उत्पल दत्त का नाटक जो बंगाल कांग्रेस की हार की वजह बना

इमेज कॉपीरइट Shakti Samanta

'सात हिंदुस्तानी' का एक हिंदुस्तानी, सिगार मुँह में दबाए 'भुवन शोम' का कड़क रेलवे अफ़सर. मूँछों के लिए जीने-मरने की हद तक बावले 'गोलमाल' के भवानी शंकर से लेकर जीवन के गहन-गंभीर सवालों के हल ढूंढता 'आगंतुक' का मनमोहन मित्रा.

इतने सारे मुख़्तलिफ़ किरदारों को एक ज़िंदा हक़ीक़त में बदलकर पेश करने की क़ाबिलियत रखने वाला अदाकार अगर उत्पल दत न होगा तो और कौन होगा?

भारतीय सिनेमा और थियेटर के इतिहास में सामाजिक प्रतिबद्धता और उद्देश्य की ईमानदारी के साथ काम करने वाले महान अभिनेताओं को याद करें, तो पहली क़तार में यह एक नाम यक-ब-यक उभरकर सामने आ जाता है- उत्पल दत.

इंसानी किरदार के अनगिनत रंगों को अपनी असीम अभिनय कला से पर्दे पर उजागर करके अद्भुत इन्द्रधनुष रचने और उसे जीवित करने वाले इस अभिनेता की पूरी उम्र का हर दिन इंसानी बेहतरी की तमन्नाओं से लबरेज़ था.

इमेज कॉपीरइट A K HANGAL

29 मार्च 1929 को बंगाल के बारिसाल (अब बांग्लादेश) में जन्मे उत्पल दत की अभिनय यात्रा का आग़ाज़ कॉलेज के दिनों से ही हो गया था.

महान जर्मन कवि-नाट्यकार बर्तोल्त ब्रेख़्त से प्रभावित होकर उन्होंने कई नाटक लिखे और अभिनय के साथ डायरेक्ट किए. मार्क्सवाद में गहरी आस्था रखने वाले उत्पल दत प्रगतिशील नाट्य मंडल 'इप्टा' के संस्थापकों में थे.

'इप्टा' को ऊंचाई तक पहुँचाने में उन्होंने अहम किरदार निभाया.

थियेटर से जुड़ाव के इसी दौर में वह ब्रिटेन के मशहूर नाट्य मंडल शेक्सपीयराना के जेफ़री केंडल के साथ जुड़े और हिंदुस्तान-पाकिस्तान में घूम-घूमकर शेक्सपीयर के पात्रों को मंच पर जीवन देते रहे. 'आथेलो' के लिए उन्हें ख़ूब वाहवाही मिली.

इमेज कॉपीरइट Chalchita

उत्पल दत का फ़िल्मी सफ़र 1950 में बांग्ला फिल्म 'माइकल मधुसूदन दत्त' से शुरू हुआ और 19 साल बाद जाकर 'भुवन शोम' के साथ वह हिंदी सिनेमा में आए.

उनके इस पहले क़दम की धमक ने ही हिंदी फिल्म निर्माता-निर्देशकों को एक अनंत संभावनाओं से भरे अभिनेता की आमद का अहसास करा दिया.

उत्पल दत ने अभिनय को महज़ एक सीखी हुई कला की तरह नहीं बल्कि कठिन साधना से सधे हुनर की तरह विकसित किया.

उन्होंने 'गोलमाल' के किरदार भवानी शंकर को एक विशिष्ट रंग देने के लिए एक विशिष्ट अंदाज़ के अभिनय से एक वास्तविक किरदार में तब्दील कर दिया. इस कैरेक्टर को इस मक़ाम तक लाने के लिए उन्होंने हाथ-पैरों से ज़्यादा आंखों और लफ़्ज़ों के अनोखे अंदाज़ वाले उच्चारण का इस्तेमाल किया.

सवाल और विस्मय से बात सूंघने-समझने का आभास देने वाली चौड़ी होती और गोल-गोल घूमती उत्पल दत की आंखें उस घड़ी बिना बहुत कहे भी लक्ष्मण के कार्टून की तरह बहुत कुछ बोल जाती हैं.

एक शब्द 'अच्छा' को मात्र उच्चारण के उतारचढ़ाव और ज़रा सी लय के मिश्रण से 'अच्छ..आ' से जो कुछ कम्युनिकेट होता है, वह यक़ीनन इस छोटे से लफ़्ज़ के ज़रिए पहले कभी कोई और कम्युनिकेट नहीं कर पाया है.

