प्लेटफॉर्म पर पढ़ाई से मिलती नौकरी की रेल

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सासाराम जंक्शन के प्लेटफॉर्म नंबर एक की इलेक्ट्रॉनिक घड़ी तब करीब साढ़े चार बजे का वक्त बता रही थी जब मैं बीते हफ्ते वहां पहुंचा था. तब तक प्लेटफॉर्म के पूर्वी छोर पर क़रीब आधा दर्जन जगहों पर युवा ग्रुप स्टडी करने के लिए जमा हो चुके थे.

वहां रह-रह कर एनाउंसमेंट्स हो रहे थे, ट्रेनें गुजर रही थीं, यात्रियों की भी चहल-पहल थी. इन सबसे किसी भी आम छात्र की पढ़ाई में खलल पड़ सकता था लेकिन ग्रुप स्टडी कर रहे युवाओं पर इसका असर नहीं के बराबर दिखाई दे रहा था.

ये युवा दरअसल उस पाठशाला के छात्र हैं जो करीब बीते दो दशकों से लगातार सासाराम के रेलवे प्लेटफॉर्म पर सुबह-शाम लग रही है. यहां आकर रोहतास के साथ-साथ कैमूर, औरंगाबाद जैसे पड़ोसी जिलों के युवा रेलवे, कर्मचारी चयन आयोग और दूसरी प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी करते हैं.

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सासाराम के शहरी, यहां पढ़ रहे या यहां से तैयारी कर सफल हो चुके युवा बताते हैं कि 90 के दशक में बिजली की किल्लत से परेशान छात्रों ने रेलवे प्लेटफॉर्म पर पढ़ने की शुरुआत की थी. ऐसा इसलिए क्योंकि प्लेटफॉर्म पर आसानी से रोशनी मिल जाती थी.

हाल के सालों में बिहार में बिजली की स्थिति में सुधार हुआ है. ऐसे में अब यहां आकर पढ़ने की वजहें भी बदली हैं. जैसा कि यहां पर पढ़ाई करने आए सासाराम के उज्ज्वल गोयल बताते हैं, ‘‘भले ही शुरुआत में बिजली मुद्दा रही हो. लेकिन अब हम यहां एक खास अनुशासित माहौल में पढ़ाई करने के लिए जुटते हैं जो प्रतियोगिता परीक्षाओं में कामयाब होने के लिए जरुरी है.’’

ऐसी पाठशाला प्लेटफॉर्म पर सुबह और शाम हर मौसम में लगभग हर दिन दो घंटे के लिए लगती है. छात्रों की मानें तो बरसात के मौसम में भी यह सिलसिला टूटता नहीं है. जैसा कि छात्र देवानंद कुमार ने बताया, ‘‘बरसात में प्लेटफॉर्म पर बने शेड के नीचे पढ़ाई होती हैं. आम तौर पर किसी भी दिन एक दर्जन से अधिक ग्रुप पढ़ाई के लिए जुटते हैं और एक ग्रुप में कम-से-कम पचास छात्र होते हैं.”

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सुबह में छात्र आम तौर पर खुद से तैयार किया हुआ मॉडल-पेपर हल करते हैं जिसे ‘सेट-मारना’ कहा जाता है. ‘सेट-मारना’ यानी वस्तुनिष्ठ सवालों को तय समय सीमा में हल करना. जबकि शाम के वक्त सामान्य ज्ञान यानी जीके का अभ्यास किया जाता है.

कैमूर जिले के रहने वाले धीरज केसरी यहां की तैयारी की तरीके के बारे में बताते हैं, ‘‘शाम के वक्त जीके के सवालों को एक सुर में कोई एक शख़्स पढ़ता है. सवाल के अंत में वह सही जवाब भी बताता है. ग्रुप के बाकी लोगों में से जिन्हें ऐसा लगता है कि उन्हें जवाब मालूम है वे भी सही जवाब के साथ-साथ ही अपना उत्तर भी दोहराते हैं और बाकी छात्र जवाब सुनने के बाद ऐसा करते हैं.’’

वहीं ‘सेट-मारने’ की तैयारी के बारे में सासाराम के राहुल कुमार का कहना था, ‘‘बेहतर प्रदर्शन करने वाले सीनियर छात्र सेट तैयार करते हैं. शाम में ही यह तय हो जाता है कि कितने लोग सुबह ‘सेट मारेंगे’. ये सभी हाथों से लिखे सेट के जेरोक्स में होने वाले खर्च के एवज में तीन-चार रुपए जमा कर देते हैं.’’

छात्रों के मुताबिक ग्रुप में हर काई बराबर होता है. हां, नए-पुराने और प्रदर्शन के लिहाज से जिम्मेवारियों का बंटवारा जरुर होता है. यहां पढ़ने आए बजरंगी कुमार से मैंने जानना चाहा कि यहां का शोर भरा माहौल क्या उनका ध्यान भंग नहीं करता?

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बजरंगी का जवाब था, ‘‘जब कोई इंजन गुजरता है तो शोर बहुत ज़्यादा होता है. तब हम कुछ पल के लिए रुक जाते हैं. इस शोर के अलावे बाकी चहल-पहल या आवाजें हमारा ध्यान भंग नहीं करती हैं.’’ बजरंगी आगे बताते हैं कि इतना जरुर है कि नए लड़कों को माहौल में ढलने में कुछ हफ्तों का वक्त लग जाता है.

यहां पढ़ाई करने वाले युवाओं के मुताबिक रेलवे प्रशासन भी प्लेटफॉर्म टिकट या दूसरे किसी सवाल पर परेशान नहीं के बराबर करता है. यहां पढ़ना अब शुभ भी माना जाने लगा है. परीक्षाएं नजदीक आने पर कुछ छात्र देर रात तक प्लेटफॉर्म पर पढ़ाई करते हैं.

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Image caption जितेंद्र जोशी ने प्लेटफॉर्म पर पढ़ते हुए कामयाबी हासिल की है.

कोई सटीक आंकड़ा तो मौजूद नहीं है लेकिन माना जाता है कि यहां से पढ़ाई कर बीते करीब दो दशकों में सैंकड़ों युवाओं ने सरकारी नौकरी पाई है. इनमें से एक रोहतास जिले के नायकपुर गांव के जितेंद्र कुमार जोशी भी हैं. जितेंद्र अभी छपरा स्थित रेल कारखाने में तकनीशियन हैं.

जितेंद्र बताते हैं, “मेरी सफलता का पूरा श्रेय प्लेटफॉर्म की पढ़ाई को जाता है. मैंने 2012 में तैयारी शुरु की थी. लेकिन तीन सालों तक कामयाबी नहीं मिली. फिर 2015 में जब यहां आना शुरु किया तो छह महीने के अंदर ही मुझे सफलता मिल गई.’’

वहीं यहीं पढ़ाई कर बिहार पुलिस में बहाल होने वाले सूर्यकांत कुमार के साथ संयोग यह है कि फिलहाल वे सासाराम में ही तैनात भी हैं. वे कहते हैं, ‘‘मेरे पास कोचिंग संस्थान में जाकर पढ़ाई करने के पैसे नहीं थे. लेकिन प्लेटफॉर्म पर सीनियर छात्रों की मदद से मुझे पूरा मार्गदर्शन मिला. वे हर तरह के सवाल फटाफट हल करने का तरीका बता देते थे.’’

सूर्यकांत ये भी जोड़ते हैं कि सासाराम में ही तैनात हूं तो अक्सर प्लेटफॉर्म पर लड़कों से मिलना और उन्हें गाइड करना नहीं भूलता. ये भी इत्तेफाक हैं कि प्लेटफॉर्म पर पढ़ कर सबसे ज़्यादा सफलता रेलवे की नौकरी में ही मिलती है.

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Image caption सूर्यकांत कुमार को बिहार पुलिस में नौकरी मिली है.

अखिलेश मौर्य भी यहां से पढ़ाई कर रेलवे की नौकरी पाने वालों में से हैं. कोलकाता में नौकरी कर रहे अखिलेश बताते हैं कि रेलवे की परीक्षाओं में अंग्रेजी का पेपर नहीं होता है. इस कारण भी रेलवे बोर्ड की पीक्षाओं में यहां के युवा ज़्यादा सफल होते हैं.

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