'1984 दंगों के सच को दफ़न करने की कोशिश'

  • 2 अप्रैल 2016
जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार इमेज कॉपीरइट Reuters

हाल ही में कुछ कारणों से जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार को 1984 में सिखों के नरसंहार की तुलना 2002 में मुसलमानों की हत्या से करना सही लगा. बाद में वो अपनी बात से पलटने को मजबूर हो गए. कन्हैया अपनी बात सुधार कर बोले कि गुजरात में हिंसा राजनीति से नियंत्रित थी जबकि दिल्ली में यह भीड़ का पागलपन था.

यह निष्कर्ष सच से इतना परे था कि मेरी जानकारी में सिर्फ़ एक और आदमी ऐसा नादानी भरा दावा कर सकता है- राहुल गांधी. अर्णब गोस्वामी को जनवरी, 2014 में दिए अपने इंटरव्यू में उन्होंने सचमुच यह दावा किया था कि 1984 में कांग्रेस सरकार ने दंगों को रोकने का प्रयास किया था जबकि गुजरात में मोदी सरकार ने दंगे होने दिए थे.

यक़ीनन वह मोदी सरकार के बारे में सही कह रहे थे लेकिन कांग्रेस के बारे में वह सच्चाई के कोसों दूर थे. 1984 में सेना की तैनाती में जानबूझकर देरी की गई, पुलिस ने दख़ल देने से इनकार कर दिया, वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कमल नाथ, एचकेएल भगत, जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार पर आरोप लगे कि उन्होंने दंगाइयों का नेतृत्व किया जिन्होंने सिखों को मारा और उनका सामान लूट लिया.

इमेज कॉपीरइट AP

दंगाई साफ़ तौर पर किसी के इशारों पर काम कर रहे थे और संगठित थे. इसके बाद पार्टी में कमलनाथ रॉकेट की तरह ऊपर उठे. टाइटलर, भगत और सज्जन कुमार को बचाने की कोशिशें भी अच्छी तरह इतिहास में दर्ज हैं. पार्टी उन्हें चुनावों में उतारती रही और वे महत्वपूर्ण पदों पर काबिज़ रहे.

अपने कर्तव्य का पालन करने में नाकाम रहे वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई. चूंकि 1984 के दंगों में कांग्रेस की आपराधिक भूमिका सीधे गांधी परिवार को दोषी ठहराती है, इसलिए राहुल का नज़रिया तो समझ में आता है लेकिन माफ़ी के योग्य नहीं है.

लेकिन कॉमरेड कन्हैया और उनके जैसे बाक़ियों का क्या?

कन्हैया पीएचडी के छात्र हैं और अब अक्सर राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर बोलते हैं. 1984 के दंगों के बारे में काफ़ी लिखा जा रहा है और इस विषय पर पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है इसलिए इस मुद्दे पर बोलने या लिखने वाले को जानकारी न होने की बात करने का कोई अधिकार नहीं है.

लेकिन ख़ुद को उदारवादी बताने वालों और बौद्धिक ज्ञान होने का दावा करने वालों का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जो 1984 के बारे में बात करते समय कन्हैया से कुछ ही बेहतर कह पाते हैं.

स्वयंभू उदारवादियों के किताबी खेल

इमेज कॉपीरइट AP

मैंने पहले भी ऐसे कुछ मामलों का ज़िक्र किया है लेकिन उन्हें फिर से बताना सही रहेगा. 2007 में अमरीका में हॉर्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने मार्था सी नुसबॉम की किताब 'दि क्लैश विदिन' छापी थी जिसका बहुत बढ़िया परिचय अमर्त्य सेन ने लिखा था.

इस पुस्तक में दिल्ली और गुजरात के दंगों की तुलना कुछ इस तरह की गई है, "गुजरात दंगों का सबसे नज़दीकी उदाहरण दिल्ली में हुए सिख दंगे थे..." वह आगे दावा करती हैं कि दिल्ली दंगे इस मायने में अलग थे कि 'बलात्कार और ज़िंदा जलाकर मार डालना इन दंगों की मुख्य बात नहीं थी.’