इमेज कॉपीरइट A K Hangal

उत्पल दत ख़ासे पढ़े-लिखे इंसान थे और शब्द का महत्व ख़ूब पहचानते थे. इसी तरह फिल्म 'अमानुष' (1975) में उन्होंने गांव के एक शातिर सरपंच महीम घोषाल की भूमिका करते हुए एक शब्द 'सरकार' को भी एक साथ कई अर्थों से भर दिया है.

ज़रा से अदायगी के उतारचढ़ाव से यह संबोधित व्यक्ति के लिए ख़ुशामद, कहने वाले के लिए षडयंत्र और सुनने वाले (दर्शक) के लिए महीम घोष की धूर्तता उजागर करने वाला शब्द बन जाता है.

हक़ीक़त यह है कि उत्पल दत की हर फ़िल्म में इसी तरह अलग-अलग, अनोखे और सफल प्रयोग दिखते हैं. उनके इसी अंदाज़ की वजह से वे हिंदी फ़िल्मकारों के बेहद चहेते अभिनेता बन गए. लेकिन उत्पल दत ने हर फ़िल्म में काम करने के बजाय सिर्फ़ मनपसंद और चुनिंदा लोगों के साथ काम को ज़्यादा महत्व दिया.

बांग्ला फ़िल्मों में उन्होंने अगर सत्यजीत रे और मृणाल सेन के साथ ख़ूब काम किया, तो हिंदी फ़िल्मों में हृषिकेश मुखर्जी के साथ उनकी जुगलबंदी बेहद कामयाब रही.

इमेज कॉपीरइट Shakti Samanta

'गुड्डी' (1971), 'सबसे बड़ा सुख' (1972), 'गोल माल' (1979), 'नरम गरम' (1981) और 'किसी से ना कहना' (1983) जैसी फ़िल्में इसका सुबूत हैं.

ऐसा नहीं कि उन्होंने सिर्फ़ पसंदीदा फिल्में ही कीं. उन्होंने, उनके अपने कथन के मुताबिक़, बहुत सारा काम सिर्फ़ पैसा कमाने के लिए ही किया.

असल में थियेटर उनकी पहली चाहत और पहली मुहब्बत था. वे इस माध्यम के ज़रिए ही अवाम से सीधे जुड़कर समाज में फैली आर्थिक-सामाजिक विषमताओं और शोषक शक्तियों से जूझना और जीतना चाहते थे.

ग़ैरबराबरी वाले समाज को बदलने के लिए वे आम आदमी तक पहुँचकर उसे जगाना उनके जीवन का एकमात्र ध्येय था. इसी थियेटर की वजह से उत्पल दत्त भारी क़र्ज़ में डूब गए थे, जिससे उबरने के लिए वे हिंदी फ़िल्मों में आए थे.

इमेज कॉपीरइट Shemaroo

वे अपनी 'जात्रा' वाले अभियान के साथ बंगाल के गांव-गांव घूमते और क्रांति का अलख जगाते थे. उनके लिखे नाटकों के कारण अक्सर विवाद खड़े हो जाते. देश-प्रदेश की राजनीतिक ताक़तें बेचैन हो जातीं और उत्पल दत्त सीधे उनके निशाने पर आ आते थे.

यूं तो उनके लिखे और निर्देशित कई बांग्ला नाटक विवादों में घिरे पर एक नाटक 'कल्लोल' तो युगांतरकारी नाटक सिद्ध हुआ. 1946 में नौसैनिकों की बग़ावत की कहानी में तब की कांग्रेसी सरकार पर ज़बर्दस्त निशाना साधा गया था.

1965 में कांग्रेस सरकार ने नाराज़ होकर उत्पल दत्त को बिना किसी मुक़दमे के जेल में डाल दिया. इस दमनकारी कार्यवाही ने आग में घी का काम किया.

1967 में जब बंगाल विधानसभा के चुनाव हुए तो कांग्रेस सरकार बुरी तरह हारी और वाम दलों के गठबंधन को सरकार बनाने का पहला मौक़ा मिला. इस हार के कारणों में 'कल्लोल' और उत्पल दत्त की गिरफ़्तारी को एक कारण माना जाता है.

ऐसे क्रांतिकारी जज़्बे वाले इस अदाकार ने 1993 में 19 अगस्त को इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर दिया. लेकिन उनका हुनर आज के बदले ज़माने में भी उसी तरह कायम-दायम है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार