बाघों के संरक्षित क्षेत्र में बन रही हवाई पट्टी

बस्तर इमेज कॉपीरइट alok putul

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित बस्तर के इंद्रावती टाइगर रिज़र्व के भीतर हवाई पट्टी बनाने को केंद्र सरकार की मंज़ूरी मिल गई है.

किसी टाइगर रिज़र्व में हवाई पट्टी की मंज़ूरी का यह पहला मामला है.

वन विभाग का कहना है कि पट्टी का इस्तेमाल माओवादियों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे ऑपरेशन में किया जाएगा.

पिछले दिनों राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड की 37वीं बैठक में इंद्रावती टाइगर रिज़र्व के बफ़र क्षेत्र में इस हवाई पट्टी के निर्माण को मंज़ूरी दी गई.

39.604 हेक्टेयर क्षेत्र में बनने वाली इस हवाई पट्टी के लिये ऐसे वक़्त में मंज़ूरी मिली है, जब राज्य बनने के बाद पहली बार पिछले महीने ही वन विभाग के कैमरा ट्रैप में इस इलाक़े में बाघ की तस्वीर क़ैद की गई है.

इमेज कॉपीरइट Alok Putul

वहीं मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सरकार इस हवाई पट्टी का निर्माण बस्तर में वायु सेना के हमलों के लिए कर सकती है. इन संगठनों का कहना है कि ऐसा होने पर लाखों निर्दोष आदिवासी मारे जाएंगे.

बस्तर में पिछले कई सालों से माओवादी आंदोलन के कारण सुरक्षा बलों और माओवादियों के बीच ख़ूनी संघर्ष जारी है.

भारत में औसतन प्रति एक लाख लोगों की सुरक्षा के लिए पुलिस की संख्या 139 के आसपास है लेकिन बस्तर के सात ज़िलों में यह आंकड़ा 1774 से भी अधिक है.

आंकड़ों में देखें तो वर्ल्ड बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार अफ़ग़ानिस्तान में चल रहे युद्ध के दौरान 2011 में वहां 73 लोगों पर एक जवान की तैनाती थी लेकिन बस्तर में 56 लोगों पर सुरक्षा बल के एक जवान की मौजूदगी है.

अब हवाई पट्टी के निर्माण को मंज़ूरी के बाद इस संख्या के और अधिक बढ़ने की उम्मीद की जा रही है.

इमेज कॉपीरइट Alok Putul

राज्य के प्रधान वन संरक्षक (वन्य प्राणी) बी एन द्विवेदी कहते हैं, “इस हवाई पट्टी का एकमात्र उद्देश्य है सुरक्षाबलों को अधिक से अधिक मदद पहुंचाना. पट्टी बनाए जाने की स्थिति में सुरक्षाबल के जवानों को समय पर सभी तरह की मदद मिल पाएगी.”

लेकिन मानवाधिकार संगठन पीयूसीएल की छत्तीसगढ़ इकाई के अध्यक्ष डॉक्टर लाखन सिंह का मानना है कि यह महज़ सुरक्षाबलों को मदद पहुंचाने भर का मामला नहीं है.

डॉक्टर लाखन सिंह कहते हैं, “यह बात तो तय है कि यह हवाई पट्टी बस्तर के आम लोगों के लिए नहीं है. लेकिन पिछले कुछ सालों में जिस तेज़ी से अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां इस इलाक़े में तैनात की गई हैं और सेना द्वारा हेलिकॉप्टरों से हमलों का पूर्वाभ्यास किया गया है, उससे साफ़ है कि इस पट्टी का इस्तेमाल हवाई हमले के लिए ही किया जाएगा.”

इमेज कॉपीरइट CG Khabar

लाखन सिंह का कहना है कि दुनिया भर के अनुभव बताते हैं कि इस तरह के हमलों में सर्वाधिक ग़रीब और मज़बूर लोग मारे जाते हैं. बस्तर की यह हवाई पट्टी लाखों निर्दोष आदिवासियों के लिये जानलेवा साबित हो सकती है.

हालांकि पुलिस के एक आला अधिकारी का तर्क है कि अपने ही लोगों के ख़िलाफ़ हवाई हमला करने की इजाज़त भारतीय क़ानून नहीं देता. इसलिए इस तरह की आशंकाएं निर्मूल हैं.

दूसरी ओर नेशनल टाइगर कंज़र्वेशन अथॉरिटी के पूर्व सचिव और इन दिनों वर्ल्ड टाइगर फ़ोरम के महासचिव पद की कमान संभाल रहे डॉक्टर राजेश गोपाल का कहना है कि पूरे मामले के अध्ययन के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है.

इमेज कॉपीरइट Alok Putul

डॉक्टर राजेश गोपाल कहते हैं, “इस तरह की गतिविधियों से वन्य जीवन तो प्रभावित होता ही है लेकिन जिस तरह की स्थितियां बस्तर में हैं, वहां सरकार के इस तरह के फ़ैसले की ज़रुरत पर भी हमें गंभीरता से विचार करना होगा.”

लेकिन राज्य और केंद्र सरकार के हवाई पट्टी बनाने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ सामाजिक संगठन लामबंद हो सकते हैं.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला का कहना है कि वन्यजीव और जंगल की अनदेखी कर के इस तरह टाइगर रिज़र्व के भीतर हवाई पट्टी बनाने का सरकारी फ़ैसला क़ानून के ख़िलाफ़ है.

शुक्ला कहते हैं, “हम जल, जंगल और ज़मीन की लड़ाई लड़ रहे हैं और हवाई पट्टी बनाए जाने के निर्णय को भी हम सड़क से लेकर ऊपरी अदालतों तक चुनौती देंगे.”

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार