गंगा में डुबकी लगाते थे, अब चलकर पार करते हैं!

पश्चिम बंगाल में गंगा के तट पर बने विशाल बिजलीघर के इंजीनियरों में 11 मार्च को घबराहट फैल गई.

बिजलीघर का संयंत्र नदी से जोड़ने वाली नहर में जलस्तर तेज़ी से गिर रहा था. कोयले से चलने वाले इस बिजलीघर में भाप बनाने और उपकरणों को ठंडा रखने के लिए पानी का इस्तेमाल होता है.

अगले दिन पानी की कमी से 2,300 मेगावाट के इस बिजलीघर में उत्पादन रोक दिया गया.

नदी तट पर बसी कॉलोनियों में रहने वाले बिजलीघर के कर्मचारियों के लिए पानी की किल्लत हो गई.

लोगों को हज़ारों बोतल पानी मुहैया कराया गया. दमकलें नदी में लगाई गईं ताकि खाना पकाने और सफ़ाई के लिए पानी का इंतज़ाम किया जा सके.

बिजलीघर दस दिन के लिए बंद कर दिया गया. नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) के 30 साल के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था. यह सरकारी कंपनी पूरे दश में 41 ताप बिजलीघर चलाती है.

संयंत्र के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बीबीसी से कहा, "इसके पहले हमने कभी भी पानी की कमी से संयंत्र बंद नहीं किया था. अधिकारियों ने हमें बताया कि नदी में जलस्तर गिर गया है और वे कुछ नहीं कर सकते."

स्थानीय लोगों के मुताबिक़ वहां से कुछ दूर नदी में नाव चलने पर रोक लग गई और रेत दिखने लगी. आयातित कोयले से लदे 13 जहाज़ पानी की कमी से बीच नदी में ही रोक दिए गए. नदी की लगभग सूख चुकी तलहटी में बच्चे खेलते देखे गए.

निश्चित तौर पर यह कोई नहीं कह सकता कि फ़रक्का के पास गंगा नदी में जलस्तर क्यों गिरा. यहां बांग्लादेश जा रहे पानी का बहाव पलटने के लिए 1970 में एक बैराज बना था. 1990 के दशक में दोनों देशों ने पानी के बँटवारे के लिए 30 साल का क़रार किया.

इसके मुताबिक़, भारत 10 दिन के लिए पानी का बड़ा हिस्सा बांग्लादेश को देता है. इस दौरान यहां जलस्तर कम हो जाता है. इस बार भारत में सामान्य से काफ़ी कम पानी बचा.

लगातार दूसरे साल भारत में मॉनसून में कम बारिश हुई. बैराज के महाप्रबंधक एसके हलदर कहते हैं, "इस साल हिमालय में बर्फ़ देर से पिघली. इस तरह का उलटफेर हर साल होता है."

देश की 1.30 अरब की आबादी के लगभग एकचौथाई लोगों का जीवन गंगा नदी पर निर्भर है. गंगा की गिरती सेहत और पानी के गिरते स्तर के सुबूत ज़्यादा से ज़्यादा सामने आने लगे हैं.

नदी का जलस्तर ज़मीन के नीचे जमा पानी और मॉनसून की तीव्रता पर काफ़ी हद तक निर्भर है. वैसे भी गंगा के आसपास ज़मीन के नीचे जमा पानी के बड़े हिस्से में आर्सेनिक मिला हुआ है.

संयुक्त राष्ट्र की एक विवादास्पद रिपोर्ट में कहा गया है कि साल 2035 तक हिमालय का ग्लेशियर पिघलकर आज का पांचवां हिस्सा भर रह जाएगा.

इमेनुअल थियोफ़ाइलस और उनके बेटे थियो ने बीते साल गंगा नदी की पूरी 2,500 किलोमीटर की लंबाई को 87 दिनों में नाव से मापा था. अपनी यात्रा में उन्होंने मछुआरों से पूछा था कि उन्होंने सबसे बड़ा क्या बदलाव देखा.

