बच्ची ने क़ुरान याद कर शरणार्थियों की मदद की

  • 4 अप्रैल 2016

मिलिए हाफिज़ा मारिया असलम से जिन्होंने पांच साल की उम्र में ही क़ुरान याद करना शुरू किया था.

बस दो-तीन सालों में, उन्हें क़ुरान याद हो गया. इसकी बदौलत उन्होंने सीरिया से यूरोप आये शरणार्थियों के लिए साढ़े तीन लाख रुपए भी जमा किए.

बीबीसी ने मरिया से मुलाकात की. फेसबुक पर लगभग पांच हज़ार लोग उनके फॉलोअर हैं. मारिया अपने आस-पड़ोस में काफी लोकप्रिय हैं. वो लंदन के पास लूटन में रहती हैं.

जब मारिया पांच साल की थीं तब उनहोंने क़ुरान पढ़ना शुरू किया, देखते ही देखते उन्हें पहले तीस अध्याय याद हो गए. और उसके बाद उन्होंने क़ुरान की पढाई जारी रखी.

उन्होंने बीबीसी को बताया, "एक मुस्लिम होने के नाते क़ुरान पढ़ना मेरी ज़िम्मेदारी है. लेकिन पढ़ते-पढ़ते मुझे धीरे-धीरे क़ुरान याद हो गया."

उनकी माँ शबनम ने बताया कि इसकी शुरआत सीरिया से आए शरणार्थियों के लिए पैसे जुटाने से हुई.

शबनम ने कहा, "मैंने मरिया से पूछा कि क्या वो क़ुरान का एक अध्यय याद करने के लिए तैयार है. मैंने उससे कहा कि अगर वो ऐसा करती है तो स्पॉन्सरशिप से चंदा इकट्ठा किया जा सकता है. और क्या आप यकीन कर सकते हैं कि पांच साल की बच्ची ने 3500 पाउंड जमा कर लिए. तभी मुझे लगा कि इस लड़की में याद करने की बहुत क्षमता है."

दूसरे बच्चों को भी प्रेरणा मिले इसलिए मारिया ने फेसबुक पर अपना पेज सेटअप किया है. सैकड़ों लोगों ने मारिया और उसके परिवार से संपर्क किया है.

क़ुरान में 114 अध्याय हैं और 75 हज़ार शब्द हैं, और दो साल की कड़ी मेहनत के बाद मारिया असलम इसे पूरी तरह से याद करने में कामयाब हुईं.

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