टेसू खिले, महका महुआ, तो आया भगोरिया

  • 23 मार्च 2016
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Image caption युवतियां सज धज कर भगोरिया हाट जाती हैं और गहने, चूड़ियाँ और शृगार का सामान खरीदती हैं.

जंगल में जब टेसू के फूल खिलने लगते हैं, महुआ महकने लगता है और ताड़ से रस टपकने लगता है तब आता है भगोरिया का उत्सव.

मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल के धार, झाबुआ और अलीराजपुर ज़िलों में होलिका दहन के ठीक एक दिन पहले तक चलने वाला आदिवासियों का यह पर्व आजकल अपने पूरे ख़ुमार पर है.

भगोरिया निमाड़ में बसने वाले भील, भिलाला, पाटलिया और राठिया आदिवासियों का मेला है, जो हर गाँव के हाट में बारी-बारी से लगाया जाता है.

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सुनार चाँदी के गहने लेकर हाट में अपनी दुकान सजाते हैं.

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भगोरिया उत्सव देखने विदेशी भी आते हैं.

चांदी के ये खूबसूरत गहने जितने भारी होते हैं, उतने ही महंगे भी.

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आदिवासी महिलाएं रोज़ सुबह ताड़ी बेचने मंडी जाती हैं. सिर पर मटकी रखने के लिए वे खूबसूरत 'चुमली' का इस्तेमाल करती हैं.

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खूबसूरत कढ़ाई किए हुए ये झोले इसी तरह के ख़ास मौकों के लिए बुने जाते हैं.

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युवा आदिवासी लड़के भी खूब सज-धज कर मेले में पहुँचते हैं.

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आदिवासी स्त्रियां सुबह महुआ के फूल चुनती हैं. इससे शराब बनाई जाती है.

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ताड़ के पेड़ से निकलने वाले रस से ताड़ी बनायी जाती है, जिसे आदिवासी पेय के रूप में पसंद करते हैं.

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सुर्ख और चटक रंगों में भिलोंडी लहंगे और ओढ़नियां पहने सिर से पाँव तक चांदी के गहनों से सजी-धजी आदिवासी स्त्रियां.

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