थियोफ़ाइलस के मुताबिक़, "सबने कहा कि कई साल से पानी का स्तर गिरा है. गंगा में हमने एक कछुआ देखा, नदी का पानी इतना गंदा था कि वह इसमें डूब गया. नदी में कूड़ा करकट, मल और लाशें तैरती रहती हैं."

नदी की खराब होती सेहत भारत में बढ़ते जलसंकट की ओर इशारा करती है. लगातार दो बार के ख़राब मॉनसून से सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं और नदी घाटियों में पानी कम हो गया है.

गर्मी का मौसम कुछ हफ़्तों में शुरू हो जाएगा. देश के 91 जलाशयों में पानी इतना कम है जितना पूरे दशक में कभी नहीं रहा.

केंद्रीय जल आयोग के मुताबिक़, इन जलाशयों में पानी का स्टॉक कुल क्षमता का 29 प्रतिशत ही बचा है. वॉटरएड के मुताबिक़, पीने के पानी का 85 फ़ीसदी ज़मीन के नीचे से निकाला जाता है और ज़मीन के नीचे जलस्तर काफ़ी तेज़ी से गिर रहा है.

कोई ताज्ज़ुब नहीं कि पानी को लेकर लड़ाई-झगड़े भी बढ़ रहे हैं.

महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाक़ों के लोग टैंकरों से मिलने वाले पानी पर निर्भर हैं. लातूर ज़िले के अधिकारियों ने हिंसा की आशंका के मद्देनज़र स्टोरेज टैंकों के पास पांच से ज़्यादा लोगों के जमा होने पर रोक लगा दी है.

दसियों हज़ार लोग अपना घर-बार छोड़कर उन कैंपों में चले गए हैं, जहां पेयजल और पशुओं का चारा मुफ़्त दिया जा रहा है. सरकार ने नगरपालिकाओं से कहा है कि स्वीमिंग पूलों को पानी न दिया जाए.

पंजाब जैसे राज्य नदी के पानी के मालिकाना हक़ को लेकर लड़ रहे हैं. गांवों के लोगों और किसानों ने फ़सल बचाने के लिए तटबंध तोड़ दिए हैं.

पानी की किल्लत झेल रहे ओड़ीशा में किसानों ने फसल बचाने के लिए नदी के तटबंध तोड़ डाले हैं.

वापस फ़रक्का की ओर रुख करने पर पाएंगे कि बिजलीघर की नहर के छिछले पानी में लोग कपड़े धो रहे हैं और पानी इतना कम है कि बच्चे चलकर इसे पार कर रहे हैं.

एक ग्रामीण ने कहा, "हम पहले नहर में तैरने के लिए डुबकी लगाया करते थे."

यहां से कुछ दूर मछुआरे बलाई हलदर पकड़ी गई नाममात्र की झींगा मछलियों और पानी की कमी पर दुख जता रहे हैं.

वे कहते हैं, "इन दिनों नदी में काफ़ी कम पानी है. इसकी मछलियां भी ख़त्म हो रही हैं. हमारे गांवों के ट्यूबवेल भी सूखने लगे हैं. काफ़ी अनिश्चितता है. हमारे गांव के लोग काम की तलाश में शहरों का रुख करने लगे हैं."

पानी की किल्लत की आशंका से लोग परेशान हैं. बिजलीघर संयंत्र के कर्मचारी मिलन कुमार को डर है कि ऐसा फिर हो सकता है.

उन्होंने कहा, "हमें बताया गया कि गंगा में जलस्तर घटकर एकचौथाई रह गया है. दुनिया की चौथी सबसे बड़ी नदी के किनारे रहने पर भी हमें पानी की कमी झेलनी पड़ेगी, हमने कभी नहीं सोचा था. जो नहीं सोचा, वह हो रहा है."

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