर टॉक शो रखा था.

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केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने संसद में 24 फ़रवरी को दिए गए अपने भाषण में इस पर्चे का उल्लेख किया था.

अपने ‘टॉक शो’ में केंद्रीय मंत्री का पढ़ा हुआ दोहराने की वजह से ही सिंधु सूर्यकुमार को केरल में संकट का सामना करना पड़ा. पुलिस इस सिलसिले में कुछ लोगों को गिरफ़्तार कर चुकी है.

हाल ही में केंद्रीय मंत्री रामशंकर कठेरिया का पिछले दिनों आगरा में दिया गया भाषण भी विवादों में है.

इसके अलावा समय-समय पर कुछ दूसरे सांसदों के बयानों की भाषा को लेकर संसद में ग़ुस्सा और पक्ष-विपक्ष के बीच किसी तरह की सहमति नहीं होने से साफ़ है कि स्थिति अब बेक़ाबू होती जा रही है.

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कठेरिया का बचाव करते हुए कहा कि मंत्री ने आगरा में कोई भड़काऊ बात नहीं कही थी.

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आम आदमी पार्टी का अपने विधायक के पक्ष में उतरना और केंद्र सरकार का अपने मंत्री का बचाव करना समझा जा सकता है.

भारत की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में इससे पहले शायद ही कभी ऐसा हुआ हो.

जून 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के लगाए गए ‘आपातकाल’ के दौरान कोई डेढ़ साल तक समूचे विपक्ष को जेल में बंद कर दिया गया था.

नागरिकों के मूलभूत और लोकतांत्रिक अधिकार छीन लिए गए थे. पूरे राष्ट्र पर एक व्यक्ति की ‘तानाशाही’ थोप दी गई थी.

लेकिन तब भी इंदिरा गाँधी और उनकी सरकार के प्रति विपक्षी दलों, नेताओं और आम नागरिकों ने वैसी अमर्यादित भाषा का प्रयोग नहीं किया होगा जैसी आज अमूनन सभी पक्ष कर रहे हैं.

राजनीतिक रूप से तीखे और कटु शब्दों और नारों का इस्तेमाल ज़रूर किया गया, तो ऐसा करना हालात के मुताबिक़ ज़रूरी भी था.

पर आरोप-प्रत्यारोप की भाषा ने सहनशीलता और संवेदनशीलता की हद को इस तरह पहले कभी पार नहीं किया होगा.

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अपवादों की बात न करें तो, भाषा के इस्तेमाल को लेकर ‘संसद से लेकर सड़क तक’ देश की राजनीति आमतौर पर अनुशासनबद्ध और सुसंस्कृत ही रही है.

वीपी सिंह जिस समय प्रधानमंत्री थे, मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने के मुद्दे पर पूरे देश में बवाल मच गया था. छात्रों के आत्मदाह की घटनाएं तक हुई थीं.

सरकार को इसकी राजनीतिक क़ीमत भी चुकानी पड़ी थी. पर उस समय भी वैचारिक असहमति हिंसक भाषा के इस्तेमाल की अराजकता में वैसी तब्दील नहीं हुई, जैसा आज दिख रही है.

एक-दूसरे के विचारों के प्रति असहमति को ज़्यादा से ज़्यादा आक्रामक अंदाज़ में ज़ाहिर करने की कोशिशें पूरे देश में हो रही हैं.

कुल मिलाकर अंत में मसला ये है कि लगातार आक्रामक और हिंसक होती भाषा के सवाल पर लोगों की सहमी हुई चुप्पी और देश को विकास के रास्ते पर ले जाने की कोशिशों में भागीदारी की अपेक्षा– क्या दोनों साथ-साथ चल सकते हैं?

हक़ीक़त यह भी है कि वे तमाम लोग जो अपने विरोधियों के प्रति असंयत, अभद्र और आक्रामक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें अपने-अपने लोगों की ताक़त पर पूरा भरोसा है.

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पर उन्हें देश की जनता के समर्थन पर शायद उतना भरोसा नहीं है.

इसलिए क्या मान लिया जाए कि उन्हें देश की चिंता वैसी नहीं जैसी हम करना या देखना चाहते हैं?

देश के बदलते हुए हालात में हम ग़लत भी हो सकते हैं कि इस तरह के सवाल खड़े कर रहे हैं और अकेले पड़ते जा रहे हैं.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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