टुंडा कैसे पहुँचे पिलखुआ से पाकिस्तान?

इमेज कॉपीरइट AP

‘लश्कर चरमपंथी’ सैयद अब्दुल करीम उर्फ़ टुंडा की पहली पत्नी ज़रीना कराची से भारत वापस आने के लिए बेक़रार हैं.

क़रीब 20 साल पहले वह गाज़ियाबाद के पास पिलखुआ से पाकिस्तान के कराची शहर पहुँची थीं.

कराची के कोरंगी में रह रहीं ज़रीना ने बीबीसी को फ़ोन पर बताया, ''अपने वतन को छोड़ने को किसका दिल चाहता है. हम वहीं पैदा हुए, वहीं हमारी शादी हुई, लेकिन वहां पुलिस ने बहुत परेशान किया.''

ज़रीना बहुत बीमार रहती हैं और उन्हें चलने में भी दिक़्क़त होती है.

वह कहती हैं, ''मेरे भाई, बहन, देवर सभी वहीं हैं, लेकिन क्या करें? हम मजबूर हैं. वहीं हमारी ससुराल है. अब लग रहा है कि कब अल्लाह का बुलावा आ जाए.''

इमेज कॉपीरइट CBI India

टुंडा के शहर पिलखुआ में आज भी बातें होती हैं कि कैसे एक दिन टुंडा और कुछ महीने बाद उनका परिवार पिलखुआ से अचानक ग़ायब हो गया.

दिल्ली पुलिस ने टुंडा को चरमपंथी गुट लश्कर का बम एक्सपर्ट बताया था, जिनके गुट ने देश में दिल्ली सहित कई जगह धमाके करवाए.

रिपोर्टों के अनुसार, 26/11 के हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को मोस्ट वांटेड की सूची दी, जिसमें टुंडा का भी नाम था.

मीडिया रिपोर्टों में टुंडा के तार लश्कर-ए-तोएबा, दाऊद इब्राहीम, आईएसआई से जोड़े गए, पर अदालत ने टुंडा को एक के बाद एक चार धमाकों के मामलों में बरी कर दिया है.

अदालती काग़ज़ों के अनुसार, गुप्त जानकारी के आधार पर 16 अगस्त 2013 को टुंडा को भारत-नेपाल सीमा से गिरफ़्तार किया गया.

पाकिस्तान में टुंडा की तीन बीवियां रहती हैं: पिलखुआ की रहने वाली ज़रीना, अहमदाबाद की मुमताज़ और पाकिस्तान की आसमां.

जब टुंडा ने अहमदाबाद में मुमताज़ से शादी की तब ज़रीना को शादी के बारे में पता भी नहीं था. कहते हैं कि एक बम धमाके में उनका बायां हाथ उड़ गया था. इसके इलाज के लिए वह घर पहुँचे, जिससे परिवार को उनकी शादी के बारे में पता चला.

टुंडा के परिवार का दावा है कि हाथ बम धमाके से नहीं बल्कि किसी मशीन से दुर्घटना के कारण हुआ.

टुंडा और उनके परिवार के पिलखुआ से पाकिस्तान पहुँचने की कहानी में कई परते हैं, लेकिन कई बातें साफ़ नहीं हैं.

'सातवीं कक्षा तक पढ़े' टुंडा का ज़्य़ादा वक्त पिलखुआ से बाहर अहमदाबाद में अपनी पत्नी के पास बीतता था. परिवार के मुताबिक़ उनका कारपेंटरी का काम था, फिर उन्होंने कपड़े का काम किया. बाद में उन्होंने लखनऊ से होम्योपैथी की डिग्री ली और वह इसी से जुड़़ी दुकान खोलने की बात करते थे.

इमेज कॉपीरइट AP File

1993 में टुंडा का नाम धमाकों के सिलसिले में लिया जाने लगा. कहा गया सांप्रदायिक दंगों ने उन पर काफ़ी असर डाला था और वह चरमपंथी हो गए थे जिन्होंने देश के कई हिस्सों में धमाके करवाए.

पिलखुआ के पोस्टरों में उनके नाम और चेहरे दिखने लगे और फिर एक दिन वह देश से ग़ायब हो गए.

ख़बरें आने लगीं कि वह पाकिस्तान चले गए हैं लेकिन उनका परिवार अभी भी पिलखुआ में ही था.

