असमः क्या बीजेपी को मिलेगा बरुआ का साथ?

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एक समय तक था जब अलगाववादी समूह उल्फ़ा तय करती थी कि असम में चुनाव कौन जीतेगा. उल्फ़ा जिसका समर्थन करती थी, वही पार्टी चुनाव जीतती थी.

1996 में कांग्रेस चुनाव इसलिए हार गई क्योंकि परेश बरुआ ने असम गण परिषद का समर्थन किया था. क्योंकि परिषद ने असम की अस्मिता के जुड़े मुद्दे को उठाने का वादा किया था.

लेकिन प्रफुल्ल महंता सत्ता में आते ही अपना वादा भूल बैठे. इससे नाराज़ बरुआ ने असम गण परिषद के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया.

उल्फ़ा ने महंता के नंबर दो नेता नागेन सर्मा की हत्या कर दी और दूसरे कैबिनेट मंत्री ज्योनाथ सर्मा पर भी जानलेवा हमला किया था.

असम गण परिषद बीजेपी से गठबंधन के बावजूद 2001 का चुनाव हार गई क्योंकि उसके कार्यकर्ता चुनाव प्रचार में उल्फ़ा प्रायोजित हिंसा के सामने मुश्किल से नज़र आए.

लेकिन कांग्रेस पार्टी पिछले तीन बार से सत्ता में लौट रही है. इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि उसने उल्फ़ा की समस्या का हल पड़ोसी बांग्लादेश के साथ मिलकर निकालने का काम किया है.

यहां परेश बरुआ अब उस बाघ की तरह हो गए हैं जिनके बेहद कम दांत बचे हैं जो काटने की तुलना में ज़्यादा दहाड़ने लगा है.

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उनके ज़्यादातर साथी उनका साथ छोड़ चुके हैं क्योंकि बांग्लादेश ने उन्हें भारत के हवाले कर दिया है. इसके बाद ही बरुआ ने भारत से बातचीत शुरू की है.

परेश बरुआ बांग्लादेश में वांछित व्यक्ति हैं और मौजूदा सरकार उन्हें बांग्लादेश लाना चाहती है.

उन्हें 2004 में चिट्टगांव में दस ट्रकों में हथियार पकड़े जाने के एक मामले में मौत की सज़ा सुनाई जा चुकी है. बरुआ ने अब तक इस फ़ैसले को चुनौती नहीं दी है.

उन पर मौत की सज़ा भी लागू है. अगर वे बांग्लादेश में गिरफ़्तार होते हैं तो उन्हें 72 घंटों के अंदर फांसी दी जा सकती है.

हालंकि दो पूर्व मंत्री मोतिउर रहमान निज़ामी और लुत्फुर ज़मां बाबर और ख़ुफ़िया एजेंसियों के दो प्रमुख रेज़ाकुल हैदर चौधरी और अब्दुर रहीम उनकी मौत की सज़ा के ख़िलाफ़ अपील कर चुके हैं.

परेश बरुआ अपनी ज़िंदगी को ख़तरे में डाले बिना बांग्लादेश में प्रवेश नहीं कर सकते. बांग्लादेश की ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस बात की भी चिंता है कि सिलहट स्थित बिबियाना गैस क्षेत्र और दूसरे व्यावसायिक और आर्थिक क्षेत्रों पर भी हमले हो सकते हैं.

बांग्लादेशी एजेंसियों ने बरुआ के दो बांग्लादेशी बॉडीगॉर्ड्स को ट्रैप करने की योजना बनाई. ये बॉडीगार्ड्स चीन और बर्मा के सीमावर्ती इलाक़े के टेंगचाँग में स्थित बरुआ के ठिकाने से ईद के मौक़े पर बांग्लादेश अपने घर आने वाले थे.

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बांग्लादेशी ख़ुफ़िया एजेंसी के दो वरिष्ठ अधिकारियों ने हाल ही में बताया कि उनके एजेंटों ने उल्फ़ा के अलगाववादी नेता परेश बरुआ के दो बॉडीगॉर्ड और रसोइए को ट्रैक किया.

ये दोनों युवा नोआखाली इलाक़े के हैं. इसमें से एक हस्साम अहमद का बेटा आलमगीर हुसैन हैं. उनके बांग्लादेशी पासपोर्ट के मुताबिक़ हुसैन की जन्मतिथि 2 जनवरी, 1986 है.

दूसरा युवा है, हुसैन के चचेरा भाई ग़ुलाम नबी. इन बांग्लादेशी पासपोर्ट का नंबर है- एए1463448. इस पासपोर्ट के मुताबिक़ नबी की जन्मतिथि 15 फ़रवरी, 1986 है. ये दोनों इस्लामी छात्रक शिबिर के सदस्य हैं.

यह संगठन जमात-ए-इस्लामी का छात्र-युवा विंग है.