यह महज़ ग़लती नहीं है. यह हमारे समय के सबसे प्रमुख नैतिक दार्शनिकों के 1984 की दंगों की मुख्य बात को झुठलाना है.

वो 2002 के दंगो के तथ्यों के साथ की गई ऐसी तोड़-मरोड़ करने की सोच भी नहीं सकती थीं.

2014 के चुनाव प्रचार के दौरान 84 का नरसंहार जिस तरह चर्चा में आया, उससे ऐसा लगा कि नवंबर 1984 की घटनाओं में लोगों की रुचि फिर से जागेगी. 2014 के चुनावों के बाद सिख विरोधी दंगों पर दो किताबें आई हैं.

इमेज कॉपीरइट

पहली तो संजय सूरी की -1984 दि एंटी-सिख वॉयलेंस एंड आफ़्टर - जिसमें कमलनाथ की उन दिनों में संदिग्ध और संभवतः आपराधिक भूमिका पर विस्तार से बात की गई है. दूसरी नीलांजन मुखोपाध्याय की - सिख्स: दि अनटोल्ड एगोनी ऑफ़ 1984.

मैं दोनों बुक लॉन्च में शामिल था. वहां मौजूद लोगों को देखकर अचंभित रह गया था - इसमें आमतौर पर दिल्ली के बुक लॉन्च में शामिल होने वाले चेहरे ग़ायब थे और सिखों की भरमार थी.

ऐसा भी नहीं है कि लोगों को जुटाने के लिए आमतौर पर की जाने वाली कोशिशें नहीं की गई होंगी. क्योंकि पहले कार्यक्रम का संचालन सागरिका घोष ने किया था और दूसरे का भूपेंद्र चौबे ने.

ऐसे ज़्यादातर लोग जिन्हें मौजूदा सरकार के सांप्रदायिक नफ़रत फैलाने की कोशिश नज़र नहीं आती, उनका इस बुक लॉंच से ग़ायब होने से मुझे ताजुब्ब नहीं हुआ, क्योंकि ये लोग तथ्यों से दूर रहना पसंद करते हैं.

ओढ़ी हुई नादानी

लेकिन स्वयंभू उदारवादियों की पूरी नई पीढ़ी, जिनकी मुख्य सामाजिक गतिविधि 'सही' किताब के लॉन्च पर हाज़िर होना है, इतनी सफ़ाई से इन कार्यक्रमों से ग़ैरहाज़िर थी कि ये साफ़ था कि उनकी ‘नादानी’ ओढ़ी हुई है.

इमेज कॉपीरइट AP

यह नादानी ख़ासतौर पर 1984 की घटनाओं को लेकर है और यह इतिहास की उपेक्षा से जुड़ी हुई नहीं है. वे लोग ऐसी किताबों के लॉन्च पर टूट पड़ते हैं जब उनमें से किसी की जान-पहचान का पहले या दूसरे विश्वयुद्ध पर लिख डालता है.

कांग्रेस का ऐसा बचाव!

इस वैचारिक खोल में सुरक्षित बैठकर कि कांग्रेस सैद्धांतिक रूप से किसी समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा का समर्थन नहीं करती, 'उदारवादियों' की इस नई पीढ़ी ने उस सच्चाई का सामना करने की कभी कोशिश ही नहीं की है, जो 1984 में घटी थी.

इस तरह का अंधापन उन्हें इस भ्रम में ज़िंदा रहने को मजबूर कर देता है कि कांग्रेस ऐसा भयानक काम कर सकती थी. क्योंकि वह ऐसी चीज़ों का समर्थन नहीं करती. इस अंधेपन ने दिल्ली में बड़े हो रहे एक ख़ास तबक़े के युवाओं की एक पीढ़ी को सुरक्षा दी है.

