मुल्ला दो प्याज़ा का मुर्ग़ दो प्याज़ा

इमेज कॉपीरइट THINKSTOCK
(अलग-अलग डिशों पर यह बीबीसी की विशेष श्रंखला की पहली कड़ी है जो पांच दिनों तक चलेगी)

मुल्ला दो प्याज़ा विवादों में रहने के बावजूद एक दिलचस्प किरदार रहे हैं.

खाने के इतिहास के बारे में पता लगाने की मेरी रुचि के कारण मैंने मुल्ला दो प्याज़ा से जुड़े पकवानों का पता लगाने की कोशिश की.

इतिहास के पन्ने बताते हैं कि उनका असल नाम अब्दुल हसन था और वह सम्राट अकबर के दरबार के नवरत्नों में एक थे.

स्कूल मास्टर के बेटे अब्दुल हसन अपना अधिकांश समय किताबें पढ़ने में गुजारते थे. उन्हें साधारण जीवन मंज़ूर न था और उनका सपना था कि वह अकबर के दरबारियों में शामिल हों.

इसी कोशिश में कई महीने की मशक्कत के बाद वह किसी तरह शाही परिवार के मुर्ग़ीखाना के प्रभारी बन गए. पढ़े-लिखे होने के कारण मुल्ला इससे बेहद निराश थे, पर उन्होंने धैर्य न खोया और मेहनत करते रहे.

एक महीने बाद जब मुर्ग़ीखाने का लेखा-जोखा अकबर के सामने पेश हुआ तो वह ख़र्च में आई भारी गिरावट से हैरान रह गए.

उन्होंने फ़ौरन मुर्ग़ीखाना के प्रभारी मुल्ला दो प्याज़ा को तलब किया. मुल्ला ने बताया कि मुर्ग़ियों को शाही रसोई से बचे-खुचा खाना और अनाज दिया जाता है और इससे काफ़ी बचत हुई है.

अकबर मुल्ला से प्रभावित हुए और उन्हें शाही पुस्तकालय का प्रभारी बना दिया. हालाँकि मुल्ला इससे भी बहुत खुश नहीं थे, पर उन्होंने धीरज बनाए रखा.

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

एक साल गुज़रा और जब अकबर पुस्तकालय गए तो देखकर बेहद खुश हुए कि हर किताब ज़री और मखमल से लिपटी थी.

अकबर ने ख़र्च के बारे में दरयाफ़्त की तो जानकर हैरान रह गए कि बिना किसी अतिरिक्त ख़र्च के यह सब हुआ है. अकबर को फिर उलझन हुई और उन्होंने फिर मुल्ला को बुलवा भेजा.

मुल्ला ने बताया कि उन्होंने उस मखमल और ज़री का इस्तेमाल किया जिसमें जनता फ़रियाद लेकर दरबार में आती थी. वह उन्हें दीवान-ए-आम के पीछे से ले आते और किताबों की जिल्द बनाने को शाही दर्जी को दे देते थे.

अकबर इस क़दर प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें शाही दरबार में जगह दे दी. मुल्ला का सपना हक़ीक़त में बदल गया.

मुल्ला के निधन के बाद उन्हें भोपाल के पास हंडिया में दफ़नाया गया. दुर्भाग्यवश इस बारे में कोई लिखित दस्तावेज़ नहीं है.

मुल्ला का ज़िक्र मिरात-उल-मुज़किन (अलनामा) में मिलता है. उनका छायाचित्र लंदन स्थित जॉनसन ऑफ़िस में देखा जा सकता है.

पर यह सवाल अब तक बरक़रार है कि मुर्ग़ दो प्याज़ा जैसी डिश उनके नाम से क्यों जुड़ी.

कहते हैं कि मुल्ला इस डिश के दीवाने थे और जो भी उन्हें आमंत्रित करता, वे मुर्ग़ दो प्याज़ा की मांग करते थे.

ऐसे बनता है मुर्ग़ दो प्याज़ा
इमेज कॉपीरइट Thinkstock

चिकन को साफ़ करके आठ टुकड़ों में काट लें. अदरक और लहसुन का पेस्ट बनाएं.

दही और नमक के साथ मिलाएं. अच्छी तरह मिलाने के बाद चिकन के टुकड़ों को क़रीब एक घंटे तक छोड़ दें.

इसके बाद प्याज़ काटें, आधा प्याज़ पीसें और एक तरफ़ रख दें. भारी तले के बर्तन में घी गर्म करें. कटा हुआ प्याज़ सुनहरा भूरा और कुरकुरे होने तक तलें.

इस प्याज़ को निकालकर एकतरफ़ रखें. बचे हुए घी में लौंग, दालचीनी और इलायची डाल दें. इसमें प्याज़ डालें और इसे हल्का भूरा होने तक तलें.

लाल मिर्च, काली मिर्च और धनिया पाउडर मिलाएं. कुछ देर चलाएं और फिर इसमें मसालायुक्त चिकन डाल दें.

इमेज कॉपीरइट Thinkstock

अच्छी तरह मिलाएं और फिर ढक दें. पानी सूखने तक इसे धीमी आंच पर पकने दें.

ढक्कन हटाएं और चिकन को तब तक फ्राई करें जब तक कि चिकन भूरा न हो जाए. जब यह बर्तन की तली से चिपकने लगे, तो थोड़ा पानी डालें और किनारों पर चिपका मसाला छुड़ा लें.

अब तीन चौथाई भूरा कुरकुरा प्याज़ मिला दें. थोड़ा पानी मिलाएं, पर ध्यान रखें कि ग्रेवी पतली न हो.

तब तक पकाएं जब तक चिकन बन न जाए. जायफल पाउडर मिलाएं. बचे भूरे कुरकुरे प्याज़ के साथ परोसें.

रूमाली रोटी के साथ इसका स्वाद लाजवाब होता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉयड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार