'ज़्यादा पिटाई की तो कहा-हां, मैं बम बनाता हूँ'

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‘लश्कर चरमपंथी’ सैयद अब्दुल करीम उर्फ़ टुंडा भारत में धमाके करवाने के चार मामलों में बरी हुए, लेकिन उनके गृहनगर पिलखुआ में तनाव जैसी स्थिति है.

पिलखुआ में कई लोग नाराज़ हैं और पूछ रहे हैं कि क्या यह एक और मामला है जिसमें प्रशासन ने एक निर्दोष मुसलमान के ख़िलाफ़ ग़लत मामला बनाकर उन पर आतंकी का झूठा ठप्पा लगाया और उनके परिवार की ज़िंदगी ख़राब कर दी. हालांकि कोई भी इस बारे में खुलकर बात नहीं करना चाहता.

एक स्थानीय पत्रकार ने कहा, ''मुसलमान नौजवानों को लग रहा है कि उन्हें बहुत ज़्यादा दबाया जा रहा है और उनमें नाराज़गी है.'' उधर, पाकिस्तान में टुंडा का परिवार कह रहा है कि अब टुंडा को छोड़ दिया जाना चाहिए.

पहली कड़ीः टुंडा कैसे पहुँचे पिलखुआ से पाकिस्तान?

दिल्ली पुलिस ने टुंडा को चरमपंथी गुट लश्कर का बम एक्सपर्ट बताया था जिनका कथित तौर पर एक बहुत बड़ा गिरोह था, लेकिन अदालत ने टुंडा को एक के बाद एक चार मामलों में बरी कर दिया.

इससे पहले मालेगांव और मक्का मस्जिद धमाका जैसे केसों में मुसलमान लड़के गिरफ़्तार किए गए थे, पर बाद में बरी कर दिए गए.

टुंडा के वकील एमएस ख़ान के मुताबिक़, "पुलिस की सूची में टुंडा के ख़िलाफ़ पूरे भारत में 33 मामले हैं और दिल्ली में उनके ख़िलाफ़ 20-22 मामले थे, लेकिन टुंडा को मात्र चार मामलों में गिरफ़्तार किया गया था."

ख़ान के अनुसार, ताज़ा मामले में बरी होने के बावजूद टुंडा अभी जेल में ही रहेंगे क्योंकि दिल्ली के बाहर भी उनके खिलाफ़ कई मामले लंबित हैं.

उधर अगर आप टुंडा के परिवार से बात करें तो एक ऐसे शख्स की तस्वीर उभरती है जो कम बोलता था, अपने काम के बारे में बात नहीं करता था और जिनके परिवार को उनके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है.

पिलखुआ की संकरी गलियों, उनमें खेलते बच्चों के पास से गुज़रते हुए हम अशोक नगर कॉलोनी में टुंडा के घर पहुंचे.

छत से ज़मीन तक जुड़ी बाहरी दीवार पर सस्ता सा चूना लगा था. न कोई तख़्ती, न नाम. दीवार में एक आयताकार सूराख़ था, जहां दरवाज़ा बना था. घुसते ही दाएं, बाएं दो कमरे. थोड़ा आगे जाने पर दाहिने खुला सा बरामदा जबकि बाईं ओर ढकी हुई बैठक. साथ में लगा एक और कमरा.

इस छोटी सी जगह में दर्जन भर से ज़्यादा लोग रहते हैं.

टुंडा की साली ताहिरा ने बताया, ''पहले तो लोग हमें सलाम करने से भी डरते थे लेकिन 2013 में उनकी (टुंडा) की गिरफ़्तारी के बाद हालात ठीक हुए हैं.''

अदालती काग़ज़ों के अनुसार, एक गुप्त जानकारी के आधार पर 16 अगस्त को टुंडा को भारत-नेपाल सीमा से गिरफ़्तार किया गया लेकिन वो पाकिस्तान से भारत क्यों और कैसे आए, इनके जवाब नहीं मिलते.

परिवार के सदस्यों के मुताबिक़ उन्हें टुंडा की गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं पता कि वह कहां जाते थे, किससे मिलते थे.

उनके मुताबिक़ टुंडा कारपेंटर थे. ज़्यादा वक्त पिलखुआ से बाहर बिताते थे. टुंडा लखनऊ से होम्योपैथी की डिग्री लेकर आए थे और दुकान खोलने की बात करते थे.

