जेल में मसूद अज़हर की 'जिहाद की क्लास'

  • 1 अप्रैल 2016
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चरमपंथी मौलाना मसूद अज़हर की संस्था जैश-ए-मोहम्मद पर प्रतिबंध लगाने की भारत की कोशिशों पर चीन ने एक बार फिर पानी फेर दिया है.

भारत 2001 संसद हमले समेत कई बड़े हमलों के लिए अज़हर की संस्था को ज़िम्मेदार मानता है.

भारत ने हाल के पठानकोट हमले का आरोप भी जैश पर लगाया है.

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भारतीय कश्मीर में 1994 में मौलाना मसूद अज़हर को गिरफ्तार किया गया था जिसके बाद से 1999 में रिहाई तक अज़हर को जम्मू की कोट भलवाल जेल में रखा गया था. उस समय वहां कश्मीर से गिरफ्तार हुए कश्मीरी, अफ़गान और पाकिस्तानी चरमपंथियों की एक पूरी टोली क़ैद थी.

इस में चरमपंथी संगठन हरकत-उल-मुजाहिदीन के श्रीनगर में कमांडर कहे जाने वाले सैफुल्लाह खान और उसके दो सगे चरमपंथी भाई भी शामिल थे. हाल में श्रीनगर में एक मुलाक़ात के दौरान सैफुल्लाह ने हमें बताया कि मौलाना अज़हर जेल में चरमपंथियों को जिहाद का भाषण देते थे. वो कहते हैं, "उनका काम एक ही था, भाषण देना, उन्होंने बंदूक नहीं उठाई थी, किसी को मारा नहीं था. वो जिहाद की विचारधारा पर भाषण देते थे."

सैफुल्लाह के मुताबिक़ मौलाना अज़हर के भाषण का वहां मौजूद सभी चरमपंथियों पर ज़बरदस्त असर होता था.

सैफुल्लाह ने अज़हर के भाषण की अहमियत पर ज़ोर देते हुए आगे कहा, "अज़हर साहेब इस वक़्त यहाँ आपको बैठे मिल जाएँ और आप से चार बातें करें तो आप अपना कैमरा छोड़ कर बोलेंगे कि मैं भी जिहाद के लिए जा रहा हूँ."

मैंने यूट्यूब पर मसूद अज़हर के कई भाषण सुने, चिल्लाने-चीखने वाले इन भाषणों में भारत के खिलाफ ज़हर उगलने और लोगों को जिहाद के लिए उकसाने के अलावा कुछ और ख़ास नहीं था. भाषणों में कोई तर्क नहीं था.

अज़हर ने जैश की स्थापना जेल से रिहा होने के बाद पाकिस्तान लौट कर 2000 में की. सैफुल्लाह के अनुसार मक़सद केवल भारत के खिलाफ हमले करना था. भारत से इतनी नफरत का कारण?

सैफुल्लाह कहते हैं, "हिंदुस्तान तो हर जगह टारगेट है. हिंदुस्तान सीधा नहीं है. अगर हम ग़लत हैं तो कहीं न कहीं हिंदुस्तान भी ग़लत है."

31 दिसंबर 1999 के दिन इंडियन एयरलाइंस के एक अपहृत विमान के मुसाफिरों की रिहाई के बदले अज़हर को जम्मू जेल से अफ़ग़ानिस्तान के कंधार शहर ले जाकर रिहा किया था. इसके बावजूद अज़हर का टारगेट भारत क्यों रहता है?

सैफुल्लाह सोच कर बोलते हैं, "इसका जवाब हम से बेहतर आप जानते हैं. आपकी फ़ौज ने हमारी औरतों की इज़्ज़त लूटी. दिल्ली में एक औरत का बलात्कार हुआ पूरे हिंदुस्तान में हंगामा हो गया. हमारी औरतों की इज़्ज़त लूटी गई तो किसी ने आवाज़ नहीं उठाई."

ये तो मुझे मालूम था कि जम्मू जेल में इन चरमपंथियों को इस्लामी किताबें पढ़ने के लिए दी जाती थीं लेकिन विचारधारा के प्रचार के लिए अज़हर को भाषण देने से रोका नहीं गया ये सुनकर हैरानी हुई.

सैफुल्लाह ने कहा, "जी हाँ. वो जेल थोड़े ही थी. वो तो हमारा घर था. हम ने (बैरक को) तोड़ फोड़ कर उसे अपने हिसाब से सजा लिया था"

अज़हर और सैफुल्लाह कई चरमपंथियों के साथ बैरक नंबर तीन में क़ैद थे. "मैंने पहली बार जेल में क़ुरान पढ़ी और जेल में ही पैग़म्बर मुहम्मद के जीवन के बारे में पढ़ा. मौलाना ने हमें सब कुछ पढ़ाया."

सैफुल्लाह उस समय काफी जवान थे. उनके ऊपर, खुद उनके शब्दों में, जिहाद का भूत सवार था. ज़ाहिर है, अज़हर की बातों का असर होना हैरानी की बात नहीं थी.

सैफुल्लाह के मुताबिक धीरे-धीरे जेल में अज़हर के भाषणों के बावजूद उन्हें अपनी ग़लतियों का एहसास होने लगा. वो कहते हैं उन्हें हिंसा पर पछतावा होने लगा. मौलाना की प्रतिक्रिया क्या थी? सैफुल्लाह बोले मौलाना के साथ उनके मतभेद सामने आने लगे. "मुझे मौलाना से डर नहीं. मैंने उनसे कहा आप जिहाद की बात करते हैं. मक्के में कश्मीरी मुजाहिदों के लिए दुआएं होती हैं लेकिन हम कुत्तों की तरह आपस में लड़ते हैं. ये जिहाद कैसा?"

कुत्तों की तरह लड़ाई से सैफुल्लाह की मुराद थी कश्मीरी चरमपंथियों के बीच आपसी लड़ाई, जो उस समय काफी होती थी. सैफुल्लाह के अनुसार जिहाद को लेकर कुछ ही लोग सीरियस थे. उनके हिसाब से ये पैसों की लड़ाई थी.

सैफुल्लाह ने इससे बेज़ार होकर चरमपंथ का रास्ता छोड़ दिया. मौलाना मसूद अज़हर के साथ जेल में गुज़ारे कुछ साल वो आज भी याद करते हैं. वो अज़हर के भाषणों से आज भी प्रभावित हैं लेकिन अज़हर के बताए जिहाद के रास्ते को छोड़ चुके हैं.

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