कश्मीरी पंडितों का वामपंथ से मोहभंग क्यों?

  • 18 मार्च 2016
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Image caption कश्मीरी पंडितों के छोड़े हुए घर

अस्सी का दशक आधा बीतते बीतते कश्मीरी लड़कों के सीमा पार जाकर वहां के ट्रेनिंग कैंपों में हथियार चलाने और फ़ौजी भितरघात सीखने की ख़बरें आने लगी थीं.

इसके बाद भारत के ख़िलाफ़, कम्युनिस्टों के ख़िलाफ़ और पंडितों के ख़िलाफ़ कट्टरवादी अभियान शुरू हो गया.

लेकिन राज्य और केंद्र की सरकारें ख़ामोश रहीं. पीएन जलाली और पीर गयासुद्दीन नाम के कम्युनिस्ट पत्रकारों ने इसके ख़िलाफ़ उदारवादी सोच रखने वालों को एकजुट करना शुरू किया.

राष्ट्रीय स्तर पर वामपंथी नेतृत्व को भी इन बदलावों के बारे में बताया गया, लेकिन इन सभी चिंताओं को नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

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कश्मीर में प्रगतिशील साहित्यिक और राजनीतिक आंदोलन को परवान चढ़ाने में पंडितों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. मेरे कई रिश्तेदार वामपंथी आंदोलन में सक्रिय थे. मैं ख़ुद वामपंथी विचारों से प्रभावित था.

साल 1978 से ही मैं और मेरे पंडित और मुसलमान दोस्त हर रविवार को देश-दुनिया के विषयों पर, साहित्य और मार्क्सवाद पर बातचीत किया करते थे. दोनों समुदाय के कॉमरेडों में कट्टरवाद और अलगाववाद की बढ़ती प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ एकमत हुआ करता था.

लेकिन फिर स्थितियां बदलने लगीं. मुझे याद है ट्रेड यूनियन नेता हृदय नाथ वांचू बटमालू में सोवियत संघ की किताबों की दुकान चलाते थे और नगरपालिका कर्मचारियों के बच्चों के लिए स्कूल चलाते थे.

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एक रविवार को कुछ नौजवानों ने हमसे विवाद शुरू कर दिया. ये सभी एक इस्लामी संगठन से जुड़े लोग थे. उनका इल्ज़ाम था कि वांचू समाज को बरबाद कर रहे हैं और नौजवानों को कम्युनिस्ट बना रहे हैं.

तेजबहादुर भान जम्मू कश्मीर सरकार में इंजीनियर थे और विचारों से वामपंथी थे. उन्होंने तीन उपन्यास लिखे थे. एक किताब में उन्होंने डार्विन के सिद्धांत का ज़िक्र किया था.

यह किताब बीस साल पहले छपी थी, पर जमाते इस्लामी ने हायतौबा मचानी शुरू की और सरकार पर भान के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए दबाव डालना शुरू किया.

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भान को सरकारी नौकरी से मुअत्तल कर दिया गया और उनके ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने इस मुद्दे पर संसद में हंगामा किया, जिसके बाद केस बंद कर दिया गया.

इन घटनाओं के बाद हमने रविवार को मिल-बैठ कर बात करना बंद कर दिया.

हमने बाहर निकलना भी कम कर दिया. दिसंबर 1989 में वामपंथी राजनीति करने वालों को सीधी धमकियां मिलनी शुरू हो गईं.

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इसी बीच भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अब्दुस सत्तार रंजूर की हत्या कर दी गई. हालात ख़राब होने पर कई लोग घाटी छोड़कर जम्मू चले गए. जो बचे रहे वो या तो ख़ामोश हो गए या उन्हें पुलिस सुरक्षा की ज़रूरत पड़ गई.

इसके बावजूद देश में वामपंथी पार्टियों का नेतृत्व अलगाववादी आंदोलन के कारण पैदा हुए इस ख़तरे को भांपने में नाकाम रहा. इसके सांप्रदायिक पक्ष पर भी ध्यान नहीं दिया गया.

हरकिशन सिंह सुरजीत जैसे कम्युनिस्ट नेताओं ने ओएन त्रिसाल और ऋषि देव जैसे पार्टी समर्थकों से कह दिया कि पंडितों का समर्थन नहीं किया जा सकता क्योंकि वे बीजेपी का समर्थन करते हैं.

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इसके बाद त्रिसाल आदि कश्मीरी पंडितों ने दिल्ली आकर अलगाववाद के ख़िलाफ़ पर्चे छापने शुरू किए.

कश्मीरी पंडितों का वामपंथी आंदोलन से पूरा मोहभंग हो चुका था.

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