आपकी सेहत से पैसा कमाना चाहती हैं कंपनियाँ

  • 31 मार्च 2016
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भारत में हर साल अस्पतालों के बिल चुकाने की वजह से छह करोड़ से ज़्यादा लोग ग़रीबी का शिकार हो जाते हैं.

लेकिन क्या निजी कंपनियों की पहल स्वास्थ्य में बदलाव ला सकती है? क्या यहां अधिक कुशल और बेहतरीन सेवाएं मिल सकती हैं?

इसका जवाब बंगलुरू के स्लम क्लिनिक में ढूंढा जा सकता है. यह किसी पिज़्ज़ा डिलीवरी कॉर्नर जैसा दिखता है.

ये लोगों के घरों तक पहुंच कर आंख जांचने की सुविधा देता है.

भारत में एक करोड़ 20 लाख लोगों को आंखों से जुड़ी बीमारियां हैं. हालांकि इनमें से 80 फ़ीसदी लोगों की आंखो की रोशनी बच सकती है अगर इन्हें इलाज मुहैया हो.

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कंपनी का कहना है कि उसका पोर्टेबल टेस्ट किट पांच मिनट की स्क्रीनिंग में ही आंखों की कई समस्याओं की जांच कर लेता है.

लेकिन इन टेस्ट से मिलने वाले परिणामों को मेडिकल प्रोफेशनल्स कैसे इस्तेमाल कर रहे हैं, तकनीक की वजह से होने वाला वास्तविक बदलाव यहां दिखता है.

नेत्रा से जुड़े चंद्रशेखर का कहना है, "हम वाक़ई में सारी प्रक्रिया को तकनीक आधारित बनाने की कोशिश कर रहे हैं. इसमें जांच के तहत इमेज कोई और लेता है, लेकिन इसे कहीं और दूर बैठा कोई नेत्र विशेषज्ञ देखता है. हमने एक क्लाउड या टेलिमेडिसीन मॉड्यूल तैयार किया है जहां इमेज को डाउनलोड किया जा सकता है. आप साधारण जीपीआरएस सर्विस का इस्तेमाल कर इसे क्लाउड पर डाल सकते हैं, जिसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई या कहीं भी बैठा नेत्र विशेषज्ञ देख सकता है. वो इस पर अपनी राय भी भेज सकता है कि मरीज़ को तुरंत इलाज की ज़रूरत है या उसका उपचार बाद में भी हो सकता है."

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अस्पताल में भी इस तरह की नई तकनीकों का इस्तेमाल हो रहा है. गर्भावस्था के दौरान एक ख़ास तरह के मॉनिटर का इस्तेमाल किया जा रहा है जो पुराने मशीन से छोटा और सस्ता है.

इस नई तकनीक के तहत मरीज़ के शरीर पर बेल्ट बांधने के बाद डॉक्टर अपने मोबाइल फ़ोन पर ऐप के सहारे भ्रूण की हृदय गति को माप सकता है.

सत्तवा मेडटेक के संस्थापक वैभव जोशी का कहना है, "यह हमारा पहला प्रोडक्ट है, जिसे इस तरह तैयार किया गया है कि कम कुशलता वाले हेल्थ वर्कर इसका इस्तेमाल कर पाएं. यह सस्ता और मजबूत भी है, जो भारतीय परिवेश में बख़ूबी इस्तेमाल करने लायक़ बनाया गया है. हम इस तरह के और भी डिवाइस बनाने की ज़रूरत महसूस करते हैं, क्योंकि फ़िलहाल भारत महत्वपूर्ण मेडिकल डिवाइस का 75 फ़ीसदी आयात करता है. ये डिवाइस न तो सस्ते होते हैं और न भारतीय परिवेश के अनुकूल."

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तकनीक के क्षेत्र की बड़ी कंपनियां जैसे आईबीएम भी मेडिकल क्षेत्र में नए तकनीक ला रही है.

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आईबीएम के रोब मर्केल का कहना है, "भारत में वाक़ई में स्वास्थ्य क्षेत्र में व्यापक स्तर पर समस्या क़ायम है. डॉक्टरों के पास मरीज़ के लिए बहुत कम वक़्त होता है. अमरीका में एक डॉक्टर एक मरीज़ से एक घंटे में तीन से चार बार मिलता है. किसी मरीज़ की समस्या को समझने के लिए एक डॉक्टर को 15 मिनट देना पड़ता है. तभी वो उसकी समस्या को ठीक से समझ पाएगा और उसका उचित इलाज कर पाएगा. भारत में यह एक चुनौती है. अमरीका में जहां कैंसर के 100 मरीज़ों पर एक डॉक्टर है, वहीं भारत में 1600 मरीज़ों पर एक डॉक्टर होता है. भारत में डॉक्टरों पर बहुत दबाव है. हम जानते हैं कि अगर हमने भारत में ये काम कर लिया तो दुनिया में कहीं भी कर लेंगे."

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क़रीब एक लाख भारतीय हर साल पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलने के कारण मारे जाते हैं. क़रीब सत्तर करोड़ लोगों के पास इलाज की विशेषज्ञ सुविधा उपलब्ध नहीं है.

इलाज के बढ़ते ख़र्च और देश में डॉक्टरों की कमी को देखते हुए, ये नए तकनीकी बदलाव करोड़ों भारतीयों के लिए उम्मीद की नई किरण लाई है.

विश्व बैंक के मुताबिक़ भारत सरकार जीडीपी का महज़ एक फ़ीसदी स्वास्थ्य क्षेत्र पर ख़र्च करती है.

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इसका सीधा मतलब है कि जो भी निजी स्वास्थ्य सेवाओं को लेने में सक्षम है, निजी कंपनियां उन्हें सुविधा मुहैया करवाने को तैयार हैं.

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