'यहाँ पिट जाएं, मर जाएं, पर बोर नहीं होंगे'

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जब वर्ल्ड टी20 भी एक दिन ख़त्म हो जाएगा फिर हम लोग क्या करेंगे?

क्या देखेंगे, कब देखेंगे, किस पर गरजेंगे, बरसेंगे. किसे कौन सा दोष देंगे, कैसे दूसरे का खून जलाएंगे और अपना बढ़ाएंगे?

किसे देवता बनाएंगे और फिर इसी देवता को राक्षस की तरह ढहाएंगे.

आजकल घर और दफ़्तर में उपलब्ध इस अय्याशी को कैसे पकड़कर रखेंगे कि अब तो जो भी काम होगा, वह टी20 के बाद ही होगा.

ज़रा सोचिए कि टी20 फ़ाइनल के बाद जीवन में क्या बचेगा, जब कोई पेपर या न्यूज़ चैनल ये नहीं बताएगा कि आज किसका किससे अडंगा पड़ने वाला है.

और फिर अचानक आपको याद आएगा कि अरे मैं भी कितना बुद्धू हूं, टी20 तो कबहूं का खिल खिला, बंट बंटा ख़त्म हो चुका है.

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फिर मन कुछ देर के लिए कड़वा कड़वा सा हो जाएगा, बिलकुल उन खुश्क होठों की तरह, जिनसे जबर्दस्ती सिगरेट छुड़ा दिया जाए या उस मुंह की तरह जो चूने कत्थे के आनंद से महरूम कर दिया जाए.

मगर अय मेरे दिल...काहे इतना परेशान होता है? एक वर्ल्ड टी20 ख़त्म होने से संसार अंधेरा थोड़े ही हो जाता है.

याद नहीं है, इस टी20 से पहले भी अपुन का लाइफ़ कितना रंगीन हुआ करता था. एक तरफ जेएनयू का थिएटर चल रहा था, दूसरी तरफ गौरक्षा का टेंशनी मेला था.

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पठानकोट की तो टिकट ही नहीं मिल रही थी. बीच में भारत माता की जय वाला विवाद भी तो उठा था, जिसे वर्ल्ड टी20 के प्रेशर ने बगल में दाब लिया.

तू बिलकुल चिंता ना कर दोस्त, अभी तो देख टी20 ख़त्म होते ही पाकिस्तान में जो भारतीय जासूस पकड़ा गया, उसकी कैसी पिक्चर बनती है.

सलाउद्दीन ओवैसी और जावेद अख़्तर का दंगल अभी ख़त्म थोड़े ही हुआ है, शुरू हुआ है...

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31 मार्च को मोदी जी भी न्यूयार्क में होंगे और नवाज़ शरीफ़ भी, दोनों को इस बार एक दूसरे से मिलने में कद्दू इंटरेस्ट नहीं, क्योंकि सब ध्यान तो टी20 के सेमीफ़ाइनलों पर टिका होगा. इनकी सेल्फियां कौन देखेगा?

मगर ये भारत-पाकिस्तान है मेरे दोस्त..यहां आदमी मर सकता है, लुट सकता है, पिट सकता है मगर बोर कभी नहीं हो सकता है. विद और विदाउट टी20, शो हर हाल में चलता रहेगा.

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