1993 के आसपास पहले टुंडा और क़रीब एक-डेढ़ साल बाद उनके परिवार के भारत से ग़ायब होने के बाद पुलिस का शक़ टुंडा के भारत में बचे परिवार पर गया था.

टुंडा के साढ़ू महमूद आलम बताते हैं कि टुंडा के गायब होने के बाद स्थानीय पुलिस ने उन्हें थाने बुलाया और यातनाएं दीं.

महमूद आलम ने छह साल जेल में बिताए.

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बीते दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं, ''(पुलिस ने पूछा) तुम अब्दुल करीम के पास जाते हो? पुलिसवालों के साथ ज़्यादा बोलने से और पिटाई होती है. (उन्होंने) सादे कागज़ पर हस्ताक्षर करवाए, पिटाई की, कहा आप बम बनाते हो. जब (उन्होंने) ज़्यादा पिटाई की तो (मैंने) कहा कि हां, मैं बनाता हूं.”

इन आरोपों की सत्यता जांचना आसान नहीं.

टुंडा की साली ताहिरा भी पुलिस और इंटेलिजेंस के लोगों पर उन दिनों उन्हें परेशान करने का आरोप लगाती हैं.

वह बताती हैं कि 90 के दशक में उनका परिवार टुंडा के घर से थोड़ी दूर किराए पर रहता था, लेकिन जब टुंडा पर बम धमाकों में हिस्सा लेने के आरोप लगे तो उनके लिए मकान में रहना मुश्किल हो गया.

उन्हें कोई भी किराए का मकान देने को तैयार न था, इसलिए टुंडा के परिवार के पाकिस्तान जाने के बाद वो टुंडा के घर में चले आए.

ताहिरा कहती हैं, ''(हमारे पास) रहने को मकान नहीं था, मजबूरी में यहां रहे हैं. पुलिस हमें बहुत परेशान करती थी, रात के दो बजे-तीन बजे (घर में पुलिस आ जाती थी). बच्चे हमारे छोटे-छोटे थे, हम कहां जाते.''

ताहिरा को उम्मीद है कि जब टुंडा चार मामलों में बरी हो गए तो बाक़ी के मामलों में भी बरी हो जाएंगे.

पाकिस्तान के कराची में रहने वाली उनकी बहन और टुंडा की पत्नी ज़रीना से उनकी पिछले 20 साल में बात नहीं हुई.

टुंडा चार भाई थे. टुंडा सबसे बड़े थे. उनके छोटे भाई अब्दुल मलिक की मौत हो चुकी है. उनसे छोटे भाई अब्दुल हक़ दिल्ली में रहते हैं जबकि चौथे भाई इस मामले की शुरुआत से ही लापता हैं.

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2013 में पकड़े जाने के बाद अब्दुल हक़ टुंडा से जेल में मिल चुके हैं. उनके अनुसार, मुलाकात में टुंडा ने कहा कि उन पर लगाए गए मामले झूठे हैं.

धमाकों के मामले में अब्दुल हक़ भी छह साल जेल की सज़ा काट चुके हैं और वह गुज़रे दिनों पर बहुत बात नहीं करना चाहते.

वे कहते हैं, ''हम (टुंडा से) दुआ सलाम करने गए थे. स्पेशल सेल वालों ने बुलाया था कि तुम्हारा भाई मिलना चाहता है. वह (टुंडा) मुझसे कह रहे थे कि (उन पर) झूठे केस लगाए हैं. हमारे ऊपर भी मामले लगाए थे. वो कौन से सच्चे थे."

अब्दुल हक़ बताते हैं, "मैंने आरोपों के बारे में कभी नहीं पूछा. मेरे साथ जो गुज़री, मैं सब्र करके बैठ गया. मेरा उनसे बहुत मेलजोल नहीं था. उनसे दुआ-सलाम होती थी. जेल में मुश्किल से पांच मिनट बात होती है. आधी बात समझ में आती है, आधी समझ में नहीं आती.''

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वह कहते हैं कि अगर हमारी उनसे मुलाकात होती है तो हम उनसे ज़रूर पूछना चाहेंगे कि आख़िर उन्होंने ऐसा क्या किया जिससे पूरे परिवार पर इतनी मुसीबत आ गई.

परिवार की नाराज़गी मीडिया से भी है.

टुंडा के भांजे और महमूद आलम के बेटे आतिफ़ खान कहते हैं, ''मीडिया वालों ने छुरी को तलवार बना दिया. काटने की छुरी तो हर मुसलमान के घर में मिलेगी आपको.''

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