ज़रीना पुलिस पर उन्हें परेशान करने का आरोप लगाती हैं. उनका आरोप है कि पुलिस ने उनके घर का सारा सामान ज़ब्त कर लिया, उनके मकान के दरवाज़े तोड़ दिए, नल उखाड़ दिया.

ज़रीना के अनुसार उनके घर में कोई असलहा-बारूद नहीं था और लोहे के कचरे को पुलिस ने बम बनाने का सामान बताया. हालांकि ज़रीना यह भी कहती हैं कि उनके पति घर के बाहर क्या करते थे इस बारे में वह कुछ नहीं कह सकतीं.

वह कहती हैं, ''हमारा एक बच्चा बीमार था. एक बच्चे को पुलिस ने बंद कर दिया था. पुलिस वाले रोज़ परेशान करते थे. हमारा खाना-पीना मुश्किल हो गया था.''

इमेज कॉपीरइट AFP File

उस वक्त टुंडा के सबसे बड़े बेटे आरिफ़ की उम्र 20-22 साल की थी. पिलखुआ की तरह कराची में भी वह वेल्डिंग का काम करते हैं. वह बताते हैं कि जब उन्हें थाने में पूछताछ के लिए बुलाया जाता था तो उनकी मां परेशान होकर मदद के लिए इधर-उधर भागती थीं.

पुलिस टुंडा का पता पूछती थी लेकिन ज़रीना के अनुसार, किसी को इस बारे में पता नहीं था और पति के पाकिस्तान जाने के करीब डेढ़ साल बाद 1994-95 को टुंडा का परिवार भी पाकिस्तान की ओर निकल पड़ा.

किसी को बिना बताए परिवार पिलखुआ से दिल्ली पहुँचा, जहां बहुत मुश्किलों के बाद पाकिस्तान का वीज़ा मिला और फिर एक दिन समझौता एक्सप्रेस से सभी लाहौर की ओर रवाना हो गए.

आरिफ़ बताते हैं कि सभी लोग लाहौर में एक रिश्तेदार के पास एक दो दिन रुके, फिर कराची चले गए.

आरिफ़ कहते हैं, ''हम कराची में दूर के रिश्ते के मामू के पास रहे. उसके बाद हमने किराए का मकान ले लिया. शुरुआत में (टुंडा ने) कारपेंटरी का काम किया. फिर उन्होंने मदरसा चलाया. मैंने भी आते ही वेल्डिंग का काम शुरू कर दिया. (कराची में) नया सा माहौल था. फिर आदत पड़ गई. दिल्ली और कराची का एक जैसा माहौल लगता है. मौसम थोड़ा सा फ़र्क है.”

इमेज कॉपीरइट AFP FIle

पाकिस्तान में सैयद अब्दुल क़रीम कई बार पंजाब जाया करते थे. पाकिस्तानी पंजाब को चरमपंथ का गढ़ माना जाता है और 2013 में घर से जाने के तीन दिन बाद उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर आई.

ज़रीना कहती हैं, ''वो कहां जा रहे हैं, उन्होंने बीवियों को भी नहीं बताया, आसमां तक को नहीं. वह आसमां के पास रहते थे क्योंकि उसका बच्चा छोटा था. आसमां परेशान थी कि कहीं बताकर नहीं गए. उसने फ़ोन कर बताया. अब वह छोटी वाली, भाइयों के पास रह रही है.”

ज़रीना कहती हैं कि अब जब अदालत ने उनके पति को चार मामलों में बरी कर दिया है, तो उन्हें रिहा कर दिया जाना चाहिए.

आरिफ़ कहते हैं कि उनके पिता पर लगाए गए आरोप ग़लत हैं. उनका कहना है, अगर वह (टुंडा) यह (चरमपंथी) काम करते होते, तो वह यहां पर परेशानी की ज़िंदगी नहीं बिता रहे होते. उनके पास गाड़ियां होतीं, कोठियां होतीं, बंगले होते. 2010-11 में उन्होंने अपना मकान (कराची में) भी क़र्ज़ लेकर बनाया था. वह क़र्ज़ भी लौटाना है. वह बहुत टेंशन में थे कि घर के ख़र्चे पूरे नहीं होते थे.''

आरिफ़ के अनुसार, उनके पास पाकिस्तान में रहने के कोई आधिकारिक काग़ज़ नहीं हैं और उन्होंने इस बारे में कभी कुछ पता भी नहीं किया है.

(इस कहानी की अगली कड़ी गुरुवार को पढ़ें.)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार