मां इंतज़ार करती रहीं लेकिन कांशीराम नहीं आए

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दलित नेता कांशीराम के गांव पहुंचने के बाद उनका गांव फिर से सुर्ख़ियों में आ गया है.

केजरीवाल बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक की 82वीं सालगिरह पर मंगलवार को उनके घर गए.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी इस मौक़े पर पंजाब के नावानशहर में एक रैली की.

कांशीराम का परिवार अभी भी उनके ननिहाल पंजाब के रोपड़ ज़िले के पृथ्वीपुर गांव में रहता है. कांशीराम का जन्म इसी गांव में हुआ था.

हालांकि उनके पिता ख़्वासपुर के रहनेवाले थे.

उनकी सालगिरह पर परिवार उन्हें याद करते हुए कहता है कि कांशीराम की मां बिशन कौर ने कांशीराम का इलाज कराने के लिए अपने सोने के कंगन पार्टी को दान में दे दिए थे.

कांशीराम की छोटी बहन स्वर्ण कौर कांशीराम को उनके सालगिरह पर याद करती हुई कहती हैं, "मायावती ने उनके 2003 में गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद कहा कि साहिब (कांशीराम) के इलाज के लिए पैसे नहीं हैं और पैसे मांगे. मेरी मां ने तुरंत उन्हें अपने सोने के कंगन दे दिए."

मां बिशन कौर की 95 साल की उम्र में साल 2005 में पीजीआई चंडीगढ़ में मृत्यु हो गई थी.

उस वक़्त ऐसा माना जा रहा था कि कांशीराम के कहने पर डॉक्टर उनकी मां का ख़्याल रख रहे थे जबकि कांशीराम ख़ुद उस वक़्त बहुत बीमार थे और बिस्तर पर पड़े थे.

वो उस वक़्त किसी से कुछ बोलने के हालत में भी नहीं थे. कांशीराम की अगले ही साल अक्तूबर 2006 में मृत्यु हुई.

स्वर्ण कौर याद करती हैं, "जब मां अस्पताल में थीं तो उन्होंने साहिब का हाल पूछा. डॉक्टरों ने उन्हें सांत्वना देते हुए कहा कि साहिब ठीक हैं और उन्होंने अपनी मां का ख़्याल रखने को कहा है."

जब मायावती कांशीराम की देख रेख कर रही थी तो बिशन कौर ने कांशीराम से मिलने की इजाज़त लेने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

कांशीराम की देख रेख को लेकर बिशन कौर और मायावती के बीच लंबा संघर्ष चला. काशीराम बीमार थे तब बिशन कौर को अपने बेटे से मिलने का दो बार मौक़ा मिला.

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हालांकि मायावती की बिशन कौर और कांशीराम के साथ वाली तस्वीरें घर में हर जगह मौजूद है.

स्वर्ण कौर बताती हैं, "जब टीवी चैनल यह ख़बर चला रहे थे कि अपनी मां के अस्पताल से वापस आने के फ़ौरन बाद अमिताभ बच्चन उनसे मिलने गए तो मेरी मां भी कहने लगी कि जब कांशी अच्छा हो जाएगा तो वो मुझसे मिलने आएगा लेकिन मेरी दुखी मां उन्हें नहीं देख सकी."

उन्होंने वो सोफ़ा दिखाया जिस पर बैठकर काशीराम की मां अपने बेटे के वापस आने का इंतज़ार करती रहीं लेकिन वो कभी नहीं आए.

जब कांशीराम बड़े आदमी बन गए तब उनके जन्मस्थल पर एक स्मारक बनाने का फ़ैसला किया गया. कांशीराम ने कहा था कि इसे झोपड़ीनुमा ढांचा बनाया जाए क्योंकि वे झोपड़ी में ही पैदा हुए हैं.

शुरू में इसे ऐसा ही बनाया गया लेकिन आख़िर में वो एक भव्य घर में तब्दील हो गया. इसे मायावती ने पार्टी के फंड से बनाया.

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कांशीराम की भांजी परमिंदर कौर एक दिलचस्प वाक़या सुनाती हैं.

जब वो छोटी थीं तो उनसे पूछा गया था कि वे इस फूस की झोपड़ी से ख़ुश हैं. तब परमींदर कौर ने कहा था, "मैं सारी रात चूहों के कारण सो नहीं पाई."

