'..इसलिए कहते हैं, ईडन जैसा दूसरा मैदान नहीं'

  • 3 अप्रैल 2016
ईडन गार्डेन

अगर मुझे दुनिया के तीन सर्वश्रेष्ठ क्रिकेट मैदान के नाम बताने को कहा जाए तो मैं इंग्लैंड के लॉर्ड्स, भारत के ईडन गार्डन और ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न क्रिकेट ग्राउंड का नाम लूंगा.

इन तीनों मैदानों में खेलने का एक प्रतीकात्मक महत्व है. लॉर्ड्स को क्रिकेट का मक्का कहा जाता है.

ईडन गार्डन में आपको क्रिकेटप्रेमी दर्शकों की ऐसी भीड़ देखने को मिलेगी जो और कहीं नहीं मिलेगी और वहीं मेलबोर्न में दबाव के अंदर खेलना एक मुश्किल काम है.

ईडन गार्डन में 1860 के दशक में पहली गेंद फेंकी गई थी. 1933-34 में ईडन गार्डन में पहला मैच खेला गया था. उस वक़्त इंग्लैंड की टीम भारत दौरे पर आई हुई थी और इस टीम की अगुवाई डगलस जार्डिन कर रहे थे.

इसके बाद से लेकर अब तक ईडन कई ऐतिहासिक और बड़े मैचों का गवाह बन चुका है.

इन बड़े और ऐतिहासिक मैचों में 1987 का विश्व कप फ़ाइनल, 1989 का नेहरू कप फ़ाइनल, हीरो कप का सेमीफ़ाइनल और फ़ाइनल जैसे कई मैच शामिल हैं. यह सूची काफ़ी लंबी है.

अगर आप इस मैदान से जुड़े इतिहास, जुनून और भावनाओं को एक साथ जोड़कर देखते हैं तो ईडन जैसा कोई दूसरा मैदान आपको दुनिया में नहीं दिखेगा.

आख़िर वो क्या बात है जो ईडन गार्डन को ईडन गार्डन बनाता है?

स्टेडियम का विशालकाय आकार, बड़ी संख्या में दर्शकों के बैठने की सुविधा, दर्शकों की भीड़ से उठने वाली आवाज़, उनकी भावनाएं और उनका जुनून सबकुछ अनोखा है.

इमेज कॉपीरइट Getty

हालांकि पहले यहां एक लाख से ज़्यादा दर्शकों के बैठने की सुविधा थी लेकिन अब इसकी क्षमता घटकर 70000 से कम हो गई है. लेकिन अभी भी दर्शकों के भावनाओं में कोई कमी नहीं आई है.

आप किसी भी भारतीय क्रिकेट खिलाड़ी से उसका पसंदीदा मैदान पूछेंगे तो वो ईडन गार्डन का नाम लेगा.

ईडन पर एक बढ़िया प्रदर्शन या एक शतक किसी क्रिकेट खिलाड़ी के करियर को एक नई ऊंचाई देता है. यही वजह है कि र्ईडन गार्डन को भारत का सबसे बढ़िया मैदान माना जाता है.

मैं कोलकाता से हूं इसलिए स्वाभाविक है कि मैं बचपन से ही क्रिकेट देख रहा हूं. मैं 1979-80 में पहली बार ईडन गार्डन में क्रिकेट मैच देखने गया था.

इसके बाद से आज तक शायद ही ईडन में खेला जाने वाला कोई मैच मैंने नहीं देखा हो. ईडन में मैंने कई ऐसे मैच देखे हैं जिन्हें मैं यादगार कह सकता हूं.

इमेज कॉपीरइट

1987 का विश्व कप फ़ाइनल ऐसा ही एक मैच था. इस मैच में भारत नहीं बल्कि ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड खेल रहे थे. फिर भी एक लाख लोग स्टेडियम में मैच का लुत्फ उठा रहे थे.

एक दूसरा यादगार मैच 1993 के हीरो कप का सेमीफ़ाइनल था. वो पहला मैच था जो इस ग्राउंड पर फ्लड लाइट की रोशनी में खेला गया था.

यह मैच आधी रात में खत्म हुआ था. सचिन तेंदुलकर ने दक्षिण अफ्रीका के ख़िलाफ़ इस मैच में नहीं भूला जा सकने वाला आख़िरी ओवर डाला था.

इस मैच के बाद हम पागल हो गए थे. हमने घर लौटते हुए अपनी कमीजें जलाकर मशाल की तरह इस्तेमाल किया था.

इमेज कॉपीरइट Getty

साल 2011 में हमने एक बार फिर एक यादगार मैच भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जाने वाले टेस्ट मैच के रूप में देखा. इस मैच में वीवीएस लक्ष्मण ने 281 रनों की पारी खेली थी.

एक लाख से ज़्यादा लोग उस वक़्त मैदान में भारत की चिल्लाते हुए हौसला अफ़ज़ाई कर रहे थे. उन्हें लग रहा था कि वे ऐसा करके ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों पर दबाव बना रहे हैं.

ईडन गार्डन में मैच देखना हमेशा एक अलग एहसास होता है. अब भी जब मैं क्लब हाउस से गुजरता हूं तो प्रेस बॉक्स में चला जाता हूं और दोस्तों के साथ मैच देखता हूं.

स्टैंड में खड़ा होकर जो यहां एहसास होता है वो कहीं और नहीं होता. ईडन गार्डन में जुटने वाली भीड़ की समस्या को लेकर एक इतिहास रहा है. इसकी शुरुआत 1960 के दशक में हुई थी.

1967 में एक मशहूर वाकया हुआ था. पुलिस को उस वक़्त हालात पर क़ाबू पाने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा था.

सर गैरी सोबर्स और पूरी वेस्टइंडीज टीम को पूरे मैदान में भागना पड़ा था. वे इसलिए भागे क्योंकि उन्हें लगा कि भीड़ उनपर हमला करने वाली है.

इमेज कॉपीरइट Getty

लेकिन वे बिल्कुल भी भीड़ के निशाने पर नहीं थे. यह स्टैंड में भीड़ की खुशी से बेकाबू होने के कारण शुरू हुआ था. दो साल बाद 1969 में छह लोग यहां भगदड़ में मारे गए थे.

1999 में भारत-पाकिस्तान टेस्ट सिरीज़ के दौरान पुलिस को स्टैंड खाली कराना पड़ा था और उसके बाद बिना किसी दर्शक के मैच शुरू हो सका था.

इस वक़्त इसलिए हंगामा खड़ा हुआ था कि क्योंकि सचिन तेंदुलकर को ग़लती से आउट करार दे दिया गया था.

इमेज कॉपीरइट

लेकिन आज की तारीख में स्टेडियम में सुरक्षा व्यवस्था पहले से काफ़ी मजबूत हुई है. स्टेडियम में प्रवेश करने से पहले कई सुरक्षा घेरों से गुज़रना पड़ता है.

आप पानी का बोतल लेकर अंदर नहीं जा सकते हैं और मैदान की तरफ़ कोई चीज़ नहीं फेंक सकते.

इसलिए मैं अब नहीं सोचता हूं कि किसी तरह की कोई परेशानी अब होगी. वे दिन अब इतिहास बन चुके हैं.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

संबंधित समाचार