दो दोस्त, 4000 किताबें और 10,000 किमी का सफ़र

  • 24 मार्च 2016

अमूमन सफ़र के दौरान हम आप कितनी किताबें लेकर निकलते हैं? आपका रिकॉर्ड चाहे जो हो, लेकिन आप शताब्दी मिश्रा और अक्षय रावतारे को इस मामले में पीछे नहीं छोड़ सकते.

शताब्दी मिश्रा और अक्षय रावतारे इन दिनों अपनी मिनी वैन में 10 हज़ार किलोमीटर की यात्रा पर निकले हुए हैं. इस सफ़र में उनके साथ चार हज़ार किताबें हैं.

इसकी एक वजह है. दरअसल दोनों एक मिशन पर हैं. उनका उद्देश्य शहरों, कस्बों और गांवों में किताब पढ़ने को प्रमोट करना है. उनके मुताबिक ज़्यादा से ज्यादा भारतीयों को किताबें पढ़ने की जरूरत है.

दोनों दोस्तों ने अपनी यात्रा की शुरुआत दिसंबर 2015 में पूर्वोत्तर भारत के भुवनेश्वर से की थी. बीबीसी की टीम ने इन दोनों से उत्तर प्रदेश में मुलाकात की.

शताब्दी मिश्रा और अक्षय रावतारे की जोड़ी का 16वां पड़ाव बना है उत्तर प्रदेश.

दोनों ने अपनी यात्रा को थकान से भरा हुआ बताया लेकिन कहा, ''हम अपने लक्ष्य को हासिल करने में कायमाब रहे.''

अपनी यात्रा के दौरान दोनों सैकड़ों लोगों से मिले. इनमें लेखक, पुस्तक प्रेमियों से लेकर पहली बार किताब ख़रीदने वाले लोग शामिल थे.

शताब्दी मिश्रा ने बताया, ''हमने अब तक 2000 किताबें बेची हैं. हम बड़े शहरों में अपने किताबों का स्टॉक पूरा कर लेते हैं.''

लेकिन किताबें बेचना पहली प्राथमिकता नहीं थी. उन्होंने किताबें उधार भी दीं हैं.

उनकी पहली प्राथमिकता लोगों को पढ़ने की अहमियत के बारे में बताना था और पढ़ने के लिए प्रेरित करना था.

रावतारे कहते हैं, ''हम देख रहे हैं कि हमारे आसपास कितना कुछ हो रहा है, असहिष्णुता की बात हो रही है. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि लोग पढ़ते नहीं हैं. किताबें पढ़ने से दिमाग खुलता है और आप दूसरे विचारों की भी प्रशंसा कर पाते हैं.''

रावतारे एक स्कूली शिक्षक का जिक्र करते हैं, ''बीस साल से शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने केवल 15-20 किताबें पढ़ीं थीं, वो भी केवल अपने पाठ्यक्रम की.''

उन्होंने आगे कहा, ''ज़ाहिर है, ये एक समस्या है. शिक्षकों को अपने छात्रों के लिए ज़्यादा पढ़ना चाहिए, अपने विषय से अलग भी पढ़ना चाहिए. हमें शॉपिंग मॉल से ज़्यादा पुस्तकालयों की जरूरत है, लेकिन हो उल्टा रहा है.''

शताब्दी मिश्रा के मुताबिक किताबें महंगी हो चुकी हैं और किताबों की दुकानें तेज़ी से बंद हो रही हैं.

शताब्दी मिश्रा कहती हैं, ''छोटे शहरों में स्थिति और भी गंभीर है. कई जगहों पर तो एक भी पुस्तकालय नहीं मिला. ऐसा नहीं है कि लोग पढ़ना नहीं चाहते, लेकिन कई लोगों के लिए किताबें ही उपलब्ध नहीं हैं.''

रावतारे और मिश्रा इस स्थिति में बदलाव चाहते हैं. लोगों को पढ़ने के लिए प्रोतासाहित करने के अलावा ये दोनों भुवनेश्वर में किताब की एक दुकान भी चलाते हैं.

शताब्दी कहती हैं, ''हम पूरे साल 20 से 30 फ़ीसदी की छूट देते हैं क्योंकि हमारा स्टोर साधारण है और हमारा खर्चा ज़्यादा नहीं है. ना तो एयर कंडीशनर है और ना ही बिजली. हम सोलर पावर इस्तेमाल करते हैं. हम लोगों को वो जगह भी मुहैया कराते हैं जहां वे पूरे दिन बैठकर पढ़ सकते हैं, वो भी मुफ़्त.''

उनकी मिनी वैन अंग्रेजी और दूसरी अन्य भाषाओं की किताबों से भरी हुई है. रावतारे बताते हैं, ''मुझे लगता है कि लोग अपनी भाषा की किताबें पढ़ना चाहते हैं. मुझे उम्मीद है कि क्षेत्रीय भाषा में लिखने वाले लेखकों की आमदनी बढ़ेगी और तस्वीर बेहतर होगी.''

इससे पहले वे 2014 में ओडिशा में भी इसी तरह की यात्रा कर चुके हैं और उस वक्त वे लोगों से मिली प्रतिक्रियाओं से चकित रह गए थे.

शताब्दी कहती हैं, ''इस यात्रा की तरह ही, ओडिशा में भी पहली बार पुस्तक ख़रीदने वाले आए. हम कम दाम की किताबें रखते हैं. कोई किताब 200 रूपये से ज़्यादा की नहीं थी.''

शताब्दी ये भी बताती हैं कि वे ओडिशा के आदिवासी इलाकों में बसों में और रेलवे स्टेशनों पर लोगों को किताब बेचते हैं. रावतारे बताते हैं, ''छोटे शहरों में लोग बड़ी दुकानों में जाने से डरते हैं.''

रावतारे के मुताबिक बेहतर समाज बनाने के लिए किताबों को दूर दराज के हिस्से में पहुंचाने की जरूरत है.

वे बताते हैं, ''एक देश के तौर पर हम जिस दुनिया में रहते हैं उसके बारे में ज़्यादा जानने की जरूरत है. यह केवल पढ़ने से संभव होगा. इन दिनों हम अजीब स्थिति का सामना कर रहे हैं."

रावतारे कहते हैं, "अमीर लोग ग़रीबों के बारे में लिख रहे हैं. लेकिन गरीब लोग उनके काम को पढ़ नहीं पाते हैं. इस स्थिति को बदलने की ये हमारी छोटी कोशिश है. हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को किताबें उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं.''

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