परमिंदर ने कहा कि वो तब रो पड़ी थीं जब उन्होंने अपने मामा को एक तस्वीर में ढाबे पर फटे हुए कपड़ों में खाना खाते हुए देखा था.

स्वर्ण कौर अलग ही कहानी बताती हैं, “मेरे भाई ने पार्टी के लोगों से पानी पीने और हवा खाने को तैयार रहने को कहा. वो एक बार नौ दिनों तक भूखे रहे.”

कांशीराम अपने जवानी के दिनों में ऐसे नहीं थे. वो अकेले चार लीटर खीर और दो लीटर दूध पी जाते थे. उन्होंने बताया कि कांशीराम गांव में कुश्तीबाज़ी के चैंपियन थे.

स्वर्ण कौर ने बताया कि वो हर सुबह चार किलोमीटर तक पैदल टहलते थे. वो तैराकी में भी चैंपियन थे. वो सतलज नदी तैर कर पार करते थे.

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स्वर्ण कौर और दो बार विधायक रह चुके कांशीराम के पुराने सहयोगी शींगारा सिंह ने कहा, " कांशीराम ने कभी भी तिलक (ब्राह्मण), तराज़ू(बनिया) और तलवार (राजपूत), इनको मारो जूते चार, का नारा नहीं दिया."

कांशीराम ने बताया था कि जब वे पुणे डीआरडीओ की नौकरी करने गए थे तो वे वहां किराए का घर ढूंढ़ रहे थे. वो एक ऊंची जाति के मकान मालिक के पास गए. लेकिन जब उन्होंने अपनी जाति बताई तो मकान मालिक ने उन्हें किराए पर घर देने से मना कर दिया था.

लेकिन कांशीराम दोबारा तीन महीने बाद उसी मकान मालिक के पास गए. "इस बार उस परिवार के लोगों ने उनसे कहा कि तुम किसी और जाति के तो दिखते नहीं हो. तुम कई बॉलीवुड अभिनेताओं से ज्यादा सुंदर दिखते हो."

उस ऊंची जाति के परिवार ने आख़िरकार उन्हें किराए पर घर दे दिया और बाद में अमरीका में डॉक्टरी कर रही अपनी बेटी से शादी का प्रस्ताव भी रखा.

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कांशीराम के गांव ख्वासपुर में भी जाति की बात को लेकर उनके दोस्तों के बीच तनाव हुआ.

सबसे आश्चर्य की बात ये है कि कांशीराम का कोई भी क़रीबी मित्र दलित नहीं था. उनके जो तीन सबसे अच्छे दोस्त थें उनमें एक जाट, एक सैनी और एक ब्राह्मण थे.

उस समय का एक मशहूर वाक़या है. किराए के घर को लेकर यह बात हुई तो कांशीराम ने अपने एक क़रीबी दोस्त एडवोकेट भोला सिंह के साथ खाना खाने से मना कर दिया.

भोला सिंह ने तब कांशीराम से कहा कि वे उनका छोड़ा हुआ जूठन खाएंगे. इस बात ने फिर दोनों दोस्तों को एक कर दिया.

कांशीराम समाज सेवा करना चाहते थे. जब उनकी मां ने उन्हें शादी करने के लिए कहा तो "कांशीराम ने मां को समझाया कि उन्होंने समाज की भलाई के लिए ख़ुद को समर्पित कर दिया है."

कांशीराम के भाई दलवार सिंह उनसे 18 साल छोटे हैं. वो बीएसपी की स्थापना से पहले 'दलित शोषित समाज संघर्ष समिति' और बामसेफ़ के कार्यकर्ता भी रह चुके हैं.

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दलवार सिंह ने कहा, "साहिब, परिवारवाद की बुराई करते थे इसलिए मैंने उनसे कभी कुछ नहीं मांगा."

कांशीराम के परिवार के सदस्य कांशीराम के पक्के अनुयायी हैं. परिवार के लोग बताते हैं कि समाजवादी पार्टी के प्रमुख मुलायम सिंह यादव और कांशीराम एक दूसरे का सम्मान करते थे और दोनों ने कभी भी एक-दूसरे की व्यक्तिगत रूप से आलोचना नहीं की.

दलवार सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर के लिए चुनाव प्रचार किया है. नीरज शेखर ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर पूर्व प्रधानमंत्री की मृत्यु के बाद उपचुनाव लड़ा था.

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