'रात में अजनबी आहट से रूह काँपती...'

  • 17 मार्च 2016
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वो दृश्य मैं आज तक नहीं भूला हूँ. मेरे मुहल्ले के पुल पर कुछ जुनूनी लड़कों ने मेरे परिचित डाकिए से चिट्ठियों का पुलिंदा छीनकर उसे नदी में फेंक दिया. मैंने देखा तो लगा जैसे आकाश से परिंदे गिर रहे हों.

वे हिंदुस्तान की चिट्ठियाँ थीं. जो कुछ दूर तक पानी में तैरीं और फिर डूब गईं. उनमें ज़रूर मेरे नाम की भी कोई चिट्ठी रही होगी.

'पूजा करानी हो तो पुजारी को फ़ोन करते हैं'

उस घटना के बाद से मुझे पार से दिखने वाला नदी किनारे मंदिर के आंगन का चिनार किसी उदास पूर्वज सा लगता.

पेड़ों के झड़ रहे पत्ते मुझे उनके आँसू लगते. पहाड़ों की बर्फ़ क़फ़न की याद दिलाती. आकाश में बादलों से भय लगता.

नारों के कोलाहल और चारों तरफ़ पसरी मोटी ख़ामोशी दहशत से भरती जा रही थी. राह चलते अपनी परछाईं जासूस सी लगती. यह आतंक मेरे सौंदर्यबोध को बदल रहा था.

'दाढ़ी भी नहीं निकली थी, जिहादी बन गया था'

हालाँकि इस कठोर अनुभव के अनेक आयाम पहले से ही मेरी कविताओं में पूर्वाभास के स्तर पर आ चुके थे. हवा बदल चुकी थी.

हिंदी साहित्य सम्मेलन के दिनों की स्मृतियों के साथ जी रही पीढ़ी हम नए युवा रचनाकारों को नई ऊर्जा, नए भावबोध, नई उमंगों से भरे साहित्यकारों के रूप में देख रही थी. हमारी साहित्यिक गोष्ठियाँ ठप थीं.

वर्ष 1990 तक आते आते कश्मीर की हवा में घृणा और आतंक के बारूद की गंध भर गई थी.

बम धमाकों, अपहरणों, अफ़वाहों, धमकियों और चुन-चुनकर कश्मीरी पंडितों की हत्याओं से भावी अनिष्ट की दिशाएँ साफ़ दिख रही थीं. भय और आशंकाओं की उपत्यका में बदल रहा था कश्मीर.

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रात में गली मुहल्ले में किसी अजनबी आहट से रूह काँपती और दिन में अपनी ही परछाईं से ख़ौफ़. चीज़ों के अर्थ बदल चुके थे.

क़रीबी मित्रों, पड़ोसियों और परिचितों के साथ संबंधों का रूप-शिल्प, वाक्य-विन्यास चौंकाने की सीमा तक बदल रहे थे. वातावरण में संशय था.

अपनी ही ज़मीं पर गुमनामी झेलते कश्मीरी पंडित

मित्रताएँ संदिग्ध हो चली थीं. हवा में जो नारे गूँज रहे थे उनका निहितार्थ हमारे लिए साफ़ था.

हम यानी अल्पसंख्यक जो उनको मान्य नहीं थे. हम जिन्हें हेय और संदेह की नज़रों से देखा जाने लगा था. एक नागरिक और एक संवेदनशील हिंदी रचनाकार के नाते हमने अपनी अभिव्यक्ति पर घर से बाहर सेंसर लगाना बेहतर समझ लिया था.

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कश्मीरी और उर्दू लेखकों, कवियों, नाटककारों तथा बौद्धिकों में रेडियो कश्मीर, दूरदर्शन या कॉफ़ीहाउस की बैठकों में एक ठंडी चुप्पी छाने लगी थी. विभाजन की रेखा खिंच रही थी. नाम और धर्म से लेखक मन ही मन अभिहित होने लगे थे. हिंदी के गिने-चुने रचनाकार तो थे ही पहले से ही अन्य.

हिंदी में लिखने की वजह से.

हिंदी हमें देश की सबसे बड़ी मुख्यधारा से जोड़ती थी. अनुवाद की दृष्टि से हम उनके लिए किसी काम के ज़रूर थे- लेकिन पसंदीदा न थे.

कश्मीर में हिंदी साहित्य के वातावरण निर्माण में हमारे अग्रज साहित्यकारों की ऐतिहासिक भूमिका रही थी.

हिंदी को अभिव्यक्ति का माध्यम चुनने के पीछे सांप्रदायिक घुटन और भारत-विरोधी मानस का प्रतिकार ही काम कर रहा था.

वर्तमान वस्तु-सत्य का सघन पूर्वाभास मुझे विचलित किए हुए था– एक कवि के तौर पर और नागरिक के तौर पर भी. यथार्थ अपनी जटिलताएँ खोले जा रहा था, लड़ाकू मानसिकता के साथ.

तय था कि अब जड़ से उखाड़ दिए जाने की पूरी तैयारी है. समसामयिक जीवन-स्थितियाँ बदल चुकी थीं. हम जीते जी इतिहास हुए जा रहे थे.

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