कौन हैं यह स्वयंभू उदारवादी?

अफ़सरों, राजनेताओं के बच्चे जो कांग्रेस के सोशल नेटवर्क के ज़रिए जुड़े हैं उस समूह का हिस्सा हैं जिन्हें नया उदारवादी वर्ग बुलाया जाता है. ये लोग अच्छे-ख़ासे पढ़े लिखे हैं.

और बीजेपी की कमियों और अज्ञानता पर बोलने को तैयार रहते हैं, लेकिन वो कांग्रेस पार्टी का जो सच है उसे पहचानने में अक्षम बने हुए हैं. ख़ासकर तब जब बात 1984 सिख नरसंहार की होती है.

उनकी ओढ़ी हुई नादानी पूरे सोशल नेटवर्क में फैल जाती है और कन्हैया जैसों को प्रभावित करती है, वो जिन्होंने ख़ुद से इसे समझने की कोई कोशिश नहीं की है.

कोई इनसे पूछे

कुछ मामलों में यह वही पीढ़ी है जिसकी बात जसप्रीत सिंह 1984 नरसंहार की पृष्ठभूमि पर लिखे अपने उपन्यास 'हीलियम' में करते हैं.

इसका नायक जो 1984 में एक कॉलेज छात्र है अपनी आंखों के सामने अपने सिख प्रोफ़ेसर को ज़िंदा जलाए जाते देखता है. उसके पिता दिल्ली पुलिस में एक बड़े अधिकारी हैं. सालों बाद उसे नरसंहार के दौरान अपने पिता की भूमिका के बारे में पता चलता है.

1984 दंगों में पिता की भूमिका वो प्रश्न है, जिसका सामना राहुल गांधी कभी नहीं कर पाए हैं. यह एक ऐसा सवाल है जो लुटियंस की दिल्ली में रहने वाले ख़ास वर्ग के सभी युवाओं से पूछी जानी चाहिए कि ‘1984 में तुम्हारे पिता/चाचा/चचेरे-ममेरे भाई की सरकार में क्या भूमिका थी?’

कांग्रेस सांसद, पार्टी प्रवक्ता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित नीलांजन मुखोपाध्याय की किताब लॉन्च के समय पैनल में शामिल थे. उन्होंने उस नरसंहार के बारे कुछ इस ईमानदारी से बोला जो कांग्रेसियों में कम होती है.

इमेज कॉपीरइट BBC World Service

जब मैंने उनसे यह पूछा कि उन्हें कैसा लगता है उन लोगों के साथ काम करना जिन्हें हम उन हत्याओं के लिए दोषी मानते हैं. उन्होंने जवाब दिया कि यह तथ्य उन्हें असहज कर देता है. फिर उन्होंने पार्टी में अपनी असहजता के बारे में विस्तार से बताया जिससे वह लंबे समय से जुड़े रहे हैं.

फिर भी यह सच तो यही है कि इस क़दर ईमानदार एक आदमी को ऐसे लोगों के साथ बैठकर पार्टी की रणनीति तैयार करनी होती है, जिनके हाथों पर खून के धब्बे हैं. उनके परिवार की पार्टी के साथ संबंधों की सच्चाई और उससे मिलने वाले फ़ायदों के साथ-साथ इस सच को स्वीकार करना सुविधाजनक है.

लेकिन कांग्रेस का बचाव करने वाले 'उदारवादी' युवा कहीं अधिक कठिन स्थिति में है जो अपने ख़ास सामाजिक अधिकारों को बचाने के लिए 1984 की हिंसा के सच को दफ़न कर देते हैं. इन उदारवादियों के ज़रिये 1984 के सच से इनकार न सिर्फ़ सच को जानबूझकर दबाना है बल्कि यह ख़ून के उन धब्बों को नज़रअंदाज़ करने का सोचा-समझा फ़ैसला है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार