'माल्या के मेल आते रहे, तनख़्वाह मिलेगी...'

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा

जब मैं तीसरी क्लास में पढ़ती थी, तबसे मेरा सपना था कि मैं एयरहोस्टेस बनूं. किंगफ़िशर एयरलाइन्स का बंद होना मेरे उस सपने की मौत होने जैसा है.

मैं अपने करियर की बुलंदी पर थी. इन-फ़्लाइट डायरेक्टर के तौर पर किंगफ़िशर की उड़ानों पर एयर होस्टेस और केबिन क्रू की पूरी टीम की अध्यक्षता करती थी.

अगस्त 2006 में किंगफ़िशर की शुरुआत के साथ ही मैंने वहां काम करना शुरू किया और उसे बाक़ी सब भारतीय एयरलाइन्स से बेहतर और आरामदायक सफ़र देने वाली विमान सेवा बनाने में हमारी टीम का बड़ा योगदान था.

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मुझे भी उससे मोहब्बत थी, इसीलिए 2012 की शुरुआत में जब तन्ख़्वाह मिलने में देरी होने लगी तब भी हम काम करते रहे.

हमें कभी सीईओ तो कभी ख़ुद विजय माल्या से ईमेल आता था कि तन्ख़्वाह कुछ समय में आ जाएगी और एयरलाइन्स को बचाने की कोशिशें जारी हैं.

जब कंपनी बंद होती है तो सारे उद्योग को पता चल जाता है. ऐसे कंपनी में काम कर रहे लोगों के लिए नई नौकरी उसी ओहदे या तन्ख़्वाह पर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है.

ख़ास तौर पर तब जब आप सीनियर हो चुके हों, जैसे मैं 37 साल की हो चुकी थी. केबिन क्रू की टीम में 35 साल की उम्र के बाद नई नौकरी मिलना बहुत मुश्किल होता है.

दो साल तक मैं बेरोज़गार रही. मेरा व्यवहार भी बदल गया. चिड़चिड़ापन, उलझन और डिप्रेशन की वजह से ये समय मेरे परिवार के लिए भी बहुत मुश्किल था.

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मेरे पति ने इस व़क्त मेरा बहुत साथ दिया. वो समझते थे कि 17 साल से हर हफ़्ते देश या दुनिया के दूसरे हिस्से में होने वाली उनकी पत्नी के लिए घर में बैठना कितना मुश्किल था.

मैंने 1995 में ईस्ट-वेस्ट एयरलाइन्स के साथ अपने करीयर की शुरूआत की थी. मेरी क़िस्मत देखिए कि वो एयरलाइन्स भी बंद हो गई. तब भी महीनों की तन्ख़्वाह चली गई.

पर तब मेरी उम्र कम थी और दूसरी नौकरी मिलने में दिक़्क़त नहीं हुई. किंगफ़िशर के बंद होने पर ढाई साल की तन्ख़्वाह और ग्रेचुटी अभी भी बक़ाया है और नौकरी क्या एविएशन उद्योग ही छूट गया.

अब मुझे एक ‘रिअल एस्टेट’ कंपनी में नौकरी मिल गई है. आम लोगों की तरह मेरी भी सुबह नौ बजे से शाम पांच बजे की दिनचर्या हो गई है.

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मैं ख़ुशक़िस्मत हूं क्योंकि किंगफ़िशर में बतौर पायलट और ग्राउंड स्टाफ़ काम कर रहे मेरे कई साथियों को अबतक दूसरी नौकरी नहीं मिल पाई है.

लेकिन सुबह जब मैं उठकर काम पर निकलती हूं तो अक्सर ऐसा महसूस नहीं होता.

वो वक़्त याद आता है जब सुबह हम विमान में हम हर चीज़ जांचते थे, नए लोगों से मिलते थे, कोई दिक्क़त आती थी तो उससे जूझने के नए तरीक़े निकालते थे.

जब सुबह तड़के बादलों के बीच से उगते सूरज के साथ, हमारा हवाई जहाज़ उड़ान भरता था या जब तूफ़ान के बीच कॉकपिट वाली खिड़की से बिजली कड़कती दिखती थी तो वो दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत नज़ारे होते थे.

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मैं हर किसी को कहती थी कि अगर इस उद्योग में पांच साल से ज़्यादा गुज़ार लिए तो फिर मानो रगों में ख़ून नहीं ‘एविएशन फ़्यूल’ बहने लगता है.

मेरा सपना टूट गया है. जो मैं करने के लिए पैदा हुई थी वो मैं अब कभी नहीं कर पाऊंगी. इस अनुभव ने मानो अचानक मुझे दुनियादारी सिखा दी है.

(बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत पर आधारित)

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