जमात-ए-इस्लामी को बांग्लादेश में नफ़रत की निगाह से देखा जाता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि इसने देश की स्वतंत्रता का विरोध किया था और यह 1971 के आज़ादी के संघर्ष में पाकिस्तानी सेना के साथ थी.

अधिकारियों ने इस बात का संकेत दिया है कि आलमगीर और नबी का इस्तेमाल बरुआ की हत्या के लिए किया जा सकता है या फिर बांग्लादेश स्थित शेरपुर इलाक़े में अपने बेस को खड़ा करने के लिए बरुआ को बांग्लादेश लाने के लिए किया जा सकता है. इस बेस को बांग्लादेश को रैपिड एक्शन बटालियन ने नष्ट किया था.

पिछले महीने बड़े पैमाने पर हथियारों की बरामदगी हुई है. इसमें एंटी क्राफ्ट मिसाइलें भी शामिल थीं. बरुआ ने ये हथियार अपने लड़ाकों के लिए भेजे थे और उन्हें उम्मीद थी कि ढाका में सत्ता परिवर्तन के समय वे इसका इस्तेमाल कर पाएंगे.

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उधर बांग्लादेशी एजेंसी ने आलमगीर और नबी के परिवार के सदस्यों को बंधक बनाकर उन दोनों पर ये दबाव डालने की कोशिश की है कि या तो सीधे बरुआ की हत्या कर दो या फिर खाने में ज़हर दे दो.

लेकिन जैसे ही इस अभियान को लेकर हाई अलर्ट घोषित किया गया, वैसे ही मीडिया रिपोर्ट्स आने लगी कि श्री श्री रविशंकर भारत सरकार और परेश बरुआ के बीच मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं.

हालांकि ये कोशिश कामयाब नहीं हुई और बरुआ ने कहा कि श्री श्री रविशंकर जो शर्तें रख रहे हैं वह उन्हें स्वीकार नहीं.

वैसे इसका समय ऐसा था कि बांग्लादेश को लगा कि दिल्ली सरकार अलगाववादी नेता से बातचीत करना चाहती हैं. ऐसे में बांग्लादेशी एजेंसियों को अपना अभियान रोकने को कहा गया.

अनौपचारिक तौर पर ये संकेत दिए गए कि असम में अप्रैल में चुनाव होने हैं इसलिए भारत उल्फ़ा नेताओं के साथ राजनीतिक बातचीत के लिए इच्छुक है.

इसके बाद ढाका ने ऑपरेशन बरुआ रोक दिया. इस दौरान भारतीय नेतृत्व में भी भ्रम की स्थिति नज़र आई.

एक ओर तो मोदी प्रशासन में कट्टर राष्ट्रीयता वाला समूह है. इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी शामिल हैं जो बरुआ पर आक्रमण चाहते हैं.

वहीं दूसरी ओर असम में चुनाव अभियान में शामिल रहे लोगों का दूसरा तबक़ा है जो परेश बरुआ का साथ चाहता है ताकि उनके समर्थन से पार्टी को कुछ सीटें मिल सके.

असम में चुनाव जीतने के लिए बीजेपी काफ़ी पैसा भी ख़र्च कर रही है. बरुआ ऐसी स्थिति का हमेशा फ़ायदा उठाते रहे हैं, ख़ासकर तब जब उनके बंदूक़ों का कारोबार और असम में उगाही का धंधा मंदा चल रहा है.

असम में बीजेपी के मुख्यमंत्री का चेहरा सर्बानंद सोनोवाल हैं. आईएमडीटी एक्ट को हटाने के लिए क़ानूनी लड़ाई जीतने के बाद उनकी छवि राष्ट्रीय हीरो जैसी है. इनके अलावा बीजेपी के पास पूर्व कांग्रेसी मंत्री हेमंत बिस्वा सर्मा के तौर पर चुनाव प्रबंधक भी हैं. उनके परिवार में एक दूर के रिश्ते का भाई परेश बरुआ का नज़दीकी है.

इतना ही नहीं बीजेपी की ओर से ही श्री श्री रविशंकर ने बरुआ के साथ बातचीत शुरू की थी, वो चुनाव से पहले हालांकि वह कामयाब नहीं हुई.

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लेकिन इसके चलते ढाका की सरकार कनफ़्यूज ज़रूर हो गई. हालांकि बांग्लादेशी एजेंसियों के लिए ऑपरेशन बरुआ को फिर से शुरू कर पाना संभव नहीं होगा. आलमगीर और नबी के परिवार वालों ने अपने बेटों को अलर्ट कर दिया होगा.

बरुआ को पंद्रह या उससे ज़्यादा बार जीवन मिला है. असम की क्रांति के इस गोलकीपर की लड़ाई अभी बाक़ी है.

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